भारत में गरीबी पर तगड़ा प्रहार
आजादी के 76 सालों के बाद भारत में गरीब और गरीबी पर लगातार अध्ययन और खुलासा हो
रहा है। मोदी सरकार संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के बाद नीति आयोग की एक ताज़ा रिपोर्ट पर
खुश हो सकती है। इस रिपोर्ट में भारत में गरीबी के विरुद्ध लड़ाई में भारत सरकार के प्रयासों
की सराहना की गई है। रिपोर्ट की माने तो गरीबी कम करने के मामले में भारत को बड़ी
कामयाबी मिली है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट भारत के विकास के लिए बेहद अच्छी खबर
लेकर आई है। इसके मुताबिक भारत में पिछले पांच साल में बहुआयामी गरीबी यानी 2015-16
के 24.85 प्रतिशत के मुकाबले 2019-21 में घटकर 14.96 प्रतिशत हो गई है। कुल साढ़े 13
करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं। इस रिपोर्ट का आधार दो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण
हैं जिसके मुताबिक गरीबों की संख्या में 14.96 प्रतिशत की कमी आई है। यह रिपोर्ट पिछले
महीने जारी हुई थी। आईएमएफ ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत ने "अति गरीबी" को
लगभग खत्म कर दिया है और इसके डीबीटी (डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर) को लॉजिस्टिक मार्वल
कहा है।
गरीबी मापने के लिए जीवनस्तर में चूल्हे से लेकर साफ-सफाई, पेयजल, बिजली, घर, संपत्ति
और बैंक अकाउंट इत्यादि भी देखे जाते हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा का गरीबी के मानकों में शामिल
करना गरीबी को सम्यक बनाता है। कुछ सर्वेक्षणों में मोदी राज में भारत में गरीबी घटने की बात कही
गयी थी तो कुछ सर्वेक्षणों में गरीबी बढ़ती बताई जा रही है। कुल मिलकर देखा जाये तो देश की गरीबी
आंकड़ों के मायाजाल में फंसी दिखाई दे रही है। विभिन्न स्तरों पर गरीबी खत्म किये जाने के दावे स्वतंत्र
विश्लेषक सही नहीं मानते है। मगर यह अवश्य कहा जा सकता है कि पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन
के प्रयास जरूर सिरे चढ़े है। सरकारी स्तर पर यदि ईमानदारी से प्रयास किये जाये और जनधन का
दुरूपयोग नहीं हो तो भारत शीघ्र गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो सकता है।
तमाम दावों और प्रतिदावों के बावजूद दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह
संख्या आज भी तेजी से बढती जा रही है। विश्व में आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो भूखमरी से जूझ रहे हैं।
विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब 80 फीसदी
लोग विकासशील देशों में रहेंगे। एक ओर हमारे और आपके घर में रोज सुबह रात का बचा हुआ खाना बासी
समझकर फेंक दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब
नहीं होता और वह भूख से मर रहे हैं। कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है। दुनिया
में पैदा किए जाने वाले खाद्य पदार्थ में से करीब आधा हर साल बिना खाए सड़ जाता है।
भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद
कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। भूख के कारण कमजोरी के शिकार बच्चों में बीमारियों से
ग्रस्त होने का खतरा लगातार बना रहता है। इसके अलावा करोड़ों बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास
नहीं हो पाता है क्योंकि उन्हें अपने शुरुआती वर्षों में पूरा पोषण नहीं मिल पाता है।
विभिन्न स्तरों पर गरीबी खत्म किये जाने के दावे स्वतंत्र विश्लेषक सही नहीं मानते है। मगर यह अवश्य
कहा जा सकता है कि पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन के प्रयास जरूर सिरे चढ़े है। सरकारी स्तर पर
यदि ईमानदारी से प्रयास किये जाये और जनधन का दुरूपयोग नहीं हो तो भारत शीघ्र गरीबी के अभिशाप से
मुक्त हो सकता है।