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दक्षिणी एशियाई देश म्यांमार की अस्थिरता

दक्षिणी एशियाई देश म्यांमार की अस्थिरता

दक्षिणी एशियाई देश म्यान्मार , जिसका भूतपूर्व नाम बर्मा या ब्रह्मदेश रहा है तथा जिसका आधुनिक बर्मी नाम 'म्यान्मा' है, में हाल ही में जो घटना घटित हुई है, वह मानवता को बहुत ही विचलित व स्तब्ध करने वाली घटना है। 11 अप्रैल 2023 मंगलवार के दिन म्यांमार में जो हुआ, वह बहुत ही शर्मनाक है। दरअसल, पीपुल्स डिफेंस फोर्स(पीडीएफ) के स्थानीय कार्यालय के उद्घाटन के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में हाल ही में लड़ाकू विमानों ने गोलीबारी कर दी। जानकारी देना चाहूंगा कि म्यांमार की सेना जुंटा कहलाती है और म्यामांर सेना जुंटा ने ही यह गोलीबारी की हैं। जानकारी देना चाहूंगा कि इससे पहले भी 27 मार्च 2021 में भी शनिवार के दिन भी 114 लोगों की हत्या कर दी गई थी। यह बहुत ही दर्दनाक था कि उस समय भी आर्मी ने खून की होली खेलते हुए 114 लोगों की निर्मम हत्या कर दी थी। बहुत ही हैरानगी तो इस बात की है कि इतना कुछ घटित होने के बाद भी प्रोटेस्टर्स पीछे हटने को तैयार नजर नहीं आए। वास्तव में मिलिट्री हुंटा ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के प्रतिबंधों और प्रदर्शनों तक को भी अनुसुना कर दिया था। और अब एक बार फिर 11 अप्रैल 2023 का दिन म्यामांर की जनता के लिए एक बार फिर से अभिशाप साबित हुआ। मंगलवार को (11 अप्रैल 2023 को) म्यांमार में सेना ने लोगों पर हवाई हमले कर बम बरसाये,जिससे वहां निर्दोष बच्चों और महिलाओं समेत सैकड़ों मौतें हो गई। वास्तव में, वहां की सेना द्वारा यह मानवहीनता की पराकाष्ठा ही कही जा सकती है। इस हमले की जितनी भी निंदा की जाए वह कम ही होगी। यह बहुत ही गंभीर व संवेदनशील है कि वहां सेना ने आम नागरिकों की भीड़ पर हवाई हमले करके लोगों को मार गिराया, जिनमें हर उम्र के स्त्री-पुरुष ही नहीं, बच्चे भी शामिल हैं। जानकारी सामने आई है कि ये लोग सैन्य शासन के विरोधियों द्वारा आयोजित एक समारोह में भाग ले रहे थे। वास्तव में ये लोग विद्रोही गुट के स्थानीय कार्यालय के उद्घाटन के लिए एकत्र हुए थे। जो घटना घटित हुई है, इस घटना को संयुक्त राष्ट्र संघ तक ने भी 'परेशान करने वाली घटना' बताया है। आश्चर्यजनक बात है कि एक लड़ाकू विमान ने सागैंग प्रांत के कनबालु टाउनशिप में स्थित पजीगी गांव के बाहर एकत्र हुई भीड़ पर अचानक बम गिराए और फिर हेलीकॉप्टर से फायरिंग कर दी। वास्तव में,आंग सान सू की की चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकने और सेना द्वारा सत्ता पर काबिज होने के बाद हाल ही में मंगलवार(11 अप्रैल 2023 को) को मध्य सागैंग क्षेत्र के कंबालु शहर में किए गमा यह हवाई हमला अबतक का सबसे घातक हमला है।घटना के बाद भारत ने म्यांमार के सभी पक्षों से हिंसा को रोकने का आह्वान किया है और भारत की ओर से यह अपील म्यांमार के सैन्य शासन द्वारा देश के सागैंग क्षेत्र में हवाई हमले करने के कुछ दिनों बाद की गई है। दरअसल, भारत ने म्यांमार में शांति, स्थिरता और लोकतंत्र की वापसी के लिए अपने सभी प्रयासों को दोहराया है और शांति व संयम की अपील की है। बहरहाल, जानकारी देना चाहूंगा कि म्यांमार में 1 फरवरी 2021 को सेना ने तख्तापलट कर दिया था और तख्ता पलट कर सत्ता हासिल की थी। इसके बाद देश में इमरजेंसी लगा दी गई थी और इस दौरान म्यांमार की नेता आंग सान सू की और नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के अन्य नेताओं को भी हिरासत में ले लिया गया था और आंग सान सू के खिलाफ पुलिस ने आरोप तय किए थे।