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कर्तव्य पथ पर राजस्थान की उस्ता झाँकी ने सबका मन मोहा

कर्तव्य पथ पर राजस्थान की उस्ता झाँकी ने सबका मन मोहा

  • बीकानेर की पारंपरिक शिल्पकला को राष्ट्रीय मंच पर मिली नई पहचान

 

नीति गोपेन्द्र भट्ट

नई दिल्ली। 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर आयोजित भव्य परेड में राजस्थान की उस्ता कला पर आधारित झाँकी ने अतिथियों,दर्शकों और कला समीक्षकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। झाँकी ने न केवल राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया, बल्कि झाँकी विलुप्त होती पारंपरिक शिल्पकला के संरक्षण और कारीगरों के कौशल को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का सशक्त माध्यम भी बनी।

राजस्थान ललित कला अकादमी के सचिव और झाँकी प्रभारी डॉ रजनीश हर्ष ने बताया कि जाने माने कलाकार हरशिव शर्मा द्वारा डिजाइन राजस्थान की यह झाँकी बीकानेर की विश्वप्रसिद्ध पाँच सौ वर्षों से भी पुरानी उस्ता कला पर केंद्रित थी। उस्ता कला, विशेष रूप से ऊँट की खाल पर की जाने वाली सुनहरी चित्रकारी, अपनी महीन नक्काशी, प्राकृतिक रंगों और सोने की पत्तियों के उपयोग के लिए जानी जाती है। झाँकी के अग्रभाग में ऊँट की खाल से निर्मित पारंपरिक पैनल और सजावटी कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गईं, जिन पर उस्ता शैली में की गई जटिल चित्रकारी दर्शकों को मंत्रमुग्ध करती रही।

 

कर्तव्य पथ पर राजस्थान की उस्ता झाँकी ने सबका मन मोहा

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ,प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और समारोह की मुख्य अतिथि यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्षउर्सुला वॉन डेर लेयेन ने झाँकी को सराहा । उप राष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन, केन्द्रीय रक्षा मन्त्री राजनाथ सिंह, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला,केन्द्रीय मन्त्री और बीकानेर के साँसद अर्जुनराम मेघवाल ने करतल ध्वनि से झाँकी कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। झांकी के डिजाइनर एवं पर्यवेक्षक हरशिव शर्मा ने बताया कर्तव्य पथ पर राजस्थान मरुस्थल का स्वर्ण स्पर्श” विषयक राजस्थान की झांकी के अग्र भाग में राजस्थान के प्रसिद्ध लोक वाद्य रावणहट्टा का वादन करते कलाकार की 180 डिग्री घूमती प्रतिमा प्रदर्शित की गई। इसके दोनों ओर उस्ता कला से सजी सुराही, कुप्पी और दीपक आकर्षक फ्रेमों में लगाए गए थे । झांकी का यह भाग लगभग 13 फीट ऊँचा था ।

कर्तव्य पथ पर राजस्थान की उस्ता झाँकी ने सबका मन मोहा

शर्मा ने बताया कि झाँकी के ट्रेलर भाग में उस्ता कला से अलंकृत घूमती हुई पारंपरिक कुप्पी तथा हस्तशिल्प पर कार्य करते कारीगरों के दृश्य प्रदर्शित किए गए, जिसने इस कला की जीवंत परंपरा को दर्शाया। पृष्ठभाग में विशाल ऊँट और उस पर सवार ऊँट की प्रतिमा राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति एवं लोक जीवन का सशक्त प्रतीक बनें । दोनों ओर उस्ता कला से सजे मेहराबों में पत्तेदार स्वर्ण कारीगरी के उत्कृष्ट उत्पाद भी प्रदर्शित किए गए। शर्मा ने बताया कि झांकी के दोनों ओर गेर लोक नृत्य प्रस्तुत करते कलाकारों ने राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया।इस प्रकार यह झांकी पारंपरिक कला, लोक संस्कृति और शाही विरासत का सजीव संगम बनकर सामने आई। उन्होंने बताया कि राजस्थान झाँकी को साकार करने में इसकी टीम के सदस्यों प्रीति सोलंकी,समुंद्र पाल सिंह और जन्मेजय शर्मा तथा फैब्रिकेटर आर एस भटनागर एंड संस के प्रबोध कुमार भटनागर आदि का उल्लेखनीय योगदान रहा है। इस झांकी का निर्माण राज्य के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की भावना अनुरूप राज्य की उप मुख्यमंत्री एवं पर्यटन, कला एवं संस्कृति मंत्री दिया कुमारी, अतिरिक्त मुख्य सचिव प्रवीण गुप्ता तथा उप सचिव अनुराधा गोगिया के मार्गदर्शन में किया गया। झाँकी में ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की भावना भी स्पष्ट रूप से झलकती रही। उस्ता कलाकारों के जीवन्त प्रदर्शन से यह दिखाया गया कि कैसे पारंपरिक शिल्प आजीविका का सशक्त साधन बन सकता है और ग्रामीण व अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की राष्ट्रीय प्रस्तुति से न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उस्ता कला को नई पहचान मिलेगी।

कर्तव्य पथ पर राजस्थान की उस्ता झाँकी ने सबका मन मोहा

झाँकी का समग्र रंग-संयोजन स्वर्णिम, मरून और रेगिस्तानी रंगों पर आधारित था, जो थार की माटी, सूर्य की आभा और राजस्थानी शौर्य परंपरा का प्रतीक बनकर उभरा। झाँकी के मध्य भाग में बीकानेर की पहचान माने जाने वाले शिल्पकारों द्वारा उस्ता कला के सजीव प्रदर्शन को दर्शाया गया, जिसने यह संदेश दिया कि यह कला केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि आज भी जीवंत और प्रासंगिक है। पृष्ठभूमि में उभरे स्थापत्य रूपों ने बीकानेर और राजस्थान की बेजोड़ शिल्प की झलक प्रस्तुत की गई । पारंपरिक राजस्थानी लोक-संगीत की थीम और कलाकारों की मुद्राओं ने झाँकी को सजीव बना दिया। इस झाँकी का प्रमुख उद्देश्य स्थानीय शिल्प, हस्तकला और कारीगरों के सम्मान को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करना था। उस्ता कला से जुड़े अधिकांश कारीगर पारंपरिक रूप से पीढ़ियों से इस कला को सहेजते आ रहे हैं, लेकिन आधुनिक बाज़ार और बदलते रुझानों के कारण यह कला धीरे-धीरे सीमित होती जा रही थी। गणतंत्र दिवस जैसे प्रतिष्ठित अवसर पर इसे प्रस्तुत कर सरकार ने इसके संरक्षण और प्रोत्साहन का स्पष्ट संदेश दिया है। कर्तव्य पथ पर मौजूद दर्शकों ने झाँकी की भूरी-स्वर्ण आभा और सूक्ष्म कारीगरी की सराहना की। परेड के बाद कई विदेशी मेहमानों को झाँकी के पास रुककर उसकी बारीकियों को निहारते देखा गया। सोशल मीडिया पर भी राजस्थान की इस झाँकी की तस्वीरें और वीडियो व्यापक रूप से साझा किए गए, जिससे यह झाँकी चर्चा का विषय बन गई। राजस्थान की उस्ता कला झाँकी ने यह सिद्ध किया कि गणतंत्र दिवस की परेड केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और विरासत का उत्सव भी है। बीकानेर की इस अनमोल कला को कर्तव्य पथ पर मिली यह प्रतिष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी और पारंपरिक शिल्प के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में याद रखी जाएगी।

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