एक देश एक चुनाव ‘की सुगबुगाहट ! राजनीतिक क्षेत्र में हलचल तेज
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए संसद का विशेष सत्र बुलाया है। केंद्र के संसदीय मामलों के मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया है कि संसद का विशेष सत्र 18 से 22 सितंबर तक चलेगा। इसमें 5 बैठकें होंगी। यह 17वीं लोकसभा का 13वां सत्र और राज्यसभा का 261 वां सत्र होगा। उन्होंने कहा है कि अमृत काल के बीच संसद के विशेष सत्र में सार्थक चर्चा और बहस की उम्मीद है। यह दिलचस्प है कि इस सत्र का ऐलान ऐसे समय में हुआ है जब विपक्षी गठबंधन की तीसरी बैठक मुंबई में होने जा रही है। इसी बीच यह सुगबुगाहट जरूर है कि इस दौरान सरकार 'एक देश-एक चुनाव' बिल ला सकती है, अगर ऐसा होता है तो यह बड़ा कदम होगा। इस समय पक्ष हो या विपक्ष दोनों में सुगबुगाहट है कि विशेष सत्र का मुख्य विषय यही है । इसी बीच केंद्र सरकार ने ‘वेक देश एक चुनाव ‘ ने एक कमिटी का भी गठन कर दिया है ।यह कमिटी पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कि अध्यक्षता में गठित की गई है जिसके सदस्यों का भी जल्द ऐलान हो सकता है । इससे भी इस सुगबुगाहट को बल मिलता दिखाई दे रहा है ।
सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है इस बिल की टाइमिंग को लेकर। दरअसल, इस साल के आखिर में ही राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में कयास लगाए जाने लगे कि क्या केंद्र सरकार पहले आम चुनाव करा सकती है। इस बात की चर्चा सियासी गलियारों में जोरों पर उठी कि मोदी सरकार इस बार दिसंबर में ही आम चुनाव करा सकती है। इसे बल तब मिला, जब पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने भी इस पर बात की।
दरअसल यह नया मुद्दा नहीं है । इसकी चर्चा सन 2019 से हो रही है जब 19 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक देश-एक चुनाव के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाई थी । इसके बाद एक बार फिर यह मुद्दा सतह पर आ गया, जो प्रधानमंत्री के एजेंडे में अहम माना जाता है। यह भी पहला अवसर नहीं था जब ‘एक देश-एक चुनाव’ के मुद्दे पर चर्चा हुई थी । विगत में विभिन्न अवसरों पर विभिन्न मंचों में यह मुद्दा चर्चा का विषय बनता रहा है। एक देश एक चुनाव के विचार के तहत देश में चुनाव चक्र को इस तरह से संरचित करने का प्रस्ताव है, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएंगे।
वैसे देखा जाय तो इस मुद्दे पर चुनाव आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग और संविधान समीक्षा आयोग विचार कर चुके हैं। ‘एक देश-एक चुनाव’ लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं का चुनाव एक साथ करवाने का एक वैचारिक उपक्रम है। देश में इनके अलावा पंचायत और नगरपालिकाओं के चुनाव भी होते हैं, लेकिन ‘एक देश-एक चुनाव’ की प्रक्रिया में इन्हें शामिल नहीं किया जाता।
बेशक यह मुद्दा आज बहस के केंद्र में है, लेकिन विगत में 1952, 1957, 1962, 1967 में ऐसा हो चुका है, जब लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ करवाए गए थे। यह क्रम तब टूटा जब वर्ष 1968-69 में कुछ राज्यों की विधानसभाएँ विभिन्न कारणों से समय से पहले भंग कर दी गईं। वर्ष 1971 में पहली बार लोकसभा चुनाव भी समय से पहले हो गए थे। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब इस प्रकार चुनाव पहले भी करवाए जा चुके हैं तो अब क्या समस्या है?
चुनावों को लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। अगर हम देश में होने वाले चुनावों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि हर वर्ष किसी-न-किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। चुनावों की इस निरंतरता के कारण देश लगातार चुनावी मोड में बना रहता है। इससे न केवल प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय प्रभावित होते हैं बल्कि देश के खजाने पर भी भारी बोझ भी पड़ता है। हाल ही में हुए 17वीं लोकसभा के चुनाव में एक अनुमान के अनुसार, 60 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक का खर्च आया और लगभग तीन महीने तक देश चुनावी मोड में रहा।
निश्चित ही ऐसी परिस्थतियों में ‘एक देश-एक चुनाव’ विचार पहली नज़र में अच्छा प्रतीत होता है, पर यह व्यावहारिक है या नहीं, इस पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। बेशक बार-बार होने वाले चुनावों के बजाय एक स्थायित्व वाली सरकार बेहतर होती है, लेकिन इसके लिये सबसे ज़रूरी है आम सहमति का होना और यह कार्य बेहद मुश्किल है। राजनीतिक सर्वसम्मति के अभाव में संविधान में आवश्यक संशोधन करना संभव नहीं होगा, क्योंकि इसके लिये दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत पड़ेगी, जो कि बिना आम सहमति के नहीं किया जा सकता।
कुछ लोगों का मानना है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ के सिद्धांत को अमल में लाकर चुनाव के खर्च, पार्टी के खर्च आदि पर नज़र तथा नियंत्रण रखने में सहूलियत होगी। जब वर्ष 1951-52 में लोकसभा का पहला चुनाव हुआ था तो 53 दलों ने चुनाव में भागीदारी की थी, 1874 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था और चुनाव खर्च लगभग 11 करोड़ रुपए आया था। अब इसकी तुलना हाल ही में संपन्न 17वीं लोकसभा के चुनाव से करते हैं।।।610 राजनीतिक दल थे और लगभग 9000 उम्मीदवार। लेकिन इन पर लगभग 60 हज़ार करोड़ रुपए (सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ का अनुमान) खर्च हुए । 7 चरणों में 75 दिनों में संपन्न हुए इस आम चुनाव को अब तक का सबसे खर्चीला चुनाव बताया जा रहा है। इस लिहाज़ से एक वोट पर औसतन 700 रुपए खर्च किये गए और हर लोकसभा क्षेत्र में 100 करोड़ रुपयए खर्च हुए। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में लगभग 30 हज़ार करोड़ रुपए का खर्च आया था, जो मात्र पाँच वर्षों में बढ़कर दोगुना हो गया।
