जल जंगल जमीन और संस्कृति के रक्षक है आदिवासी
-बालमुकुन्द ओझा
विश्व आदिवासी दिवस प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रुप में घोषित किया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी दिवस मनाने का निर्णय लिया गया, जिससे कि आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित किया जा सके। दुनिया के लगभग 90 से अधिक देशों मे आदिवासी समुदाय की आबादी लगभग 37 करोड़ है। आज आदिवासियों की दशा और दिशा पर गहन चिंतन और मंथन की जरुरत है। आदिवासी समुदाय को प्रकृति का सबसे करीबी माना जाता है। इस समुदाय ने संसाधनों के आभाव में भी अपनी एक खास पहचान बनाई है। सियासत में आदिवासी समुदाय को सत्ता की संजीवनी माना और समझा जाता है। राजनीतिक पार्टियां विकास पर कम और अपने सियासी फायदे के लिए आदिवासियों का उपयोग करने से नहीं चूकते।
भारत में आदिवासी संस्कृति की अपनी विशिष्ट पहचान है। यह जनजाति लोगों का एक ऐसा समूह है, जिनकी भाषा, संस्कृति, जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक स्थिति भिन्न है। मगर देशभक्ति और राष्ट्र निर्माण की भावना उनमें कूट कूट कर भरी है। प्रकृति के सवसे करीब होने के साथ ही इस समुदाय का गीत, संगीत और नृत्य से सदा ही गहरा लगाव रहा है। आदिवासी शब्द प्राचीन-काल से निवास करने वाली जातियों के लिए प्रयोग किया जाता है। आदिवासी शब्द आदि और वासी दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ अनादि-काल से किसी भौगोलिक स्थान में वास करने वाला व्यक्ति या समूदाय होता है। आजादी के बाद एक लम्बी जद्दोजहद के बाद भी यह तय नहीं हो पाया की हमारे देश में आदिवासी कौन है। साधारण रूप से कहा जाये तो वे लोग जो आधुनिक सभ्यता और प्रगति से दूर रहकर जंगलों में निवास करते है। जमीन होते हुए भी जमीन हीन है। आज भी उनका खाना मोटा है।
आदिवासी अरसे से अपने अकूत संसाधनों का दोहन देखती रही है और पिछड़ापन तथा कुपोषण से बुरी तरह ग्रस्त रही है। आदिवासी अपनी परंपरा और संस्कृति की रक्षा के साथ विकास के नाम पर अपने रहवास की अकूत जल, जंगल, जमीन की संपदा की रक्षा के लिए लड़ते भी रहे हैं। एक सरकारी रिपोर्ट बताती है कि देश में 50 प्रतिशत या इससे ज्यादा जनजातीय आबादी वाले कुल 36,428 गांव हैं। आधी से ज्यादा आदिवासी आबादी वाले गांवों में मप्र देश में पहले नंबर पर है। एमपी के 7307 गांवों में आदिवासियों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है। दूसरे नंबर पर राजस्थान में 4302 गांवों में 50 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। इसके बाद छत्तीसगढ़ में 4029, झारखंड में 3891, गुजरात में 3764, महाराष्ट्र में 3605 गांवों में आधे से ज्यादा आदिवासी रहते हैं। छल, प्रपंच और कपट की सियासत से दूर देश की आदिवासी आबादी आज भी रोजी रोटी के लिए जूझ रही है। आदिवासी आबादी आज़ादी के 77 साल बाद भी आधुनिक सभ्यता और प्रगति से दूर रहकर जंगलों में निवास करती है। जमीन होते हुए भी जमीन हीन है। आज भी उनका खाना मोटा है। जंगल के इलाकों में रहने के कारण सरकार संचालित विकास योजनाएं इन तक नहीं पहुंच पाती।
भारत में अनुसूचित आदिवासी समूहों की संख्या 700 से अधिक है। भारत की जनगणना 1951 के अनुसार आदिवासियों की संख्या 1,91,11,498 थी जो 2001 की जनगणना के अनुसार 8,43,26,240 हो गई। वर्तमान में देश में लगभग 11 करोड़ आदिवासियों की आबादी है और विभिन्न आंकड़ों की मानें तो हर दसवां आदिवासी अपनी जमीन से विस्थापित है। बढ़ती जनसंख्या, नगरों के विकास और औद्योगिकीकरण के कारण आदिवासियों की जमीने छिन गईं, जिसके कारण इनकी परंपरागत जीवन पद्धति में भारी बदलाव आया है। धरती पर सबसे पहले सभ्य होने वाली यही जन-जातियां ही थीं। लेकिन, विडंबना यह है कि उनके बाद सभ्यता का मुंह देखने वाली जातियां आज उन्हें आदिवासी कहने लगी हैं। भारत के संविधान में आदिवासी समुदाय को जन जाति का दर्जा दिया गया है।
भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में बोडो, भील, खासी, जाट, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, मीणा, उरांव, परधान, बिरहोर, पारधी, सहरिया, संथाल, आंध, टोकरे, कोली, महादेव, कोली, कोली, मल्हार, टाकणकार आदि शामिल है। पौराणिक और धार्मिक ग्रंथों में इन्हें अत्विका और वनवासी भी कहा गया है। महात्मा गांधी ने आदिवासियों को गिरिजन (पहाड़ पर रहने वाले लोग) कहकर पुकारा है। आदिवासी भारत के मूल निवासी हैं जो अनंतकाल से यहां निवास करते हैं। आदिवासी समाज जंगलों के वास्तविक रक्षक है, क्यों कि इनका भोजन कंद मूल तथा जंगली फल हुआ करता था।