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पीएम मोदी के 25 साल : इंफ्रास्ट्रक्चर को नागरिकों की जरूरतों से जोड़ने पर जोर

पीएम मोदी के 25 साल : इंफ्रास्ट्रक्चर को नागरिकों की जरूरतों से जोड़ने पर जोर

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों के दौरान देश में बुनियादी ढांचे के विकास और उसकी योजना बनाने के तरीके में बदलाव आया है। नीति आयोग के सदस्य और पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा ने अपने लेख में यह बात कही है। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने भी इस लेख को साझा किया है।

गौबा के मुताबिक, इंफ्रास्ट्रक्चर को अब केवल सड़क, रेलवे लाइन या अन्य भौतिक सुविधाओं के निर्माण तक सीमित रखने के बजाय नागरिकों की जरूरतों और आर्थिक उत्पादकता से जोड़कर देखने पर जोर दिया गया है। उनके लेख में रेलवे, राष्ट्रीय राजमार्गों, बंदरगाहों और शहरी परिवहन में हुए विकास को इस बदलाव के उदाहरण के तौर पर पेश किया गया है।

उन्होंने कहा कि समर्पित माल गलियारों, रेलवे विद्युतीकरण, वंदे भारत ट्रेनों और आधुनिक रेलवे स्टेशनों ने रेल परिवहन में बदलाव लाने में भूमिका निभाई है। इसी तरह राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे का विस्तार, बंदरगाहों का विकास तथा मेट्रो नेटवर्क की बढ़ती पहुंच ने देश के विभिन्न हिस्सों के बीच कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने की दिशा में काम किया है।

अलग-अलग परियोजनाओं के बजाय एकीकृत व्यवस्था पर जोर

राजीव गौबा ने अपने लेख में बताया कि इंफ्रास्ट्रक्चर विकास का सबसे अहम पहलू केवल नई परिसंपत्तियों का निर्माण नहीं, बल्कि उन्हें एक-दूसरे से जोड़कर प्रभावी ढंग से काम करने योग्य बनाना है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आम नागरिक सड़क, रेलवे, बंदरगाह और बिजली व्यवस्था को अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारी के रूप में नहीं देखता। उसके लिए ये सभी सुविधाएं एक-दूसरे से जुड़ी व्यवस्था का हिस्सा हैं। यदि किसी एक कड़ी में कमी रह जाए, तो बाकी निवेशों का पूरा लाभ मिलना मुश्किल हो सकता है।

इसी सोच के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर को नागरिकों का जीवन आसान बनाने, परिवहन और सेवाओं को बेहतर करने तथा आर्थिक गतिविधियों को गति देने वाले व्यापक तंत्र के रूप में देखने की जरूरत पर जोर दिया गया है।

परियोजनाओं की बाधाएं दूर करने में प्रगति की भूमिका

गौबा ने कहा कि किसी भी बड़ी परियोजना की सफलता के लिए योजना बनाने के साथ उसका समय पर क्रियान्वयन भी जरूरी है। भूमि अधिग्रहण, जरूरी मंजूरियां, उपयोगिताओं को दूसरी जगह स्थानांतरित करना, कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दे और केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी जैसी चुनौतियां अक्सर काम में देरी का कारण बनती हैं।

इन समस्याओं से निपटने के लिए शुरू किए गए प्रगति मंच का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इसके जरिए विभिन्न विभागों और संबंधित प्राधिकरणों को एक साथ लाकर परियोजनाओं की समीक्षा की जाती है। इसका उद्देश्य अड़चनों की पहचान कर उनके समाधान की दिशा में तेजी से काम करना है।

पीएम गति शक्ति और प्रगति को बताया अहम पहल

लेख में गौबा ने पीएम गति शक्ति और प्रगति को प्रधानमंत्री मोदी की प्रशासनिक कार्यशैली के दो महत्वपूर्ण उदाहरण बताया। उनके अनुसार, गति शक्ति बुनियादी ढांचे की योजना को एकीकृत नजरिए से देखने में मदद करती है, जबकि प्रगति परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली विशिष्ट समस्याओं को दूर करने पर ध्यान देती है।

उन्होंने कहा कि इन पहलों के जरिए बड़े विकास लक्ष्यों और जमीनी स्तर की व्यावहारिक चुनौतियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने का प्रयास किया गया है। इससे विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और परियोजनाओं की निगरानी को महत्व मिलता है।

आर्थिक उत्पादकता और नागरिक सुविधाओं पर फोकस

राजीव गौबा के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन को केवल निर्मित सड़कों, रेलवे लाइनों या अन्य बुनियादी सुविधाओं की संख्या से नहीं आंका जाना चाहिए। उनके लेख में इस अवधि की प्रमुख उपलब्धि के रूप में इंफ्रास्ट्रक्चर को एकीकृत, नागरिक-केंद्रित और परिणामोन्मुखी व्यवस्था के तौर पर देखने के दृष्टिकोण को रेखांकित किया गया है।

उनका कहना है कि बेहतर बुनियादी ढांचा नागरिकों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ व्यापार, परिवहन और अन्य आर्थिक गतिविधियों की उत्पादकता बढ़ाने में भी योगदान दे सकता है। लेख में पीएम गति शक्ति और प्रगति जैसे मंचों को इसी व्यापक दृष्टिकोण से जोड़कर देखा गया है।

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