मनुष्य प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना है
प्रकृति और मानव एक दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा
सकती है। मानव के मनुष्य के जन्म के साथ ही उसका प्रकृति से निकट का सम्बन्ध जुड़ जाता
हैं। प्रकृति अपनी चीजों का उपभोग स्वयं नहीं करती। हमारी आधारभूत जरूरतें जैसे हवा, पानी,
भोजन आदि सभी प्रकृति से ही प्राप्त होते है साथ ही प्रकृति ने हमें कई प्रकार के फूल, पक्षियां,
पशु, पेड़ पौधे, नीला आकाश, ज़मीन, नदिया, समुद्र, पहाड़, प्रदान किया है। जिससे मनुष्य एक
बेहतर और अच्छा जीवन व्यतीत कर पाता है। यह कहा जा सकता है प्रकृति ही मानव का
पोषण करती आई हैं। मनुष्य प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना है। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ छेड़छाड़
करता रहा तो प्रकृति भी एक दिन इंसान के वजूद के साथ छेड़छाड़ शुरू कर देगी । मनुष्य का यह शरीर
भी प्रकृति के पाँच तत्वों से मिल कर बना है, वायु, अग्नि, जल, आकाश, मिट्टी और फिर यह
प्रकृति हीं इस शरीर को वापस अपने में मिला लेती है। हम पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को
जारी रखना चाहते हैं तो प्रकृति का संतुलन हर हालत में बनाये रखना होगा। यदि प्रकृति के
अनुरूप हमने अपने आप को ढा़ल लिया तो ठीक नहीं तो अस्तित्व समाप्त होने का खतरा
उत्पन्न हो जायेगा।
प्रकृति व पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। प्राकृतिक संपदाओं के महत्व को समझना, उनका किफायती
उपयोग करना, उनके संरक्षण को प्राथमिकता देना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। जल, जंगल और
जमीन प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व हैं जिनके बगैर हमारी प्रकृति अधूरी है। प्रकृति के इन तीनों तत्वों का इस
कदर दोहन किया जा रहा है कि इसका सन्तुलन डगमगाने लगा है। प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर
छेड़छाड़ कर रहे हैं, यह उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय से भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प
जैसी आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। हम प्रकृति की चिंता नहीं करते और यही वजह है कि प्रकृति
ने भी अब हमारी चिंता छोड़ दी है। हमनें बिना सोचे समझे संसाधनों का दोहन किया है। यही वजह है कि
अब पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है और बाढ़, सूखा, सुनामी जैसी आपदाएं आ रही हैं। बरसों से
पर्यावरण को हम इंसानों ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। प्रकृति से साथ इंसान का लगातार खिलवाड़ एक
भयानक विनाश को आमंत्रण दे रहा है, जहां किसी को बचने की जगह नहीं मिलेगी। जल को व्यर्थ में बहा
रहे हैं जंगलों को काट रहे हैं और जमीन पर जहरीले कीटनाशक का उपयोग करके उसकी उर्वरक क्षमता और
उपजाऊ शक्ति को कमजोर कर रहे हैं। प्रकृति पर मंडराता खतरा जस का तस बना हुआ है। सबसे बड़ा
खतरा तो इसे ग्लोबल वार्मिंग से है। धरती के तापमान में लगातार बढ़ते स्तर को ग्लोबल वार्मिंग कहते है।
वर्तमान में ये पूरे विश्व के समक्ष बड़ी समस्या के रुप में उभर रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि धरती के
वातावरण के गर्म होने का मुख्य कारण का ग्रीनहाउस गैसों के स्तर में वृद्धि है। इसे लगातार नजरअंदाज
किया जा रहा है जिससे प्रकृति पर खतरा बढ़ता जा रहा है। ये आपदाएँ पृथ्वी पर ऐसे ही होती रहीं तो वह
दिन दूर नहीं जब पृथ्वी से जीव-जन्तु व वनस्पति का अस्तिव ही समाप्त हो जाएगा।
मनुष्य का प्रकृति से अटूट सम्बंध है। प्रकृति की रक्षा, उसके संरक्षण और विलुप्ति की कगार पर पहुंच रहे
जीव-जंतु तथा वनस्पति की रक्षा का संकल्प प्रत्येक मानव का है। प्रकृति का संरक्षण प्राकृतिक संसाधनों के
संरक्षण से सबंधित है। इनमें मुख्यतः पानी, धूप, वातावरण, खनिज, भूमि, वनस्पति और जानवर शामिल
हैं। प्रकृति हमें पानी, भूमि, सूर्य का प्रकाश और पेड़-पौधे प्रदान करके हमारी बुनियादी आवश्यकताओं को
पूरा करती है। इन संसाधनों का उपयोग विभिन्न चीजों के निर्माण के लिए किया जा सकता है जो निश्चित
ही मनुष्य के जीवन को अधिक सुविधाजनक और आरामदायक बनाते हैं।
प्रकृति का संरक्षण हमारे सुनहरे भविष्य का आधार है। मनुष्य जन्म से ही प्रकृति और पर्यावरण के सम्पर्क
में आ जाता है। प्राणी जीवन की रक्षा हेतु प्रकृति की रक्षा अति आवश्यक है। वर्तमान समय में विभिन्न
प्रजाति के जीव जंतु, वनस्पतियां और पेड़-पौधे विलुप्त हो रहे हैं जो प्रकृति के संतुलन के लिए बहुत ही
भयावह है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समय समय पर प्रकृति का दोहन करता चला आ
रहा है। अगर प्रकृति के साथ खिलवाड़ होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमें शुद्ध पानी, हवा, उपजाऊ
भूमि, शुद्ध पर्यावरण , वातवरण एवं शुद्ध वनस्पतियाँ नहीं मिल सकेंगी। इन सबके बिना हमारा जीवन
जीना मुश्किल हो जायेगा। हमारा शरीर प्रकृति के पांच तत्वों से मिल कर बना है। यदि हम प्रकृति की रक्षा
करेंगे तथा उससे अपनापन रखते हैं तो प्रकृति भी हमारे शरीर की रक्षा करेगी। हम अनेक प्रकार की
बीमारियों से बचे रहेंगे। प्रकृति का संरक्षण मानव जाति का संरक्षण है क्योंकि ये प्राकृतिक तत्व ही हैं जो
हमें जीवन देते हैं। ऐसे में यह समाज के हर व्यक्ति का दायित्व है कि वह अपने आसपास के प्रकृतिक
संसाधनों की रक्षा करे।
-बाल मुकुन्द ओझा