बंगाल चुनाव में हिंदी भाषी मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण
प. बंगाल विधानसभा के चुनाव शीघ्र होने जा रहे है। यहां चुनाव प्रचार की शुरुआत अभी से हो चुकी है। दीवारों पर पार्टियों के चुनाव चिह्न और स्लोगन लिखे जा रहे है। इन चुनावों में हिंदी भाषी मतदाताओं की भी प्रभावी भूमिका है जिनकी संख्या करीब डेढ़ करोड़ बताई जा रही है। इनमें राजस्थानी मतदाताओं की संख्या भी कम नहीं है। राजस्थान के लोग यहाँ समृद्धशाली और उधमी भी है। इनके उधोग धंधों में अन्य हिंदी भाषी राज्यों के हजारों लोगों को रोजगार मिला है।
बगाल में लाखों राजस्थानी निवास करते है मगर सियासत में उनकी भूमिका नगण्य हो गयी है। कभी वहां मारवाड़ी नेताओं की तूती बोलती थी। बंगाल के व्यापार और उधम में मारवाड़ियों दबदबा था और आज भी है। बिड़ला, कोठरी, सरावगी, रुईका, पोद्दार, बजाज, सेकसरिया और न जाने कितने उधोगपतियों का डंका बंगाल में बजता था। बंगाल की राजनीति में राजस्थानियों का भी बोलबाला रहा है। राम कृष्ण सरावगी से लेकर आनंदी लाल पोद्दार और विजय सिंह नाहर सरीखे सियासतदानों ने बंगाल की राजनीति में प्रभावी भूमिका अदा की है। एक समय था जब राज्य विधानसभा में 16 हिन्दी भाषी विधायक हुआ करते थे। ईश्वरदास जालान राज्य विधानसभा के अध्यक्ष बने थे। विजय सिंह नाहर को उपमुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल हुआ था। रामकृष्ण सरावगी मंत्री पद पर सुशोभित हुए थे। कांग्रेस सहित भाजपा और वामपंथी दलों में राजस्थानी नेताओं की सक्रीय भागीदारी रही है।
1977 तक हिंदी भाषियों ने सियासत पर अपनी मजबूत पकड़ रखी मगर धीरे धीरे उनका असर और रूचि समाप्त होती गई। यहां की कुल आबादी में से 1.5 करोड़ हिंदीभाषी हैं कुल विधानसभा सीटों में 70-80 सीट हैं जहां ये हिंदी भाषी निर्णायक भूमिका में हैं।
कोलकाता और बड़े शहरों में राजस्थान के मारवाड़ी बड़ी संख्या में हैं। ये व्यापार में हैं, इसलिए काफी समृद्ध भी हैं। हिंदी भाषियों ने ब्रिटिश राज की शुरुआत से ही रोजगार की तलाश में बंगाल जाना शुरू किया और वहीं बस गए। लेकिन इनका संपर्क अपने मूल राज्य से ख़त्म नहीं हुआ। इसलिए जब इनके मूल निवास वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार वगैरह में बीजेपी का दबदबा बढ़ा तो इनका लगाव भी बीजेपी की तरफ बढ़ा। मारवाड़ियों की बात करें तो राजस्थान के लोग रोजगार की तलाश में बंगाल आये। उस दौरान धोती लोटा इनकी पहचान थी। धीरे धीरे अपनी कर्मठता के बूते उन्होंने यहाँ उधोग धंधे स्थापित किये। राजनीति में भी अपनी पहचान बनायी। कांग्रेस उस दौरान उनका प्रिय राजनैतिक दल था। बाद में अन्य दलों की तरफ भी उनका झुकाव देखा गया। साम्यवादी शासन के दौरान मारवाड़ी नेताओं का वर्चस्व कम होता गया। विधानसभा में भी उनका प्रतिनिधित्व कम हुआ और वे 16 से जीरो पर आ गए। अब एक बार फिर विधान सभा के चुनाव होने जा रहे है। विभिन्न राजनैतिक दलों ने मारवाड़ी वोटों को लुभाने के लिए कई मारवाड़ियों को अपनी टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा जायेगा। राजस्थान से अनेक नेता और विधायक अपनी अपनी पार्टियों के चुनाव प्रचार के लिए बंगाल जायेंगे और यह तो भविष्य ही बताएगा की मारवाड़ी इन चुनावों में होनी खोई प्रतिष्ठा हासिल करेंगे या नहीं।
-बाल मुकुन्द ओझा