RBI का बड़ा स्पष्टीकरण, विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व के नियम हुए साफ
मुंबई। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार से जुड़े नियमों को लेकर अहम स्पष्टीकरण जारी किया है। केंद्रीय बैंक ने 20 प्रतिशत विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व (FERR) के दायरे और गणना से जुड़े सवालों के जवाब देते हुए बताया कि किन डेरिवेटिव सौदों पर यह व्यवस्था लागू होगी और किन्हें इससे छूट मिलेगी।
आरबीआई के इस स्पष्टीकरण का मुख्य उद्देश्य बैंकों और अन्य अधिकृत डीलरों के लिए नियमों को स्पष्ट करना है। केंद्रीय बैंक ने अनुबंधों की न्यूनतम सीमा, रिजर्व की गणना, उसे बनाए रखने की अवधि और रिकॉर्ड रखने की जिम्मेदारियों को भी समझाया है।
20 लाख डॉलर से अधिक के पात्र सौदों पर लागू होगा नियम
आरबीआई के अनुसार, विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व की आवश्यकता उन निर्दिष्ट डेरिवेटिव अनुबंधों पर लागू होगी, जिनका सांकेतिक मूल्य 20 लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक है। ये अनुबंध अधिकृत डीलरों और ऐसे उपयोगकर्ताओं के बीच होने चाहिए, जो चालू खाते के लेनदेन से जुड़े जोखिमों से बचने के लिए रुपये के बदले विदेशी मुद्रा खरीदते हैं।
यदि किसी अनुबंध का सांकेतिक मूल्य 20 लाख डॉलर या उससे कम है, तो उस पर FERR की आवश्यकता लागू नहीं होगी। हालांकि, आरबीआई ने अधिकृत डीलरों को आगाह किया है कि नियमों से बचने के लिए डेरिवेटिव सौदों को कृत्रिम रूप से छोटे हिस्सों में बांटने या उनकी संरचना में हेरफेर करने की कोशिशों पर नजर रखी जाए।
किन सौदों को मिलेगी छूट?
केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि रुपये के बदले विदेशी मुद्रा बेचने वाले अनुबंध इस रिजर्व की आवश्यकता के दायरे में नहीं आते। इसी तरह, पूंजी खाते के लेनदेन की हेजिंग के लिए किए जाने वाले डेरिवेटिव अनुबंधों को भी इससे बाहर रखा गया है।
कुछ ऐसे भुगतान भी हैं, जो पूंजी खाते के लेनदेन से जुड़े होने के बावजूद विदेशी मुद्रा जोखिम के लिहाज से चालू खाते के लेनदेन माने जाते हैं। इनमें बाहरी वाणिज्यिक उधारी (ECB) पर ब्याज, अनिवासियों के पास मौजूद निवासी ऋण साधनों पर कूपन भुगतान और विदेशी निवेशकों को दिए जाने वाले लाभांश जैसे भुगतान शामिल हैं।
आरबीआई ने बताया कि इन भुगतानों से जुड़े जोखिमों की हेजिंग के लिए किए गए अनुबंधों पर भी निर्धारित शर्तों के अनुसार FERR की आवश्यकता लागू नहीं होगी। इसके अलावा, जिन विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों में भारतीय रुपया शामिल नहीं है, वे भी इस व्यवस्था के दायरे से बाहर रहेंगे।
कैसे होगी विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व की गणना?
आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि लागू रिजर्व की राशि संबंधित डेरिवेटिव अनुबंध के सांकेतिक मूल्य के भारतीय रुपये में समतुल्य मूल्य का 20 प्रतिशत होगी।
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि कोई पात्र अनुबंध एक करोड़ अमेरिकी डॉलर का है और अनुबंधित विनिमय दर 95 रुपये प्रति डॉलर है, तो उसका रुपये में सांकेतिक मूल्य 95 करोड़ रुपये होगा। इस स्थिति में 20 प्रतिशत के हिसाब से आवश्यक विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व 19 करोड़ रुपये बनेगा।
इस व्यवस्था के तहत रिजर्व की गणना प्रत्येक पात्र अनुबंध के लिए अलग-अलग की जाएगी। यानी अलग-अलग सौदों की राशि को घटाकर या समायोजित करके रिजर्व की आवश्यकता तय नहीं की जाएगी।
रिजर्व रोज बनाए रखना होगा, नहीं मिलेगा ब्याज
आरबीआई के मुताबिक, अधिकृत डीलरों को आवश्यक FERR की राशि केंद्रीय बैंक के पास अपने चालू खाते में जमा रखनी होगी। इस राशि को रोजाना बनाए रखना अनिवार्य होगा।
किसी पात्र डेरिवेटिव अनुबंध के लिए रिजर्व अनुबंध किए जाने की तारीख के अगले कार्यदिवस से बनाए रखना शुरू करना होगा। इसे संबंधित अनुबंध की समाप्ति के एक दिन बाद तक बनाए रखना जरूरी होगा।
केंद्रीय बैंक ने यह भी साफ किया है कि रिजर्व में रखी गई राशि पर कोई ब्याज नहीं दिया जाएगा। इसके साथ ही, अधिकृत डीलरों को पात्र लेनदेन और उनसे संबंधित रिजर्व का विस्तृत रिकॉर्ड रखना होगा। इन रिकॉर्ड का ऑडिट भी किया जाएगा।
बैंकों और अधिकृत डीलरों के लिए नियमों की स्पष्टता
आरबीआई के नए FAQ से विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार में काम करने वाले अधिकृत डीलरों को रिजर्व की गणना और अनुपालन संबंधी जिम्मेदारियों को समझने में मदद मिलेगी। खास तौर पर, पात्र सौदों की पहचान, छूट की शर्तों और रिजर्व बनाए रखने की समयसीमा को लेकर स्थिति स्पष्ट की गई है।
केंद्रीय बैंक ने साथ ही यह भी कहा है कि नियमों से बचने के लिए लेनदेन की संरचना में जानबूझकर बदलाव करने के प्रयासों पर नजर रखी जानी चाहिए। इससे निर्धारित प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर मिलता है।