राजनीति तब कहां - अब कहां
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से संविधान पारित होने के बाद पूछा गया कि इसमें आपने किस लक्ष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। उनका जबाब था ‘‘देश के सभी लोगों को राजनैतिक समानता के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक समानता दिलाना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है, यानि ऊंच-नीच, गरीब-अमीर के अन्तर को मिटाना।‘‘ जब देश का संविधान बना तो हर व्यक्ति की जुबान पर था ‘‘अब हमारा राज होगा, कोई भेदभाव नहीं होगा, कोई जुल्म नहीं होगा परन्तु राजनीतिक शक्ति के खेल में सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र बुरी तरह से पीछे छूट गया। आज भारतीय राजनीति अपना सभ्य, सुसंस्कृत और सुव्यवस्थित स्वरूप खोती जा रही है। राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक जीवन में निष्ठाहीनता बहुत तेजी से बढ़ रही है। राजनीति पार्टी पारंपरिक और सर्वमान्य सिद्धांतों से हटती है तो परिणाम यही होता है। स्वतंत्रता सेनानी जो सवाल भारतीय समाज व सियासत के सामने छोड़ गये थे, उन जीवन मूल्यों को बहिष्कृत करने के लिए, गणवेशधारी शासक बाकायदा शिक्षा व संस्कृति, सामाजिक सौहार्द व धर्मनिरपेक्षता को तबाह कर फांसीवाद की जकड़न से आंतरिक सौहार्द को समाप्त करने में लगे है।
135 साल पुरानी कांग्रेस ने कई दौर देखे। गांधी-नेहरू और इन्दिरा का तो अब राहुल व प्रियंका का। भारत में राजनीति और प्रजातांत्रिक देश की छवि पतन की ओर अग्रसर है। आज राजनीति सिर्फ सत्ता भोग तक सिमट गई है। राजनैतिक जीवन में राजनैतिकता, ईमानदारी और उससे उपजा चारित्रिक संकट है। देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए अब जीवन-मरण का प्रश्न खड़ा हो गया है। सूरत कोर्ट के फैसले से लेकर अब तक केन्द्रीय सरकार जो कर रही है वह लोकतंत्र के लिए व सरकार के लिए लज्जाजनक है। राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर के नेता है, सांसद है, मोदी के मुकाबले कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं, सबसे बड़ी प्रतिष्ठित राजनैतिक पार्टी के पूर्व अध्यक्ष है, विपक्ष के बड़े नेता है, उनसे जिस प्रकार का व्यवहार हुआ वह सरकार के लिए निन्दाजनक है, विपक्ष के लिए चिन्ताजनक है।
सबको याद होगा श्रीमति इन्दिरा गांधी के साथ विपक्ष द्वारा सरेआम इसी प्रकार के दुव्र्यवहार पर पूरे देश में एक विरोधी लहर व्याप्त हो गई थी। चाहे कुछ भी होता श्रीमति इन्दिरा गांधी इस प्रकार सरकारी दबाब व रोकथाम पर नतमस्तक नहीं होती। अपने नेताओं के साथ इस प्रकार के व्यवहार पर केवल राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेशाध्यक्ष गोविन्द डोटासरा के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर कोई गम्भीर व प्रभावी प्रतिक्रिया कांग्रेस नेताओं ने नहीं दिखाई। 23 बड़े कांग्रेस के नेता, जो कांग्रेस में जान फूंकना चाहते है उन्होंने न कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की न तगडा विरोध प्रकट किया। वे केन्द्र व राज्य सरकार को कांगेस की एकता व ताकत का एहसास करा सकते थे। दुर्भाग्य से अन्य विपक्षी पार्टियों की भी दमदार प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
