खारिज कांग्रेस से गंठजोड़ करने को बेक़रार नीतीश
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी एकता के केंद्रबिंदु बनने हेतु प्रयासरत हैं। विपक्ष से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने की चाहत में उन्होंने सात महीने पहले एनडीए का साथ छोड़ा था। तब से लगातार प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को रिझाने में लगे हैं। उनके लिहाज से लोकसभा की सदस्यता और सरकारी कोठी तक गंवा बैठे राहुल गांधी से हाल ही में हुई मुलाकात महत्वपूर्ण है। असल में नीतीश कुमार 2009 से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने की जुगत में लगे हैं जब लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में एनडीए को हार मिली थी। यह बात दीगर है कि तब वो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से आस लगाए बैठे थे। इसके लिए वह आज भी उम्र की वजह से राजनीति से रिटायर हो चुके आडवाणी जी से अपने मधुर रिश्ते की दुहाई देते रहते हैं। भाजपा ने बेजोड़ जीत के लिए 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर नीतीश की उम्मीद पर पहला कुठाराघात किया था। इससे निराश होकर उन्होंने एनडीए का दामन छोड़ धुरविरोधी लालू प्रसाद को गले लगाना और लोहिया जैसे बड़े समाजवादी नेताओं की भावना के विपरीत कांग्रेस के साथ गठबंधन कबूल कर लिया। अब तो राजनीतिक पंडित भी नहीं सनझ पा रहे कि न जाने कौनसी मजबूरी है है जो नीतीशकुमार कांग्रेस से हाथ मिलाने को बेक़रार है । अगर नीतीश में नैतिकता का लोप नहीं हुआ होता तो वे साथी के तौर पर जनता द्वारा खारिज की जा चुकी कांग्रेस से हाथ मिलाने को तैयार नहीं होते। वह तो कांग्रेस को तोड़ कर उसके नेताओं को अपने संस्कार सिखाने के लिए जेडीयू का हिस्सा बनाते रहे हैं। अशोक चौधरी इसके बड़े उदाहरण आपको मिल जाएंगे। आश्चर्य तो तब हुआ था, जब विपक्षी एकता के लिए वे उसी कांग्रेस के आगे गिड़गिड़ा रहे थे, जिसको बिहार में नेस्तनाबूद करने की उन्होंने चाल चली थी। कांग्रेस ने भी उन्हें बातचीत के लिए बुलाया तो अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के घर। खरगे अगर अपनी पार्टी के अध्यक्ष हैं तो उनसे बात करने के लिए जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ही काफी थे। दो पार्टियों के अध्यक्ष बात करते तो यह शोभा भी देता। नीतीश का जो कद रहा है, उसमें सोनिया गांधी या राहुल गांधी से मुलाकात ही मायने रखती है।
नीतीश कुमार एक जुमला अक्सर दोहराते रहते हैं कि करप्शन, कम्युनलिज्म और क्राइम से कोई समझौता नहीं करेंगे, चाहे कोई भी उनके साथ रहे। कोई से उनका आशय भाजपा और आरजेडी से होता है। इसलिए कि वे बदल-बदल कर इन्हीं दो दलों के साथ अपनी सरकार चलाते आए हैं। सच्चाई यह है कि उन्हें अब अपने घोष वाक्य से इतर जाने में कोई संकोच नहीं होता। लालू परिवार पर लगे करप्शन के आरोपों से कौन अनजान है। लालू यादव तो चारा घोटाले के सजायाफ्ता ही हैं। तेजस्वी यादव सीबीआई और ईडी का सामना कर रहे हैं। लालू यादव की पत्नी और बेटियां भी करप्शन के आरोपों से अब घिर चुकी हैं। लेकिन उनके साथ सरकार चलाने में अब नीतीश को करप्शन आड़े नहीं आता। और तो और, कांग्रेस के दो शीर्ष नेता- सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी नेशनल हेराल्ड केस में फंसे हुए हैं। फिर भी नीतीश को इससे कोई परेशानी नहीं है। यहां यह जिक्र करना जरुरी होगा कि 2017 में तेजस्वी यादव के खिलाफ सीबीआई ने जब केस दर्ज किया था तो नीतीश ने अच्छी खासी चलती सरकार पलट दी थी। आरजेडी से किनारा कर भाजपा के साथ सरकार बना ली थी। कहा था- तेजस्वी जनता के बीच जाकर अपने निर्दोष होने की सफाई दें। सबको पता है कि सियासत में सफलता के सोपान तक पहुंचने में नीतीश को सर्वाधिक मदद कैसे मिली। लालू यादव और राबड़ी देवी के शासन काल में अपराध और भ्रष्टाचार का बोलबाला था। यह देख कर ही पटना हाईकोर्ट ने तब जंगल राज की बात कही थी। नीतीश ने बिहार में जंगल राज को मुद्दा बनाया। लालू-राबड़ी का विरोध किया। नीतीश का 1994 से शुरू हुआ लालू-राबड़ी का विरोध आखिरकार 2005 में रंग लाया और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई। जिनके विरोध के बिना पर नीतीश ने अपना जनाधार बनाया और कामयाबी हासिल की, आज उसी आरजेडी के साथ उनके सट जाने का अर्थ समझने में किसी को अधिक माथापच्ची करने की जरूरत ही नही। हद तो तब हो गई, जब कुर्सी के मोह में उन्होंने सजायाफ्ता लालू यादव के साथ विपक्षी एकजुटता अभियान की शुरुआत की। लालू के साथ ही वे पहली बार सोनिया गांधी से मिले थे। इस बार तो उन्होंने अपने अभियान की शुरुआत के लिए लालू का आशीर्वाद भी लिया।
