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कचरे के ढेर पर बढ़ते शहर

कचरे के ढेर पर बढ़ते शहर

- डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण आर्थिक विकास, रोजगार और बेहतर जीवन-स्तर के अवसर तो पैदा कर रहा है, लेकिन इसके साथ उत्पन्न होने वाले ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। अनियोजित शहरी विस्तार, बढ़ती जनसंख्या, बदलती जीवनशैली, उपभोक्तावाद और एकल-उपयोग वाली वस्तुओं के बढ़ते इस्तेमाल ने शहरों में कचरे की मात्रा और विविधता दोनों को बढ़ा दिया है। अनेक शहरों में कचरे का संग्रहण, परिवहन और निस्तारण अभी भी मुख्यतः ‘कलेक्ट-ट्रांसपोर्ट-डंप’ मॉडल पर आधारित है। इसका परिणाम खुले में कचरा फेंकने, जलाने, जल स्रोतों के प्रदूषण, दुर्गंध, वायु प्रदूषण और लैंडफिल के बढ़ते दबाव के रूप में सामने आता है। इसलिए भारत के सामने चुनौती केवल कचरा हटाने की नहीं, बल्कि उसे संसाधन में बदलने की है।

भारत के ठोस अपशिष्ट की प्रकृति अत्यंत विविध है। घरेलू और व्यावसायिक गतिविधियों से निकलने वाला नगरपालिका ठोस अपशिष्ट इसका सबसे बड़ा हिस्सा है, जिसमें भोजन और अन्य जैविक पदार्थों के साथ कागज, प्लास्टिक, कांच, धातु, कपड़ा और पैकेजिंग सामग्री शामिल होती है। जैविक कचरे की बड़ी मात्रा भारत के लिए चुनौती के साथ अवसर भी है, क्योंकि इससे खाद और बायोगैस का उत्पादन किया जा सकता है। प्लास्टिक अपशिष्ट दूसरी बड़ी समस्या है। विशेषकर मल्टी-लेयर पैकेजिंग और एकल-उपयोग प्लास्टिक का पुनर्चक्रण कठिन होता है तथा इनके नालियों, नदियों और समुद्रों तक पहुंचने की संभावना रहती है। निर्माण एवं विध्वंस से निकलने वाला मलबा भी तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें कंक्रीट, ईंट, पत्थर, टाइल, लकड़ी और धातु शामिल हैं। इसका वैज्ञानिक पुनर्चक्रण कर सड़क निर्माण तथा नए निर्माण में उपयोग किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त जैव-चिकित्सीय कचरा, ई-कचरा और खतरनाक औद्योगिक कचरा विशेष सावधानी की मांग करते हैं। अस्पतालों से निकलने वाले संक्रमित पदार्थ, सुइयां, दूषित प्लास्टिक और औषधीय अवशेष यदि सामान्य कचरे के साथ मिल जाएं तो स्वास्थ्यकर्मियों, कचरा बीनने वालों और आम नागरिकों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। इसी प्रकार कंप्यूटर, मोबाइल फोन, बैटरी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाले ई-कचरे में मूल्यवान धातुओं के साथ सीसा, पारा और अन्य हानिकारक पदार्थ भी हो सकते हैं। रसायन, सॉल्वेंट, पेंट और औद्योगिक अवशेष जैसे खतरनाक अपशिष्ट को सामान्य नगरपालिका कचरे से अलग रखना आवश्यक है।

इस संकट से निपटने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी उपाय स्रोत पर कचरे का पृथक्करण है। गीले, सूखे और खतरनाक कचरे को अलग-अलग रखने से आगे की पूरी प्रबंधन प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनती है। जीपीएस आधारित कचरा वाहन, सेंसर युक्त स्मार्ट बिन, RFID तकनीक और डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली संग्रहण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और कुशल बना सकती हैं। लेकिन यह समझना जरूरी है कि तकनीक नागरिक अनुशासन का विकल्प नहीं है। यदि घर और संस्थान स्तर पर कचरा अलग नहीं किया जाएगा तो अत्याधुनिक प्रसंस्करण संयंत्र भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे।

जैविक कचरे के लिए कम्पोस्टिंग और बायोमिथेनेशन महत्वपूर्ण समाधान हैं। कम्पोस्टिंग के माध्यम से जैविक कचरे को उपयोगी जैविक खाद में बदला जा सकता है, जबकि एनारोबिक डाइजेशन से बायोगैस और जैविक अवशेष प्राप्त होते हैं। इससे लैंडफिल पर दबाव कम होने के साथ ऊर्जा और कृषि के लिए उपयोगी संसाधन प्राप्त होते हैं। बड़े शहरों में विकेंद्रीकृत कम्पोस्टिंग तथा बायोगैस संयंत्र परिवहन लागत और कचरे के अनावश्यक स्थानांतरण को भी कम कर सकते हैं।

