यूके–अमेरिका संबंधों में तनाव? एयरबेस देने से ब्रिटेन का इंकार
लंदन। ब्रिटेन ने अमेरिका को ईरान पर हमला करने के लिए अपने एयरबेस देने से मना कर दिया है। अमेरिका इन सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करना चाहता था, लेकिन ब्रिटेन ने इनकार कर दिया। डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन के इस फैसले से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नाराज हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के उस समझौते से समर्थन वापस ले लिया है, जिसमें चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को सौंपने की बात थी। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ईरान पर हमले की तैयारी कर रहा है। इसके लिए वह डिएगो गार्सिया और ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड एयरबेस का इस्तेमाल करना चाहता है। डिएगो गार्सिया, चागोस द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है। 1970 के दशक से यह ब्रिटेन और अमेरिका का साझा सैन्य अड्डा रहा है। दरअसल पुराने समझौतों के मुताबिक, ब्रिटेन के किसी भी सैन्य ठिकाने का इस्तेमाल तभी हो सकता है, जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री इसकी मंजूरी दें। अंतरराष्ट्रीय कानून भी कहता है कि अगर कोई देश जानता है कि सैन्य कार्रवाई गलत है और फिर भी मदद करता है, तो उसे भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
ट्रम्प बोले- चागोस आइलैंड्स छोड़ना बहुत बड़ी गलती
ट्रम्प ने चागोस आइलैंड्स को लेकर ब्रिटेन की आलोचना की है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर गुरुवार को लिखा कि 100 साल की लीज किसी देश के मामले में ठीक फैसला नहीं है। डिएगो गार्सिया जैसा ठिकाना छोड़ना बहुत बड़ी गलती होगी। ट्रम्प ने कहा कि अगर ईरान, अमेरिका के साथ समझौता नहीं करता, तो अमेरिका को हिंद महासागर में मौजूद डिएगो गार्सिया और फेयरफोर्ड के एयरफील्ड का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। ऐसे में इन ठिकानों का कंट्रोल बेहद जरूरी है। वहीं ब्रिटिश सरकार का कहना है कि मॉरीशस के साथ समझौता सुरक्षा कारणों से जरूरी है। उनका तर्क है कि इससे लंबे और महंगे कानूनी विवाद से बचा जा सकेगा। बताया जा रहा है कि इस पूरे समझौते पर करीब 35 बिलियन पाउंड (4 हजार अरब रुपए से ज्यादा) का खर्च आ सकता है। डिएगो गार्सिया, हिंद महासागर में स्थित चागोस आइलैंड्स का हिस्सा है। ब्रिटेन ने 1814 में नेपोलियन को हराने के बाद इन आइलैंड्स पर कब्जा किया था। 1965 में इन्हें मॉरीशस से अलग कर ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ बना दिया गया। 1968 में जब मॉरीशस को आजादी मिली, तब यह तय हुआ था कि जब इन द्वीपों की रक्षा के लिए जरूरत नहीं रहेगी, तो इन्हें मॉरीशस को लौटा दिया जाएगा। बाद में डिएगो गार्सिया पर अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर एक जॉइंट मिलिट्री बेस बनाया था।
मॉरीशस 50 साल से इन आइलैंड्स का अधिकार मांग रहा
मॉरीशस 1980 के दशक से इन आइलैंड्स पर अपना अधिकार मांगता रहा है और उसने यह मामला अंतरराष्ट्रीय अदालतों में उठाया। साल 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने एक फैसले में कहा कि 1968 में मॉरीशस को आजादी देते वक्त उपनिवेश खत्म करने की प्रोसेस पूरी नहीं हुई थी और ब्रिटेन को जल्द से जल्द चागोस आइलैंड्स का प्रशासन खत्म करना चाहिए। ऋषि सुनक के लीडरशिप वाली कंजरवेटिव सरकार ने 2022 में ऐलान किया कि ब्रिटेन और मॉरीशस चागोस आइलैंड्स की संप्रभुता को लेकर बातचीत शुरू करेंगे। सरकार ने कहा कि सुरक्षा और कानूनी विवादों से बचने के लिए स्थिति साफ करना जरूरी था, ताकि डिएगो गार्सिया में ब्रिटेन-अमेरिका का मिलिट्री बेस बिना रुकावट चलता रहे। इसी कारण जुलाई 2024 के चुनाव से पहले मॉरीशस से 11 दौर की बातचीत हुई। ब्रिटेन-अमेरिकी की सालों पुरानी दोस्ती में खटास ब्रिटेन और अमेरिका की दोस्ती बहुत पुरानी है। दूसरे विश्व युद्ध से लेकर NATO तक, इराक-अफगानिस्तान युद्ध से लेकर खुफिया नेटवर्क 'फाइव आइज' तक, दोनों देश ज्यादातर मामलों में एक ही लाइन पर चलते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वक्त में हालात बदल गए हैं, दोनों देशों में कई मुद्दों पर विरोध नजर आ रहा है।