सत्ता सुख के भंवर में फंसी राजस्थान भाजपा
सत्ता सुख के भंवर में फंसी राजस्थान भाजपा
बाल मुकुन्द ओझा
सत्ता सुख का सपना देखने वाली भाजपा राजस्थान में अभी तीन तरह की स्थिति से उबर नहीं
पा रही है। लगता है राजस्थान भाजपा में एन्टी इन्कम्बेंसी का भूत सर चढ़कर बोल रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हालिया दैारे के दौरान राजस्थान के बीजेपी नेताओं को नसीहत
दी थी कि सिर्फ गहलोत सरकार की एंटी-इनकम्बेंसी से राजस्थान में बीजेपी सरकार नहीं
आएगी। इसके लिए राजस्थान में बीजेपी के सभी नेताओं को एकजुट होकर मेहनत करके कमल
खिलाना पड़ेगा । इस नसीहत का भाजपा नेताओं पर कितना और कैसा प्रभाव पड़ा यह तो आने
वाला विधान सभा चुनाव ही बताएगा मगर लक्षण तो ठीक दिखाई नहीं दे रहे है। भाजपा में
फूट की चर्चा अभी प्रदेश के चौक चौराहों पर साफ़ सुनाई दे रही है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे
सीएम फेस से कम पर मानने को तैयार नहीं है। भाजपा आलाकमान वसुंधरा की यह शर्त
स्वीकारने को तैयार नहीं है। जब तक पार्टी की यह गांठ नहीं सुलझेगी तब तक लगता नहीं है
पार्टी प्रदेश में अपनी जुझारू छवि का निर्माण कर पायेगी। भाजपा नेताओ को अभी भी यह भ्रम
है की गहलोत सरकार की एंटी-इनकम्बेंसी उनकी नैय्या पार करेगी। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री
अशोक गहलोत लगातार प्रदेश का दौरा कर जनता की नब्ज को टटोल रहे है और उन्हें इसमें
आंशिक सफलता भी मिली है। अब यदि सचिन पायलेट का मसला राजी ख़ुशी निपट जाये तो
सरकार रिपीट करने के उनके दावे को बल मिलेगा।
भाजपा आलाकमान ने प्रदेश में पार्टी संगठन को एकजुट करने के प्रयास शुरू कर दिये है। पूर्व
मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इसी कड़ी में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और संगठन महामंत्री बी एल
संतोष से मुलाकात की है। मगर इन मुलाकातों का कोई सकारात्मक असर नज़र नहीं आया है
। पार्टी नेताओं की गुटबंदी ज्यों की त्यों दिखाई दे रही है। सतीश पूनिया के कार्यकाल के दौरान
चाहे वसुंधरा राजे किसी कार्यक्रम में नहीं आयी हो मगर पार्टी संगठन की मज़बूती लोगों में
दिखाई दी थी। इस समय पार्टी के नव नियुक्त अध्यक्ष सीपी जोशी संगठंनातमक ढांचे को सुदृढ़
करने के प्रयासों में जुटे है मगर अपनी टीम अब तक नहीं बना पाए है। नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र
राठौड और सांसद किरोड़ी मीणा अवश्य धरातल पर नज़र आ रहे है। किरोड़ी अपनी वन मेन
आर्मी के रूप में अपना वज़ूद बनाये हुए है वहीं राठौड मज़बूती से पार्टी को आगे ले जाने के
प्रयास में रात दिन एक किये हुए है।
वसुंधरा सीएम का चेहरा बनने के लिए प्रयासरत है। मगर पार्टी आलाकमान प्रधान मंत्री मोदी
के चेहरे को आगे रखकर चुनाव लड़ना चाहती है। पार्टी आलाकमान वसुंधरा को नाराज करने के
मूढ़ में नहीं है क्योंकि पार्टी का ध्यान 2024 के लोकसभा चुनाव पर केंद्रित है। राजस्थान में
विधानसभा चुनाव इसी साल के अंत में होने जा रहे है। प्रदेश भाजपा अभी कई गुटों में बंटी हुई
है। गुलाबचंद कटारिया को असम का राज्यपाल बनाने के बाद भी प्रदेश संगठन में गुटबंदी कम
नहीं हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने पिछले साढ़े चार साल में स्वयं को पार्टी गतिविधियों
से अलग थलग रखा है। वह पार्टी के किसी आंदोलन में शामिल नहीं हुई। सतीश पूनिया के
कार्यकाल के दौरान वसुंधरा ने अपने आप को सांगठनिक क्रियाक्लापों से दूर रखा। पूनिया ने भी
राजे को कोई भाव नहीं दिया। उन्होंने संगठन को मजबूती और धार देने के लिए अनथक
प्रयास किये। कई जनांदोलनों में चोटिल भी हुए। उनके कार्यकाल की एक बड़ी उपलब्धि
घनश्याम तिवाड़ी की भाजपा में वापसी के रूप- में देखा जा सकता है। वर्तमान में सीपी जोशी
पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और राजेंद्र राठौड़ नेता प्रतिपक्ष और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया उप
नेता प्रतिपक्ष के पद पर काबिज है। चुनावी रणनीतिकारों का मानना है वसुंधरा राजे को अलग
थलग कर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होना नामुमकिन है। वसुंधरा समर्थक विधायक और पूर्व
मंत्री अपनी नेता को सीएम फेस बनाकर अगला चुनाव लड़ने की वकालत कर रहे है तो दूसरा
खेमा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के फेस पर चुनाव लड़ने की बात पर अड़ा हुआ है। पार्टी नेतृत्व ने
प्रदेश के नेताओं को अपना रुख बता दिया है। प्रदेश में हो रही सभा,धरने-आंदोलन आदि सभी
आयोजनों में नेताओं एकजुटता कायम रखने के लिए कहा गया है। पार्टी के निर्देश पर होर्डिंग्स
में पूर्व सीएम वसुंधरा राजे,प्रदेशाध्यक्ष सी.पी.जोशी व विपक्ष के नेता राजेंद्र राठौड़ की फोटो
लगाई जा रही है। इसका मकसद सामूहिक नेतृत्व का संदेश देना है।
- बाल मुकुन्द ओझा