सूखे कचरे के लिए मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी अत्यंत उपयोगी हैं। इनमें कन्वेयर बेल्ट, चुंबकीय पृथक्करण, एयर क्लासिफायर, ऑप्टिकल सॉर्टिंग और आधुनिक सेंसर तकनीक के माध्यम से कागज, धातु और विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक को अलग किया जा सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कंप्यूटर विजन आधारित प्रणालियां भविष्य में स्वचालित छंटाई को और अधिक प्रभावी बना सकती हैं। हालांकि, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री में गीले कचरे के मिश्रण से उसकी गुणवत्ता और आर्थिक उपयोगिता कम हो जाती है। इसलिए स्रोत पर पृथक्करण इस पूरी तकनीकी श्रृंखला की बुनियादी शर्त है।

प्लास्टिक कचरे के लिए यांत्रिक पुनर्चक्रण अपेक्षाकृत साफ और समान प्रकार के प्लास्टिक में प्रभावी है। कठिन प्लास्टिक के लिए कुछ रासायनिक पुनर्चक्रण तथा पायरोलिसिस तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। इनसे ईंधन अथवा रासायनिक कच्चा माल प्राप्त करने की संभावना रहती है, लेकिन इनकी ऊर्जा आवश्यकता, लागत और पर्यावरणीय प्रभाव का जीवन-चक्र मूल्यांकन आवश्यक है। केवल तकनीकी रूप से संभव होना किसी समाधान को स्वतः टिकाऊ नहीं बनाता।

कचरे से ऊर्जा उत्पादन भी एक महत्वपूर्ण विकल्प है। नियंत्रित दहन और रिफ्यूज-डिराइव्ड फ्यूल तकनीक के माध्यम से ऐसे अवशिष्ट कचरे से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जिसे पुनर्चक्रित या जैविक रूप से संसाधित नहीं किया जा सकता। आधुनिक उत्सर्जन नियंत्रण प्रणालियां प्रदूषकों को नियंत्रित करने में सहायता करती हैं। लेकिन भारत के मिश्रित और अधिक नमी वाले नगरपालिका कचरे की ऊष्मीय क्षमता कई बार कम होती है। इसलिए बिना पृथक्करण के पूरे मिश्रित कचरे को जलाना उचित रणनीति नहीं माना जा सकता। ऊर्जा उत्पादन को पुनर्चक्रण और जैविक प्रसंस्करण का विकल्प नहीं, बल्कि उनके बाद बचने वाले अवशिष्ट कचरे के प्रबंधन का साधन माना जाना चाहिए।

अंततः वैज्ञानिक लैंडफिल की आवश्यकता बनी रहती है, क्योंकि हर प्रकार के कचरे का पुनर्चक्रण संभव नहीं है। इंजीनियर्ड लैंडफिल में लाइनर, लीचेट संग्रहण, गैस कैप्चर और भूजल निगरानी जैसी व्यवस्थाएं प्रदूषण को सीमित करती हैं। भारत में पुराने कचरा स्थलों के लिए बायोमाइनिंग और बायोरिमेडिएशन भी उपयोगी तकनीकें हैं, जिनके माध्यम से पुराने कचरे से पुनर्चक्रण योग्य सामग्री निकाली जा सकती है और भूमि को पुनः उपयोग में लाया जा सकता है।

भारत को अब रैखिक ‘उत्पादन-उपयोग-फेंकने’ वाली अर्थव्यवस्था से चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना होगा। ‘कम उपयोग, पुनः उपयोग, मरम्मत, पुनर्चक्रण और संसाधन पुनर्प्राप्ति’ को शहरी नीति का आधार बनाना होगा। उत्पादक उत्तरदायित्व, कचरा उत्पादकों पर उचित शुल्क, कचरा बीनने वालों का औपचारिक तंत्र में समावेशन, बल्क वेस्ट जनरेटर की जवाबदेही और स्थानीय निकायों की तकनीकी क्षमता में वृद्धि इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होंगे।

वास्तव में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन केवल इंजीनियरिंग की समस्या नहीं, बल्कि शहरी शासन, सामाजिक व्यवहार और संसाधन प्रबंधन का प्रश्न है। तकनीक कचरे को अलग, संसाधित और पुनर्प्राप्त कर सकती है, लेकिन उसे सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए नागरिक सहभागिता, प्रभावी संस्थागत व्यवस्था और कठोर निगरानी आवश्यक है। भारत के शहरों को ‘कचरा हटाने’ की मानसिकता से आगे बढ़कर ‘कचरे से संसाधन बनाने’ की सोच अपनानी होगी। यही दृष्टिकोण बढ़ती आबादी और शहरीकरण के बीच स्वच्छ, टिकाऊ और संसाधन-कुशल भारत की आधारशिला बन सकता है।

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