राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा के बागियों की बहार है
राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर के बावजूद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनी सरकार बचाने के लिए दिन
रात एक किये हुए है। वहीं भाजपा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसे अपनी सरकार बनाने की उम्मीद पाले
हुए है। दोनों ही पार्टियों ने मतदान की तिथि नज़दीक आते देखकर अपनी सारी ताकत झोंक दी है। कांग्रेस
के स्टार प्रचारक राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा ने सरकार रिपीट होने की गहलोत की घोषणा का पुरजोर
समर्थन किया है। गहलोत को अपनी राहत गारंटियों पर पूरा भरोसा है। भाजपा ने सरकार विरोधी लहर के
बीच महिला अत्याचार, पेपर लीक और भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुख रूप से उठाया है। इसी बीच बागियों ने
दोनों ही पार्टियों की नींद हराम कर दी है। दोनों ही पार्टियों के लगभग तीन दर्ज़न बागियों ने मुकाबले को
त्रिकोणीय बना कर अपनी ताकत दिखा दी है। बागियों की हुंकार देखकर लगता है किसी भी पार्टी को सरकार
बनाने के लिए इनकी जरुरत पड़ सकती है। कांग्रेस ने अनेक नाराज नेताओं को पार्टी में पद दे कर मनाने का
प्रयास किया है। भाजपा को भी कुछ बागियों को राजी करने में सफलता मिली है।
25 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव में राजस्थान में भी दागी और बागी दोनों ही चुनावी मैदान में
ताल ठोंक रहे है। चुनाव में बड़ी संख्या में उतरे बागी प्रत्याशी कांग्रेस और भाजपा के सत्ता के समीकरण
बिगाड़ रहे है। सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी भाजपा दोनों को ही बागियों से कड़ी चुनौती मिल रही है। अब
भाजपा और कांग्रेस को बागियों से दो-दो हाथ करने होंगे। प्रदेश की 50 से अधिक सीटों पर दोनों पार्टियों में
बागी मैदान में हैं। इनमें तीन दर्ज़न सीटों पर बागी मुकाबले में है। दोनों पार्टियां अपने वरिष्ठ नेताओं के
हस्तक्षेप के बावजूद बागी हुए नेताओं को मनाने में विफल रहीं। राजपाल सिंह शेखावत जैसे कुछ बागियों
ने अपने पर्चे वापस लिए है। गहलोत ने भी कुछ बागियों को बैठाने में सफलता प्राप्त की है। पिछले चुनाव में
27 निर्दलीय और छोटी पार्टियों के उम्मीदवार जीते थे। इनमें भी बागी ज्यादा थे जिन्होंने गहलोत सरकार
को अपना समर्थन दे दिया था।
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खासमखास रहे कई बड़े कद वाले नेता इस समय बागी उम्मीदवार के रूप में
चुनावी मैदान में है। भाजपा के बागियों में यूनुस खान और वर्तमान विधायक चन्द्रभान सिंह आक्या
चितौड़ गढ़,कोटा से भवानी सिंह राजावत, पूर्व विधान सभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल जैसे बड़े नामों के
अलावा हाल ही भाजपा का दामन थमने वाले रविंद्र भाटी शिव,खंडेला से बंशीधर बाजिया, बाड़मेर से
प्रियंका चौधरी, फतेहपुर से भाजपा से पूर्व पालिका अध्यक्ष मधूसूदन भिण्डा, झुंझुनू से राजेन्द्र भाम्बू,
बस्सी से जितेन्द्र मीणा, भीलवाड़ा से अशोक कोठारी, पिलानी से पिछला चुनाव लड़ने वाले कैलाश मेघवाल,
झोटवाड़ा विधानसभा सीट सेआशुसिंह सूरपुरा, सवाई माधोपुर से आशा मीणा, आदि ने निर्दलीय
उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल कर पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों को चुनौती दी है। ये वो
नाम हैं, जो भले ही अपना चुनाव जीत न सके, लेकिन बीजेपी के अधिकृत उम्मीदवार का खेल बिगाड़ सकते
हैं।
वहीं कांग्रेस में भी बागियों की कमी नहीं है। टिकट से वंचित कांग्रेस विधायक जौहरी लाल मीणा और
बाबूलाल बैरवा ने टिकट बेचने का आरोप लगाया। सत्ताधारी पार्टी के राजगढ से विधायक जोहरीलाल मीणा,
शाहपुरा से विधायक आलोक बेनीवाल, संगरिया से पूर्व विधायक डॉ. परमनवदीप, गंगानगर से नगर
परिषद में कांग्रेस की सभापति करूणा चांडक , नागौर से हबीब उर रहमान , धोद से महेश मोरदिया
लूणकरण शहर से पूर्व मंत्री वीरेंद्र बेनीवाल , मुंडावर से अंजलि यादव, विराट नगर से पूर्व विधायक राम चंद्र
सराधना, शिव से जिलाध्यक्ष फ़तेह खान और मनोहर थाना से कैलाश मीणा प्रमुख है।
पिछले चुनाव में बड़ी संख्या में बागी जीते जो अधिकांश कांग्रेसी थे। गहलोत सरकार के संकट के दौरान
बागी जीते विधायकों ने सरकार को अपना समर्थन दिया था। इस बार भी बागी निर्दलीय के रूप में अपना
भाग्य आज़मा रहे है। यहाँ एक दल में टिकट नहीं मिलता है तो दूसरे दल से टिकट लेकर चुनावी मैदान में
उतरते हैं। कार्यकर्ता भले ही विरोध करते हैं, लेकिन बागी चुनाव जीत भी जाते हैं। इस बार भी कांग्रेस व
बीजेपी के साथ ही अन्य दलों में भी बागियों की लम्बी फेहरिस्त देखने को मिल रही है।