जानकारी देना चाहूंगा कि साल 2020 में म्यांमार में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आईं आंग सान सू की सरकार का सेना ने तख्तापलट कर दिया था और उन्हें 2021 में गिरफ्तार कर लिया गया था। वह तभी से जेल में हैं। तब से वहां हालात काफी खराब हैं। हालांकि, इसके बाद देशभर में लोकतंत्र की बहाली की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए थे और तब से लेकर अब तक सुरक्षा बलों के हाथों हजारों नागरिकों के मारे जाने का अनुमान है। दरअसल, सैनिक और तानाशाही सरकारें चाहे किसी भी देश में क्यों न हों, वे हमेशा दमन, तानाशाही के ज़ोर पर ही ज़िंदा रहती हैं। वे किसी भी बाहरी विरोध को कभी भी स्वीकार नहीं करतीं हैं। सत्ता में आने के बाद वे अपनी मनमर्जी करती हैं और चलातीं हैं। लोगों के संगठन व जमावाड़ों से उनमें कहीं न कहीं थोड़ा डर या भय पैदा हो जाता है और वे किसी भी संगठन को कुचलने में ही विश्वास करती हैं ताकि उनकी सत्ता पर कोई भी आंच न आने पाए। म्यांमार में भी यही कुछ तो हुआ है। म्यांमार में लोग सैन्य सरकार का विरोध कर रहे हैं और वे लोकतंत्र की बहाली की मांग कर रहे हैं। जिस दिन यह घटना हुई उस दिन बहुत से लोग(आमजन) एक कार्यक्रम में जमा हुए थे और इन लोगों द्वारा न तो घटना स्थल पर कोई आंदोलन ही किया जा रहा था और न ही कोई प्रदर्शन।तभी एक लड़ाकू विमान ने सागैंग क्षेत्र की कनबालु टाउनशिप में पाजिगी गाँव के बाहर सेना का विरोध करने वाले समूह नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट के स्थानीय कार्यालय के उद्घाटन के लिए जमा हुए करीब 150 लोगों पर अंधाधुंध गोलीबारी और बमबारी की। जानकारी मिलती है कि इस हवाई हमले में सैन्य शासन विरोधी समूह नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (एनयूजी) का कार्यालय तबाह हो गया है। मारे गए लोगों में सरकार विरोधी सशस्त्र समूहों और अन्य विपक्षी संगठनों के नेता भी शामिल बताए जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंतोनियो गुटेरस म्यांमार घटना पर दुख व्यक्त करते हुए यह कहा है कि इस स्थिति से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की ज़रूरत है। अमेरिका नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी में जुटा है, लेकिन म्यांमार की सैन्य सरकार पर इसका कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है और इसकी वजह रूस और चीन के सपोर्ट को बताया जा रहा है। वास्तव में, म्यांमार के लोगों पर इस प्रकार के हमले को लेकर आज विश्व बिरादरी को चिंतित और परेशान होने की जरूरत इसलिए है क्यों कि यदि विश्व बिरादरी इस प्रकार की घटना पर मौन बैठी रही और घटना को लेकर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी तो निश्चित ही इससे म्यामांर सैन्य सरकार का हौंसला और बढ़ जाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने इस एयर स्ट्राइक(हवाई हमले) के लिए जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार करने की माँग करते हुए आम नागरिकों के खिलाफ सेना के अभियान को तुरंत समाप्त करने का आह्वान किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसा हो पाएगा अथवा ऐसा किया जाना संभव हो सकता है ? आज म्यांमार के हालात बहुत ही खराब हैं। देश में गृहयुद्ध के से हालात पैदा हो गए हैं। देश की सरकार को तानाशाह द्वारा कब का गिरा दिया गया है। म्यांमार में सेना का ही सिक्का धड़ल्ले से आज चल रहा है। हर तरफ़ सेना की मनमानी है, तानाशाही है। अपहरण, रेप, हत्याओं का सिलसिला लगातार जारी है। दिन-दहाड़े लूट-पाट, हिंसा की जा रही हैं। सेना की क्रूरता कम नहीं हो पा रही है। संयुक्त राष्ट्र और इंटरनेशनल एजेंसियां बार-बार शांति, संयम की अपील कर-करके थक चुकी हैं। म्यांमार की आबादी लगभग 5 करोड़ है। ये भारत, चीन और थाईलैंड से सीमा साझा करता है। यहां बर्मा भाषा बोली जाती है। देश की ज़्यादातर आबादी बौद्ध धर्म को मानने वाली है। वर्ष 1880 के बाद से ब्रिटिश साम्राज्य ने पूरी दुनिया में अपने पैर तेज़ी से पसारने शुरू किए थे बर्मा भी 1885 से 1886 के बीच इसकी जद में आ गया था। अंग्रेजों ने लगभग 60-70 साल यहां अपनी हुकूमत चलाई। हमारे देश को सन् 1947 में आज़ादी मिली थी और ठीक एक साल बाद बर्मा भी अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद हो गया था। 4 जनवरी 1948 को बर्मा को ब्रिटिश से अपनी स्वतंत्रता मिल गई थी। वर्ष 1937 तक बर्मा भी भारत का ही भाग था और ब्रिटिश राज के अधीन था। भारत के लिए म्यांमार का बहुत ही महत्व इसलिए है क्यों कि भारत और म्‍यान्मार की सीमाएँ आपस में लगती हैं जिनकी लम्बाई 1600 किमी से भी अधिक है तथा बंगाल की खाड़ी में एक समुद्री सीमा से भी दोनों देश जुड़े हुए हैं। अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड की सीमा म्यान्मार से सटी हुई है। म्‍यान्मार के साथ चहुंमुखी सम्बन्धों को बढ़ावा देना भारत के पूर्वोत्‍तर राज्‍यों के आर्थिक परिवर्तन के लिए महत्‍वपूर्ण है। म्यांमार में स्थितियां अच्छी नहीं होने से आज बहुत से घर तबाह हो गए हैं और हजारों-लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा है। म्यामांर सेना की कार्रवाई से विस्थापित लोगों ने बांग्लादेश में शरण ली है, यह तथ्य किसी से छिपा हुआ नहीं है।म्यांमार रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता देने से इनकार करता रहा है क्योंकि उन्हें बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासी माना जाता रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों से म्याँमार पर प्रतिबंधों का प्रभाव भारत पर पड़ता रहा है। वास्तव में, भारत के पड़ोस में एक विफल म्याँमार राज्य या चीन के चंगुल में फँसा एक कमज़ोर म्याँमार कहीं न कहीं चीन के हस्तक्षेप को बढ़ा सकता है। म्याँमार में लोकतंत्र को बहाल करने के किसी भी प्रयास के लिये आंग सान सू की को समर्थन देने की आवश्यकता है। हालाँकि रोहिंग्या संकट पर आंग सान सू तटस्थ रही हैं। कुल मिलाकर, यह बात कही जा सकती है कि म्यांमार की अस्थिरता का प्रभाव कहीं न कहीं भारत पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पड़ ही रहा है।

-सुनील कुमार महला

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