Dark Mode
राजस्थान में भाजपा का मुख्यमंत्री कौन ?

राजस्थान में भाजपा का मुख्यमंत्री कौन ?

यहाँ तो एक अनार है और सौ बीमार है !

भाजपा की नेता और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने झालावाड़ में एक जनसभा में अपने सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह के भाषण और उस पर जनता के रिस्पांस की तारीफ़ें करते हुए कहा, 'झालावाड़ ने सांसद दुष्यंत सिंह को इतना सिखा दिया है कि अब मैं रिटायर हो सकती हूँ।'उनके भाषण में इतनी सी बात सुनकर भाजपा के भीतर काफ़ी हलचल होने लगी और उनका यह बयान वायरल हो गया।लेकिन वसुंधरा राजे ने अगले दिन झालारापाटन से नामांकन दाख़िल करने के दौरान कहा, ''मैं रिटायर होने वाली नहीं हूँ। सेवा का कर्म जारी रहेगा। मैंने सांसद दुष्यंत सिंह की राजनीतिक परिपक्वता से खु़श होकर माँ के नाते कहा कि वे झालावाड़-बारां में अच्छा काम कर रहे हैं।'' लेकिन यह सवाल एक सहज जिज्ञासा के रूप में इस बार शुरू से ही पूछा जा रहा है, यह बताइए, अगर वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं होती हैं तो फिर कौन?

इन दिनों राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को अंदर ही अंदर मथ रही है। ऐसा कोई दिन और भूभाग नहीं, जहाँ यह प्रश्न न पूछा जा रहा हो।अब लगभग पूरे टिकट बँट चुके हैं और बिसात बिछ चुकी है; लेकिन यह तय नहीं है कि भाजपा की सरकार बनेगी या कांग्रेस की। यह भी तय नहीं कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा?इसके बावजूद "मुख्यमंत्री कौन' वाला प्रश्न मानो हर रिंद, हर साकी, हर खुम, हर पैमाने और हर मयखाने का सवाल हो गया है।और मज़ेदार क़िस्सा ये है कि अब छोटे-बड़े हर नेता के आसपास के लोग इलाक़ों में चुनाव जीतने का ज़ोर लगाते हुए कहने लगे हैं, ‘आप ज़ोर लगाओ। इस बार साहब या मैम का नंबर आ सकता है!’

राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अभी तक अपने मुख्यमंत्री पद के चेहरे को घोषित नहीं किया है लेकिन सूत्रों के अनुसार वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री फेस हो सकती हैं। भाजपा के एक नेता ने बताया कि पार्टी जल्द ही राजस्थान में मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में वसुंधरा राजे का नाम घोषित कर सकती है। अब तक राजस्थान में भाजपा की रणनीति एकदम अलग थी क्योंकि भाजपा किसी को मुख्यमंत्री फेस घोषित नहीं कर रही थी। चुनाव नतीजों के बाद मुख्यमंत्री चेहरे पर फैसला होने की खबर थी। आखिर भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव कैसे किया, पार्टी का हृदय परिवर्तन कैसे हो गया और राजस्थान में वसुंधरा राजे भाजपा के लिए जरूरी है या मजबूरी हैं, इस तरह के सवाल उठ रहे हैं।

भाजपा ने राजस्थान में करीब एक महीने पहले एक सर्वे कराया था। सर्वे सीक्रेट था, जिसकी रिपोर्ट भी सीक्रेट ही रखी गई। रिपोर्ट की जानकारी पार्टी के चंद बड़े नेताओं के बीच ही थी। रिपोर्ट में राजस्थान में भाजपा की चुनावी संभावनाओं का पूरा हिसाब था। रिपोर्ट में लिखा था कि राजस्थान नें भाजपा कांग्रेस आगे चल रही है। यह भी बताया गया कि कांग्रेस के मुकाबले भाजपा मामूली अंतर से आगे है। इस रिपोर्ट में एक और बड़ी बात थी, जिसे देखकर भाजपा राजस्थान की इलेक्शन स्ट्रेटजी पर दोबारा विचार करने और उसमें बड़े बदलाव के लिए सोचने लगी।पड़ताल में यह बात सामने आई कि अगर वसुंधरा को मुख्यमंत्री फेस बनाया जाए तो भाजपा को फायदा हो सकता है, यानी वोट के मामले में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले निर्णायक बढ़त मिल सकती है। भाजपा की रिपोर्ट जैसे ही दिल्ली पहुंची, इसका असर दिखने लगा। जो भाजपा मुख्यमंत्री फेस के तौर पर किसी को एक्सेप्ट करने से बच रही थी वो अब मॉडल के तौर पर वसुंधरा का नाम ले रही है।

