राजस्थान में राजनीति का दंगल शुरू जादूगर, महारानी ओर पायलट लड़ने को तैयार
मेहरबान, कद्रदान ओर साहेबान आइये राजस्थान में राजनीति का दंगल शुरू हो चुका है और आपके मनपसंद पहलवान अखाड़े में उतर चुके हैं। इस साल दिसंबर तक आपको राजनीति के दंगल का भरपूर मनोरंजन देखने को मिलेगा क्योंकि आपके मनपसंद पहलवान राजनीतिक मनोरंजन करने में माहिर हैं। इन दिनों जैसे जैसे गर्मी बढ़ रही है राजस्थान में सियासत का पारा भी लगातार बढ़ रहा है और यह पारा दिसम्बर तक बढ़ता ही रहेगा । इसके लुढ़कने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता ओर अगर कोई लुड़केगा तो वह केवल राजनीति के दंगल का पहलवान ही होगा जिसके अनुकूल उसके दल में परिस्थियां नहीं रही तो वह दूसरे दल में लुड़क जाएगा और इसके लिए दोनों ओर से बड़ी मात्रा में मालाओ के ऑर्डर पहले ही दिए जा चुके हैं कि जो भी आए उसके स्वागत में कोई कमी न रह जाए।
राजस्थान की राजनीति के अखाड़े में हम सबसे पहले बात करेंगे सत्ताधारी कांग्रेस की जो अभी हाल ही में कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में एकतरफा बड़ी जीत से उत्साहित है और राजस्थान में उसके कप्तान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जिन्हें राजनीति में जादूगर के नाम से भी जाना जाता है। गहलोत को जादूगर यूँ ही नहीं कहा जाता वे वास्तव में इसके योग्य भी है। राजस्थान की बात छोड़ो पूरे देश में कांग्रेस की बात की जाए तो आज अशोक गहलोत कांग्रेस में गांधी परिवार के बाद सबसे बड़े कद्दावर नेता है जिनका देश की राजनीति में बड़ा कद है । जादूगर राजनीति में अपने प्रतिद्वंदियों को धूल चटाने में माहिर हैं। राजस्थान कांग्रेस में गहलोत के बाद सबसे बड़ा नाम पूर्व केंद्रीय मंत्री व पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट का आता है जो राजस्थान में कांग्रेस के दूसरे सबसे बड़े कद्दावर नेता है लेकिन वे आज भी अपनी ही पार्टी में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं ओर वर्तमान परिस्थिति के अनुसार तो उन्हें आगे भी संघर्ष ही करना पड़ सकता है क्योंकि जादूगर का अभी राजस्थान छोड़ने का दूर दूर तक कोई इरादा नहीं लगता। ऐसे में उनके सामने सभी विकल्प खुले हुए हैं।
कांग्रेस ने हाल ही में कर्नाटक चुनाव के बाद सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री बनाकर स्पष्ट कर दिया है कि वो अपने पुराने व मजबूत स्तम्भो के दम पर ही आगे बढ़ेगी । कांग्रेस को आज भी अपने पुराने चांवलो पर भरोसा है और यही कारण है कि युवा लोगों का कांग्रेस के प्रति रुझान कम हो रहा है। कर्नाटक चुनाव में लग रहा था कि कांग्रेस डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यही बात 2018 के विधानसभा चुनावों में भी हुई थी कि राजस्थान में सचिन पायलट ओर मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में \कमलनाथ ओर राजस्थान में अशोक गहलोत को कमान दी परिणाम स्वरूप मध्यप्रदेश में सरकार गिर गई और राजस्थान में भी हालात बने थे लेकिन......? आप सब भली भांति जानते हैं। सत्ताधारी कांग्रेस में स्थिति विस्फोटक होती जा रही है क्योंकि सचिन पायलट लगातार बड़ी बड़ी जन सभाएं कर रहे हैं और मंच पर अपनी ही सरकार के खिलाफ वहां मौजूद नेता बोल रहे हैं ओर इसके साथ ही पायलट व गहलोत समर्थक आपस में मारपीट कर रहे हैं जो कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है क्योंकि यही हालत रहे तो सत्ता में वापसी मुश्किल होगी।
अब बात करते हैं भारतीय जनता पार्टी की जो राजस्थान में विपक्ष में बैठी हुई है लेकिन पूरे 5 सालों में भाजपा ने राजस्थान में एक मजबूत विपक्ष की भूमिका नहीं निभाई जिसके लिए वह जानी जाती है। राजस्थान में बीजेपी केवल कांग्रेस की आपसी फूट ओर अंतर्कलह से ही सत्ता की आस लगाए बैठी हुई है जो सत्ता वापसी के लिए पर्याप्त नहीं है। राजस्थान में भाजपा के पास पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से बड़ा चेहरा आज भी नहीं है जिसके दम पर वह चुनाव लड़ सके लेकिन महारानी कुछ दिनों से बैकफुट पर चली गई है क्योंकि राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत ने मंच से अपनी सरकार बचाने के लिए वसुंधरा राजे को धन्यवाद दिया था जिससे राजनीति के गलियारों में तूफान ला दिया और आनन फानन में वसुंधरा राजे को भी कड़े शब्दों में अशोक गहलोत के खिलाफ प्रतिक्रिया देनी पड़ी। गहलोत के वक्तव्य का असर दिल्ली तक हुआ। राजस्थान में सत्ता वापसी के लिए अकेली वसुंधरा राजे ही बीजेपी की ओर से संघर्ष कर रही थी और उन्हें आलाकमान का भी खुलकर समर्थन नहीं मिला । ऐसे में अशोक गहलोत के बयान ने हंगामा कर दिया लेकिन जहां तक मैं महारानी को जानता हूँ कि वे झुकने वाली नहीं है क्योंकि भाजपा में उनका कद बहुत बड़ा है जिसे नकारा नहीं जा सकता। चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं लेकिन राजस्थान भाजपा में स्थिति स्पष्ट नहीं है। स्थानीय नेता और कार्यकर्ता असमंजस में दिखाई दे रहे हैं कि समय का ऊँट किस करवट बैठेगा। कर्नाटक चुनाव के परिणाम के बाद माना जा रहा है कि राजस्थान में भाजपा आलाकमान कोई रिस्क लेना नहीं चाहेगा ओर विधानसभा चुनाव की कमान वसुंधरा राजे को सौंप सकता है क्योंकि महारानी की नाराजगी भाजपा के लिए भारी पड़ सकती है और इसका असर अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव पर दिखाई दे सकता है इसलिए महारानी को नजरअंदाज करने की सम्भावना अब कम ही दिख रही है। महारानी का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि राजस्थान भाजपा में उनसे बड़ा कोई नेता नहीं है और वे पूरे 5 साल सक्रिय रहकर विपक्ष की भूमिका निभाती रही है इसलिए उनकी वापसी की संभावना प्रबल दिख रही है। बहरहाल जो भी हो राजस्थान में राजनीति का दंगल जोरदार होने के साथ भरपूर मनोरंजक होने वाला है। इसकी पटकथा तैयार हो चुकी है। भले ही आलाकमान ने अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं की है लेकिन दोनों पार्टी की ओर से जादूगर, महारानी ओर पायलट अपनी तैयारी के साथ चुनावी दंगल में उतर कर लड़ने को तैयार हैं ओर उन्हें देखकर लगता है कि सब कुछ उनके मन मुताबिक होने वाला है लेकिन यह राजनीति का दंगल है जिसमें हर पल समीकरण बनते ओर बिगड़ते है।
-भवँर सिंह कछवाहा