वामपंथी पार्टियों का 62 सीटों पर होगा खेला
लोकसभा चुनाव के नज़दीक आते ही सियासी पार्टियों ने अपनी चुनावी रणनीति को धार देना
शुरू कर दिया है। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में सीटों की
शेयरिंग हो गई है। राजधानी दिल्ली सहित अन्य राज्यों में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में
समझौता होने की खबर मिल रही है। मगर असली पेच बंगाल और केरल की 62 सीटों पर फंसा
है। इन राज्यों में वामपंथी पार्टियां इंडिया गठबंधन में होकर भी अलग थलग पड़ी है। अब यह
लगभग तय है कि बंगाल और केरल में इंडिया ब्लाक की पार्टियां आपस में टकराएगी। यह
कहने में कोई गुरेज नहीं है कि कम्युनिष्ट पार्टियां इस समय दो राह पर खड़ी है। बंगाल में
लम्बे समय तक राज करने वाली कम्युनिष्ट पार्टियां वहां खाली हाथ है। त्रिपुरा में भी कमोवेश
यही स्थिति है। केरल में वर्तमान में वामपंथी पार्टियां सत्तारूढ़ है। बंगाल और त्रिपुरा में
कम्युनिष्ट पार्टियां अपने सबसे बुरे दौर में है जहां उनके पास लोकसभा की एक भी सीट नहीं
है। वहीं केरल में सत्तारूढ़ होने के बावजूद उनके पास मात्र एक लोकसभा की सीट है। बंगाल में
लोकसभा की 42 और केरल में 20 सीटें है मगर इंडिया गठबंधन की भागीदार होने के बावजूद
यहां वे अकेले लड़ने को मज़बूर है। दोनों राज्य जहाँ कम्युनिष्टों का कभी जबरदस्त दबदबा रहा
है वहां वे ठन ठन गोपाल की स्थिति में है। सच तो यह है, देश की वामपंथी पार्टियां इस समय
अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। अर्श से फर्श में विलीन होने वाली कम्युनिष्ट पार्टियां
कहने को कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन में शामिल है। मगर जिन राज्यों में उनका थोड़ा बहुत
जनाधार बचा है, वहां उनका सीधा चुनावी संघर्ष कांग्रेस या गठबंधन के अन्य घटक दलों से है।
हम सबसे पहले बात कर रहे है बंगाल की जहां 1977 से 2011 तक निर्बाध रूप से बंगाल पर
राज करने वाली कम्युनिष्ट पार्टियां आज खाली हाथ है। कम्युनिष्ट पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर
इंडिया गठबंधन के साथ है। बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने उनके हाथ से
सत्ता छीन कर उन्हें सड़क पर ला दिया। इस राज्य में माकपा ने भाजपा के साथ तृणमूल कांग्रेस
को अपना सामान रूप से शत्रु घोषित कर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। दूसरा राज्य
केरल है जहां वर्तमान में सीपीएम की अगुवाई में वामपंथी पार्टियां सत्तारूढ़ है। मगर पिछले
लोकसभा चुनाव में माकपा को सिर्फ एक सीट मिली थी। यहाँ वामपंथियों का सीधा मुकाबला
कांग्रेस गठबंधन से है। वामपंथियों ने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी को वायनाड सीट छोड़ने की कह
दी है। वर्तमान लोकसभा में माकपा और भाकपा के पास तमिलनाडु से दो दो सीटें है। एक सीट
केरल से है। इस प्रकार हम कह सकते है भाजपा के विरोध में इंडिया गठबंधन में शामिल होने
के बावजूद कम्युनिष्टों की हालत सांप छछूंदर सी हो रही है। उसका सीधा मुकाबला कहीं भी
भाजपा से नहीं है। उसे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए केरल और बंगाल में कांग्रेस और
तृणमूल कांग्रेस से दो दो हाथ करने होंगे।
कभी 64 लोकसभा सीटों के साथ देश के तीन राज्यों में सत्तासीन और भारत सरकार के निर्माण
में अहम् भूमिका निभाने वाली वामपंथी पार्टियां आज सिर्फ पांच सीटों तक सिमट कर रह गयी
है। त्रिपुरा और बंगाल के गढ़ तो पहले ही ढह गए थे अब केरल बचा है जहाँ वह शासन में है।
पांच में से चार लोकसभा सीटें तमिलनाडु में डीएमके की कृपा से मिले है। कम्युनस्टों के लिए
यह अभी तक के सबसे खराब हालात हैं। लोकसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को
2 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) को 3 सीटें मिली हैं।
पिछले तीन लोकसभा चुनावों में निरंतर ह्रास के बाद वामपंथी हासिये पर आ गए। कम्युनिस्टों
की कभी भारत में तूती बोलती थी। हालाँकि कम्युनिस्ट बंगाल,त्रिपुरा और केरल से आगे कभी
नहीं बढे। साठ और सत्तर के दशक में कम्युनिस्टों ने अपने बाड़े से निकलकर आंध्रा ,तमिलनाडु,
ओडिसा सहित उत्तर भारत के बिहार, महाराष्ट्र ,राजस्थान मध्य प्रदेश, यू पी ,असम और पंजाब
आदि राज्यों में अपने संघर्ष के बूते अपनी पहचान बनाई। मगर शीघ्र कम्युनिस्ट बंट गए और
खंड खंड होने के बाद उनकी ताकत लगातार घटती गई। कभी संसद में 64 का आंकड़ा पार
करने वाले कम्युनिस्ट आज 5 तक पहुँच गए।
जेएनयू आंदोलन और खबरिया चैनलों पर कम्युनिष्टों की दहाड़ देखकर यह भ्रम होना
स्वाभाविक है की वामपंथी ताकतें अभी वजूद में है। हालाँकि यह एक सपना सा लगता है क्योंकि
पिछले लोकसभा चुनाव में जनता द्वारा नकार देने के बाद संसद में इनकी संख्या पांच पर
आकर सिमट गयी है। खबरिया चैनलों की बहस में यदा कदा कम्युनिष्ट नेता आ जाते है।
उनकी बातों को सुनकर हंसी भी आती है और दुःख भी होता है। एक आंदोलनकारी पार्टी का यह
हश्र देखकर दुनिया चकित है। प्रेस से वार्ता के दौरान कम्युनिष्ट नेता यह दर्शाते है जैसे
देशवासियों का भारी समर्थन इनके कन्धों पर है। कभी मजदूर आंदोलन का सिरमौर रही इन
पार्टियों का समर्थन यहाँ से भी दरक गया। कम्युनिस्ट इस समय दो राह पर खड़े है। एक तरफ
भाजपा का पुरजोर विरोध कर रहे है तो दूसरी तरफ कांग्रेस से गलबहियां बढ़ा रहे है जिससे
पार्टी की स्थिति बेहद कमजोर हो गई है। आज हालत यह हो गई है कि कांग्रेस से मेलमिलाप
के बाद भी इन्हें कांग्रेस से ही टकराना पड़ रहा है।
- बालमुकुन्द ओझा