बता दें कि नावां में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार (7 नवंबर) को अपनी रैली के दौरान पूर्व की वसुंधरा सरकार का जिक्र करते हुए राजस्थान की मौजूदा गहलोत सरकार पर निशाना साधा।भाजपा में अमित शाह जैसे दिग्गज अगर कुछ कहते हैं तो उसका मतलब होता है और असर होता है। चंद दिन पहले तक सामूहिक नेतृत्व की बात करने वाले अमित शाह अगर आज वसुंधरा सरकार की चर्चा कर रहे हैं तो समझिए कि यह उसी रिपोर्ट का असर है क्योंकि 2018 के विधानसभा चुनाव में 13 सीट ऐसी थीं जहां हार जीत का अंतर 1 फीसद से कम था। 10 सीट ऐसी थीं जहां 2 फीसद से भी कम वोट से हार-जीत का फैसला हो गया और 15 सीट ऐसी थी जहां 3 फीसद से भी कम वोट से हार जीत हो गई।ऐसे में जहां पर इतना कम मार्जिन हो, भाजपा के दिग्गजों को लगा कि ऐसा रिस्क नहीं लेना चाहिए। ये कुल मिलाकर 38 सीटें हुईं यानी 200 सदस्यों वाली राजस्थान विधानसभा में करीब-करीब हर पाचंवी सीट पर जीत-हार का फैसला बेहद कम मार्जिन से होता है।

राजस्थान जैसे स्टेट में जहां हर पांच साल में सरकार बदलने का रिवाज रहा है वहां 38 सीटें बेहद अहम हैं, इसलिए भाजपा को अब राजस्थान में वसुंधरा की अहमियत का अंदाजा होने लगा है। हम जिस रिपोर्ट का जिक्र बार-बार कर रहे हैं, यह उसी का नतीजा है कि भाजपा वसुंधरा को बैक सीट से फ्रंट सीट पर लाने को तैयार नजर आने लगी है। इस मुद्दे पर राजनीतिक विश्लेषक कहते है कि ऐसा लगता है कि वसुंधरा के नेतृत्व में ही भाजपा चुनाव लड़ेगी।

वसुंधरा को लेकर भाजपा लीडरशिप के इस हृदय परिवर्तन को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उसके प्लान में वसुंधरा के लिए कोई जगह नहीं दिख रही थी। वसुंधरा अगस्त से ही करीब-करीब साइडलाइन लग रही थीं। यह बात जयपुर में हुए घटनाक्रम से समझी जा सकती है। भाजपा ने 17 अगस्त को राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए दो समितियां बनाईं। चुनाव प्रबंधन कमेटी की कमान पूर्व सांसद नारायण पंचारिया को सौंपी गई, पार्टी के 21 नेताओं को इसका मेंबर बनाया गया, स्टेट मेनिफेस्टो कमेटी की कमान अर्जुन राम मेघवाल को सौंपी गई, इसमें 25 सदस्य शामिल किए गए और वसुंधरा को इन दोनों समितियों में जगह नहीं दी गई। आम तौर पर पार्टियां अपने दिग्गज नेताओं के लिए टिकट का ऐलान पहली लिस्ट में करती हैं जबकि वसुंधरा को टिकट के लिए दूसरी लिस्ट का इंतजार करना पड़ा। जब स्टार प्रचारकों की लिस्ट आई तो उसमें भी वसुंधरा को 24वें नंबर पर रखा गया। उनके 10 समर्थकों के टिकट काट दिए गए। इनमें उनके करीबी यूनुस खान भी हैं जो चुनावी मैदान अब निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतर चुके हैं।

