पीएम मोदी ने साझा किया संस्कृत सुभाषित, बताया सुशासन का मूल मंत्र
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया, जिसमें शासक के कर्तव्यों और जनकल्याण का संदेश दिया गया है। इस श्लोक का भावार्थ है कि शासन की सफलता जनता की देखभाल, उसकी सुरक्षा और प्रकृति के हितों का ध्यान रखने में निहित है।
प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया श्लोक है—
“पालयन् प्रकृतिं राजा सुखी भवति नान्यथा।
प्रकृतिश्च हिता यस्य स राजा सर्वकामधुक्॥”
इसका आशय है कि जो राजा अपनी प्रजा का उचित पालन-पोषण करता है, वही सुखी रह सकता है। जिस शासक के कार्य जनता और प्रकृति, दोनों के हित में होते हैं, उसका राज्य समृद्धि और खुशहाली की दिशा में आगे बढ़ता है।
प्राचीन ग्रंथ में बताए गए हैं शासन के सिद्धांत
यह सुभाषित प्राचीन संस्कृत ग्रंथ ‘कामंदकीय नीतिसार’ से जुड़ा है, जिसकी रचना आचार्य कामंदक ने की थी। इस ग्रंथ में राज्य संचालन, राजधर्म और शासक के दायित्वों से संबंधित सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है।
श्लोक का संदेश है कि केवल सत्ता हासिल करना किसी शासक की सफलता का पैमाना नहीं हो सकता। जनता की जरूरतों को समझना, उसके हितों की रक्षा करना और राज्य में संतुलित व्यवस्था बनाए रखना भी शासन की अहम जिम्मेदारियां हैं।
लोककल्याण के साथ प्रकृति का हित भी जरूरी
इस सुभाषित में ‘प्रकृति’ के हित का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। इसका व्यापक भाव यह है कि शासन की नीतियां ऐसी होनी चाहिए, जिनसे लोगों के जीवन के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण का भी संरक्षण हो सके।
श्लोक में प्रयुक्त ‘सर्वकामधुक्’ शब्द ऐसे शासक के लिए है, जो अपनी प्रजा की आकांक्षाओं को पूरा करने में समर्थ हो। इसकी तुलना कामधेनु से की गई है, जिसे समृद्धि और इच्छापूर्ति का प्रतीक माना जाता है।
इस तरह यह प्राचीन संदेश जनहित, जिम्मेदार शासन और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता के महत्व को सामने रखता है। इसका मूल भाव यही है कि जनता के कल्याण को प्राथमिकता देने वाला शासन ही समाज में सुख, शांति और समृद्धि की मजबूत नींव तैयार कर सकता है।