नीतीश कुमार का बिहार में जो भी जनाधार बना, उसके पीछे तीन तरह का सहयोग मिला। पहला सहयोग तो उनके लव-कुश समीकरण का मिला, जो कुर्मी और कुशवाहा जातियों को लेकर बना था। दूसरा समर्थन लालू राज से उकताए लोगों का था। तीसरा समर्थन उन अल्पसंख्यक मुसलमानों का मिला, जो कांग्रेस के पराभव के बाद आरजेडी के हो गए थे। इसके अलावा कुछ फ्लोटिंग वोट भी उनको मिलते रहे, जो चुनाव के दिन अपना मानस बनाते हैं कि किसे वोट करना है। अब न वे पूरी तरह अपनी जाति के वोटों के हकदार-दावेदार रह गए हैं और न कुशवाहा वोटों के। इसलिए उपेंद्र कुशवाहा और आरसीपी सिंह उनकी जड़ खोदने में तन कर खड़े हैं। भाजपा के साथ रहने के कारण अल्पसंख्यकों का भरोसा भी उनसे उनसे अब उठ गया है। इसका संकेत 2020 के विधानसभा चुनाव में ही मिल गया था, जब नीतीश की पार्टी से कोई भी मुस्लिम उम्मीदवार विधानसभा नहीं पहुंचा। अब नीतीश से किसी करिश्मा की उम्मीद ही बेमानी है। इसलिए कि उनका अपना जनाधार ही खिसक गया है।
अब वही नीतीश कुमार विपक्षी एकता के लिए नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे दस्तक देते फिर रहे हैं। शायद उम्र और औकात का असर है कि अपने बेटे समान राहुल गांधी के सामने उन्हें दंडवत की अदा में झुकना पड़ रहा है। राहुल के संस्कार भी देखिए कि बाप सामान नीतीश जी के हाथ जोड़े झुकने पर भी वे तन कर खड़े रहे। नीतीश जी अभिवादन करने नरेंद्र मोदी के सामने भी झुके थे, पर मोदी ने उतना ही झुक कर अभिवादन का जवाब भी दिया था।
नीतीश कुमार की इस दुर्दशा को देख कर भाजपा का खुश होना स्वाभाविक है। इसलिए कि उसकी ही कब्र खोदने का बीड़ा नीतीश जी ने उठाया है। साथ-साथ उनको भी जरूर आनंद आ रहा होगा, जिन्हें नीतीश ने उनके बढ़ते कद के कारण बाहर का रास्ता दिखा दिया या जिन्हें बाहर जाने पर मजबूर कर दिया था कभी। शरद यादव और जार्ज फर्नांडीस तो इनकी हालत पर इतराने के लिए अब इस दुनिया में रहे नहीं, लेकिन आरसीपी सिंह और उपेंद्र कुशवाहा के मन में जरूर लड्डू फूट रहे होंगे। इतरा तो प्रशांत किशोर उर्फ पीके भी रहे होंगे, जिन्होंने नीतीश की जीत तो पक्की कर दी थी, पर झटके में उन्होंने उन्हें बाहर कर दिया था। इस बार तो बिना पार्टी के अपना कैंडिडेट जिता कर पीके ने नीतीश जी के मुंह पर तमाचा भी जड़ दिया है।
जीतन राम मांझी ने तो नीतीश को चिढ़ाने-बिदकाने का नायाब तरीका अपनाया है। उनके एकता प्रयास को सांकेतिक चुनौती देने के लिए हड़बड़ी में मांझी जी ने दिल्ली की दौड़ ही लगा दी। इधर नीतीश कुमार कांग्रेस के राहुल, खरगे और अरविंद केजरीवाल से मिल कर मन ही मन इतरा रहे थे, उधर मांझी उसी दिन दिल्ली में भाजपा से सांठ-गांठ में लगे थे। मांझी अगले ही दिन भाजपा के चुनावी चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह से मिल कर बतिया भी आए। हां, इतना जरूर किया कि बाहर निकलते ही नीतीश कुमार को पीएम मटेरियल बता कर बूझो तो जानें की स्थिति में उन्हें डाल दिया। नीतीश को पहले से ही इसका अंदाजा रहा है। तभी तो पूर्णिया में हुई महागठबंधन की रैली में उन्होंने कहा था कि मांझी जी का मन भी इधर-उधर होते रहता है।
राहुल गांधी ढाई-तीन महीने भारत को जोड़ने के लिए भ्रमण पर निकले थे। चीजों को देखने का हर आदमी का नजरिया अलग होता है। उन्हें भारत टूटा या टूटता हुआ दिखा था या दिख रहा है। इसलिए कि अभी यात्रा अधूरी है। 138 साल पुरानी पार्टी के नए नेता के रूप में उनसे यह बरदाश्त कैसे होता। सो, निकल पड़े थे भारत को जोड़ने। भारत को उन्होंने ऐसा जोड़ा कि भारत को दो टुकड़ों में बांटने वाले विलायत ने उन्हें अपने यहां भाषण के लिए न्योत दिया। वहां वे भारत को लेकर ऐसा रोना रो आए, जैसे पंचइती करने तुरंत विलायती यहां पहुंच जाएंगे। वे भूल गए कि खुद अपने दल के लोगों का दिल नहीं जोड़ पाए तो भारत को जोड़ना कितना मुश्किल होगा। सचिन पायलट की नौटंकी तो उनके सामने हो रही है। अब तो नीतीश जी भी उनके अभियान में शामिल हो गए हैं। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि राहुल देश जोड़ने के लिए घूम रहे थे तो नीतीश जी दलों को जोड़ने के लिए दर-दर घूम रहे हैं। समानता यह कि दोनों जोड़ने का ही काम कर रहे हैं। खैर, आगे-आगे देखिए, होता है क्या !
-अशोक भाटिया