मतलब ये कि किसी ने कुछ कहा नहीं लेकिन हर तरफ से यही संकेत मिले कि वसुंधरा का गेम ओवर हो चुका है। वसुंधरा खुद भी इसी तरह के मैसेज दे रही थीं लेकिन अचानक उनका अंदाज-ए-बयां बदल गया।3 नवंबर को वसुंधरा राजे ने झालावाड़ में कहा था, ''...मुझे लग रहा है कि मैं अब रिटायर हो सकती हूं। अगले ही दिन (4 नवंबर) उन्होंने एक सभा में कहा, ''आपको ये बहुत क्लियर करना चाहती हूं कि कहीं नहीं जा रही हूं मैं, अभी नॉमिनेशन फाइल करके ही निकल रही हूं। कहीं रिटायरमेंट की बात मत अपने ध्यान में रखना।''

पार्टी और राजनीति को लेकर वसुंधरा के बनते बिगड़ते मूड की वजह क्या है? इसका संकेत जयपुर में 27 सितंबर को मिला। उस दिन जयपुर में शाम 7 बजे से रात के दो बजे तक एक मीटिंग हुई, जिसमें अमित शाह, जेपी नड्डा और पार्टी के दूसरे दिग्गज भी थे लेकिन वसुंधरा नहीं थीं। उनकी नाराजगी के चर्चे चल ही रहे थे। इसलिए तरह-तरह की अटकलें भी लग रही थीं लेकिन वसुंधरा अचानक पहुंचीं।वह बैठक में सिर्फ 15 मिनट रहीं और मुस्कुराती हुई चली गईं। वसुंधरा के करीबी बताते हैं कि उसी मीटिंग के बाद महारानी को भरोसा हो गया था कि पार्टी ने भले ही मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित नहीं किया लेकिन अंत में बाजी उनके पक्ष में ही रहेगी।

वैसे देखा जाय तो मुख्यमंत्री फेस बनने के लिए भाजपा में दावेदार और भी है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ ही कई ऐसे नाम हैं, जो अपने-अपने तरीके से खुद को इस रेस में मान रहे हैं। इनमें आमेर से एमएलए और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत के नाम शामिल हैं।इनके अलावा राजस्थान के सियासी गलियारे में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के नाम की भी सुगबुगाहट है। इनके अलावा स्थानीय नेता गुलाब चंद कटारिया, राजेंद्र राठौर और किरोड़ी लाल मीणा, धर्म का कमंडल और जाति का मंडल लेकर चलने वाले बाबा बालकनाथ , अर्जुन मेघवाल जैसे नेता भी शामिल हैं , जो अपने हिसाब से खुद के लिए अभियान चला रहे हैं। हालांकि इनमें कोई भी नेता खुलकर अपनी दावेदारी पर बात नहीं कर रहा है। इनमें एक नाम हाल में और जुड़ गया राजकुमारी दीया का जो राजस्थान के राजसमंद से सांसद हैं। वह जयपुर के पूर्व महाराज भवानी सिंह की बेटी हैं। जयपुर राजघराना खुद को भगवान राम का वंशज बताता है।इसके आलावा भी एक लम्बी सूचि है जसमें और कई कन्द्रीय मंत्री भी है ।

परन्तु आलाकमान जनता है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच 2018 से ही तनातनी है। ऐसे में भाजपा इसका फायदा उठाना चाहेगी। इसके लिए जरूरी है कि वसुंधरा राजे पूरे मन से भाजपा के हाल में सक्रीय हो चुकी है ।करीब ढाई दशक से राजस्थान की सत्ता वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के इर्द-गिर्द ही घूमते रही है। पर बार – बार सवाल यही उठता है कि जीत के बाद कौन ? यह प्रश्न बना रहता है। कई नाम आ रहे थे पर उन सब के मंथन करने के बाद जो नाम उभर कर आ रहा है वह है वसुंधरा राजे का ही सो जानकर लोगों का कहना है कि एक अनार के लिए सौ लोगों को बीमार होने की जरुरत नहीं ।

Comment / Reply From

Newsletter

Subscribe to our mailing list to get the new updates!