कांग्रेस नेता क्या इसी दम पर पुनः सत्ता में आना चाहते है। पार्टी वन मैन शो के रूप में उभर रही है। पूरे देश में कांग्रेसजनों में व जनता में प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी। ऐसा लगता है पार्टी के लोग सत्ता भोग तक सिमट गये है।
राजस्थान में 1955 की घटना है, तत्कालीन जनसंघ पार्टी ने राजस्थान सरकार के हाई कोर्ट बेंच सम्बन्धी फैसले के विरूद्ध 15 अगस्त को काला दिवस मनाने का ऐलान किया तथा घोषणा की कि मुख्यमंत्री को स्वतंत्रता दिवस पर माणक चैक चैपड़ पर झण्डारोहण नहीं करने देंगे। प्रान्तीय कांग्रेस के नेता मौन एवं निष्क्रिय थे। मैं युवक कांग्रेस का संयोजक था, राजनीति से अनभिज्ञ। मैंने प्रदेशाध्यक्ष व्यास जी से कहा ‘‘आपको लोकनायक कहते है, शेरे राजस्थान कहते है, आपके समक्ष यह किस प्रकार की पार्टी की कमजोरी व नामर्दी। प्रान्तीय कांग्रेस अध्यक्ष स्व. जयनारायण व्यास व मुख्यमंत्री के बीच मतभेद थे। व्यास जी में पार्टी हित जागृत हो गया, व्यास जी ने चैलेंज स्वीकार कर घोषणा की कि मुख्यमंत्री नहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष झण्डारोहण करेंगे। मुख्यमंत्री के स्थान पर व्यास जी सभास्थल पर गये, बड़ी तादाद में तैयारी से इकठ्ठे विरोधियों की परवाह किये बगैर, जनसंघ कार्यकर्ताओं की धक्कामुक्की सहन करते हुए स्टेज पर पंहुचे व झण्डारोहण किया। कांग्रेस नेताओं व कार्यकर्ताओं ने विपक्ष के चैलेंज का फेल कर दिया। युवक कांग्रेस ने पूरे विरोध का दमदारी से सामना किया।
यह तो आज तो राष्ट्रीय स्तर पर चैलेंज है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए चिन्तनीय स्थिति है। क्या मजाल था, उनके राष्ट्रीय नेताओं को इस प्रकार अपमानित कर दिया जाए। क्या इस प्रकार की कार्यवाही बगैर केन्द्रीय व राज्यस्तरीय सत्ताधारियों के इशारे के बगैर कर सकती है।,
मैं यह आलेख कांग्रेस पार्टी के एक पुराने लघु कार्यकर्ता के रूप में लिख रहा हूं। पार्टी में संकीर्णता बढ़ी है। कांग्रेस पार्टी का आत्ममंथन चुनावी गणित और यांत्रिकी से आगे जाना चाहिए। कांग्रेस पार्टी धर्म और जाति के आधार पर समाज को बांटने की भाजपा की कोशिशों से अवगत है लेकिन उसने साम्प्रदायिकता की हलचल पर खास ध्यान नहीं दिया। अन्य कांग्रेस नेताओं ने वास्तविक व ग्रास रूट कार्यकर्ताओं का साथ छोड़ दिया, अपना बुनियादी एजेन्डा छोड़ दिया। हाईकमान में निर्णय प्रक्रिया अव्यवस्थित है, संगठनात्मक मामलों में केवल भाषण विशेषज्ञ हावी हैं। कांग्रेस के संगठन, जो चुनाव अभियान व एजेन्डे में समन्वय करते हैं, वे कागजी है। पार्टी केडर आधारित पार्टी नहीं रही। पार्टी को विश्वसनीय राष्ट्रीय हाईकमान की जरूरत है, पार्टी केडर व फील्ड में जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की जरूरत है।
लोगों की मानसीकता बदली है और पार्टी सिस्टम बहुध्रुवीय हुआ है। राजनीति पतन की ओर अग्रसर है। कांग्रेस और उसके नेतृत्व को अपने मूल मुद्दों पर अड़े रहना होगा, जनता के बीच एक अलग पहचान बनानी होगी। ऐसी नई राजनीति चाहिए जो लोगों के घाव भरे, राजनीति आज कला के साथ विज्ञान बन गई है। सचेत रहना होगा, आज विरोधी गांधी व पटेल के साथ अब शास्त्री, नरसिंह राव व मनमोहन को अपनाने को तैयार है जबकि वास्तविक हीरो नेहरू व कांग्रेस पार्टी को हर समस्या, कमी व बुराई के लिए जिम्मेदार करार दे रहे हैं। अगर कांग्रेसजन, कांग्रेस नेता एकजुटता के साथ आदर्शो का पालने करते तो आज राजनीति, लोकतंत्र और राष्ट्र की यह दुर्दशा नहीं होती।
-डा.सत्यनारायण सिंह