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अंधेरी दुनिया को रोशनी

अंधेरी दुनिया को रोशनी

देश में हर वर्ष 25 अगस्त से 8 सितम्बर तक राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जाता है। इस वर्ष 37वां
राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य नेत्रदान के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना
और लोगों को नेत्रदान करने के लिए प्रेरित करना है। हर स्वस्थ व्यक्ति जिसके नेत्र सही हैं, नेत्रदान की
घोषण कर सकता है। इसके लिए एक शपथ-पत्र भरना होता है जो प्रायरू सभी शासकीय चिकित्सालयों,
निजी नेत्र विशेषज्ञों के पास उपलब्ध होता है। आंखें स्वस्थ न हों तो संसार की सारी खूबसूरती बेमानी
लगती हैं। फिर भी हम अपनी आंखों का पर्याप्त खयाल नहीं रख पाते। कई बार देखा गया है आँख में धूल
अथवा अन्य किसी कारण से एलर्जी हो जाती है तो हम कितने बेचैन हो जाते है। इसलिए यह सच ही कहा
गया है की आँख है तो जहान है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कॉर्निया की बीमारियाँ मोतियाबिंद और ग्लूकोमा के बाद होने वाली
दृष्टि हानि और अंधापन के प्रमुख कारणों में से एक हैं। ज्यादातर मामलों में दृष्टि की हानि को श्नेत्रदान’ के
माध्यम से उपचारित किया जा सकता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके बिभिन्न अंगों को दान
किया जा सकता हैं तथा उन अंगों को उन रोगियों में प्रत्यारोपित किया जा सकता है, जिन्हें उन अंगों की
आवश्यकता है। ऐसा ही एक अंग ‘आंख’ है। मृत्यु के बाद नेत्रदान से कार्निया रहित अँधा व्यक्ति शल्य
प्रक्रिया के माध्यम से कार्निया प्रत्यारोपण द्वारा फिर से देख सकता हैं, जिसमें क्षतिग्रस्त कॉर्निया की
जगह पर नेत्रदाता के स्वस्थ कॉर्निया को प्रतिस्थापित किया जाता है।
हमारे सभी धर्मों में दया, परोपकार, जैसी मानवीय भावनाएँ सिखाई जाती हैं। यदि हम अपने नेत्रदान करके
मरणोपरांत किसी की निष्काम सहायता कर सकें तो हम अपने धर्म का पालन करेंगे क्योकि इसमें कोई भी
स्वार्थ नहीं है इसलिये यह महादान माना जाता है। नेत्रदान करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के 6 से 8 घंटे के
अंदर ही नेत्रदान कर देना चाहिए। जिस व्यक्ति को नेत्रदान के कॉर्निया का उपयोग करना है, उसे 24 घंटे के
भीतर ही कॉर्निया प्रत्यारोपित कराना जरूरी होता है। नेत्रदान का मतलब शरीर से पूरी आंख निकालना नहीं
होता। इसमें मृत व्यक्ति की आखों के कॉर्निया का उपयोग किया जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार विश्वभर में लगभग 285 मिलियन लोग नेत्रहीन हैं।
इनमें से 39 लाख लोग अंधे और 246 मिलियन लोग मध्यम या गंभीर दृष्टि दोष वाले है। दृश्य दोष के
प्रमुख कारणों में असंशोधित अपवर्तक कमियां 43 प्रतिशत और मोतियाबिंद 33 प्रतिशत हैं। अधिकांश

अंधेपन (लगभग 80 प्रतिशत ) का बचाव यानि कि उपचार या रोकथाम की जा सकती है। विश्व के 20
प्रतिशत नेत्रहीन लोग भारत में हैं और हर वर्ष इनमें 20000 लोगों की वृद्धि हो रही है। शारीरिक,
सामाजिक, मानसिक तथा आर्थिक चुनौतियों के कारण उनकी स्थिति सचमुच दयनीय है क्योंकि अक्षम
लोग अपने आप से कुछ नहीं कर सकते और उन्हें दूसरों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। भारत मे करीब 1.25
करोड लोग दष्टिहीन है, जिसमे से करीब 30 लाख व्यक्ति नेत्ररोपण द्वारा दष्टि पा सकते हैं। सारे
दष्टिहीन नेत्ररोपण द्वारा दष्टि नहीं पा सकते क्योंकि इसके लिये पुतलियों के अलावा नेत्र सबंधित तंतुओं
का स्वस्थ होना जरुरी है। पुतलियां तभी किसी दष्टिहीन को लगायी जा सकती है जबकि कोई इन्हे दान में
दे। नेत्रदान केवल मत्यु के बाद ही किया जा सकता है।
देश में हर साल 80 से 90 लाख लोगों की मृत्यु होती है लेकिन नेत्रदान 25 हजार के आसपास ही होता है।
मृत्यु के बाद एक व्यक्ति चार लोगों को रोशनी दे सकता है। पहले दोनों आंखों से केवल दो ही कार्निया
मिलती थी लेकिन अब नई तकनीक आने के बाद से एक आंख से दो कार्निया प्रत्यारोपित की जा रही हैं।
डीमैक तकनीक से होने वाला यह प्रत्यारोपण शुरू हो गया है। खास बात यह है कि व्यक्ति के मरने पर
उसकी पूरी आंख नहीं बदली जाती है केवल रोशनी वाली काली पुतली ही ली जाती है। दोनों कार्निया एक
साथ नहीं बदली जाती है। मौत के छह घंटे तक ही कार्निया प्रयोग लायक रहती हैं।

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