बताया जाता है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ से सार्वजनिक धन की बचत होगी, प्रशासनिक सेटअप और सुरक्षा बलों पर भार कम होगा, सरकार की नीतियों का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा और यह भी सुनिश्चित होगा कि प्रशासनिक मशीनरी चुनावी गतिविधियों में संलग्न रहने के बजाय विकासात्मक गतिविधियों में लगी रहे।मतदाता सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को राज्य और केंद्रीय दोनों स्तरों पर परख सकेंगे। इसके अलावा, मतदाताओं के लिये यह तय करने में आसानी होगी कि किस राजनीतिक दल ने क्या वादे किये थे और वह उन पर कितना खरा उतरा।सत्ता चला रहे राजनीतिज्ञों के लिये यह देखना भी ज़रूरी है कि बार-बार चुनाव होते रहने से शासन-प्रशासन में जो व्यवधान आ जाते हैं, उनको दूर किया जाए। प्रायः यह देखा जाता है कि किसी विशेष विधानसभा चुनाव में अल्पकालिक राजनीतिक लाभ उठाने के लिये सत्तारूढ़ राजनेता ऐसे कठोर दीर्घकालिक निर्णय लेने से बचते हैं, जो अंततः देश को लंबे समय में मदद कर सकता है।पाँच साल में एक बार चुनाव कराने से सभी हितधारकों यानी राजनीतिक दलों, निर्वाचन आयोग, अर्द्धसैनिक बलों, नागरिकों को इसकी तैयारी के लिये अधिक समय मिल सकता है।
‘एक देश-एक चुनाव’ के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ भी है जैसे इसकी राह में सबसे बड़ी चुनौती लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को समन्वित करने की है, ताकि दोनों का चुनाव निश्चित समय के भीतर हो सके।राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को लोकसभा के साथ समन्वित करने के लिये राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को तदनुसार घटाया और बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इसके लिये कुछ संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी:अनुच्छेद 83: इसमें कहा गया है कि लोकसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष का होगा।अनुच्छेद 85: यह राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने का अधिकार देता है।अनुच्छेद 172: इसमें कहा गया है कि विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष का होगा।अनुच्छेद 174: यह राज्य के राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का अधिकार देता है।अनुच्छेद 356: यह केंद्र सरकार को राज्य में संवैधानिक मशीनरी की विफलता के मद्देनज़र राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार देता है।इनके अलावा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के साथ-साथ संबंधित संसदीय प्रक्रिया में भी संशोधन करना होगा।‘एक देश-एक चुनाव’ के लिये सभी राजनीतिक दलों को राज़ी करना आसान काम नहीं है। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ की आवधारणा देश के संघात्मक ढाँचे के विपरीत सिद्ध हो सकती है।इसके अतिरिक्त चुनाव में बड़ी मात्रा में खर्च होने वाला धन भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले कारणों में सबसे ऊपर है। ऐसे में चुनाव की बारंबारता में रोक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मज़बूत कदम साबित हो सकता है।
यह सही है कि एक साथ चुनाव कराने से सरकारी राजस्व और समय की बचत होगी तथा नीति निर्णयन प्रक्रिया प्रभावित नहीं होगी। प्रायः देखा जाता है कि जब चुनाव का समय नज़दीक आता है तो मंत्रियों सहित पूरा सरकारी अमला बेहद व्यस्त हो जाता है, इसके साथ ही चुनाव आचार संहिता लागू होने से विकास कार्य भी ठप पड़ जाते हैं। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत हर समय चुनावी चक्रव्यूह में घिरा हुआ नजर आता है। देश को चुनावों के इस चक्रव्यूह से देश को निकालने के लिये एक व्यापक चुनाव सुधार अभियान चलाने की आवश्यकता है। इसके तहत जनप्रतिनिधित्व कानून में सुधार, कालेधन पर रोक, राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर रोक, लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना शामिल है। ‘एक देश-एक चुनाव’ की अवधारणा में कोई बड़ी खामी नहीं है, किंतु राजनीतिक दलों द्वारा जिस तरह से इसका विरोध किया जा रहा है उससे लगता है कि इसे निकट भविष्य में लागू कर पाना संभव नहीं है।
लंबी कवायद के बाद दो वर्ष पहले देश में GST लागू हुआ था और कमोबेश ठीक-ठाक काम भी कर रहा है। ‘एक देश-एक चुनाव’ के समर्थक तर्क देते हैं कि जब एक देश-एक टैक्स लागू किया जा सकता है तो ‘एक देश-एक चुनाव’ के विचार को भी आगे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इसके लिये यह आम सहमति बनाने की ज़रूरत है कि क्या राष्ट्र को ‘एक देश-एक चुनाव’ की जरूरत है या नहीं। सभी राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर होने वाली बहसों में सहयोग करना चाहिये, इसके बाद ही जनता की राय को ध्यान में रखा जा सकता है। एक परिपक्व लोकतंत्र होने के नाते भारत इसके बाद लिये गए किसी भी फैसले पर अमल कर सकता है।