लोकतंत्र के चीरहरण का अपराधी कौन
राजनीति के अपराधीकरण पर समय देश की सियासत बेहद गरमाई हुई है। विशेषकर माफिया
डॉन अतीक अहमद की हत्या के बाद एक बार फिर लोकतंत्र को लेकर चर्चा शुरू हो गयी है।
किसी की सरेआम हत्या का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। चाहे वह दुर्दांत अपराधी ही क्यों न
हो। मगर यहाँ इस बात पर भी गहन मंथन की जरुरत है की ये अपराधी नेताओं की शह पाकर
कैसे शांति और अमन के दुश्मन बन कर लोकतंत्र का चीरहरण करने लग गए। आज लोकतंत्र के
दागीकरण पर भी चर्चा होनी चाहिए। अतीक पर हत्या ,लूटपाट, रंगदारी आदि के सैंकड़ों मुकदमें
दर्ज़ थे। यूपी सरकार ने अतीक के परिवार से हजारों करोड़ की अवैध चल और अचल सम्पति
जब्त की है। आखिर यह इतना बड़ा डॉन कैसे बना इसकी रोचक और लोमहर्षक कहानी है।
मगर यहाँ हम इस माफिया डॉन के आपराधिक इतिहास पर चर्चा के साथ राजनीति के
अपराधीकरण पर बात करना चाहते है। आज लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेताओं और सियासी
पार्टियों के नापाक गठजोड़ से जनता जनार्दन को जागरूक होने की जरुरत है।
अपराधियों को नेताओं का समर्थन हो या नेताओं की अपराधियों को कानून के शिकंजे से बचाने
की कोशिश, आखिर राजनैतिक दलों पर अपराधियों का ये कैसा असर है। भारतीय लोकतंत्र में
अपराधी इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि कोई भी राजनीतिक दल उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पा
रहा। हालात यहाँ तक पहुँच गए है कि पार्टियाँ उन्हें नहीं चुनती बल्कि वे चुनते हैं कि उन्हें
किस पार्टी से लड़ना है। उनके इसी बल को देखकर उन्हें बाहुबली का नाम मिला है। कभी
राजनीतिज्ञ अपराधियों का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते थे अब अपराधियों ने दूसरे को
लाभ पहुँचाने के बदले खुद ही कमान संभाल ली है। 2024 के लोकसभा चुनाव अभी दूर है मगर
सियासी हल्ला गुल्ला अभी से मच गया है। चुनावों में विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा
आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों को अपनी टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारने को लेकर
देश में एक बार फिर सियासी बहस छिड़ गयी है। विशेषकर यूपी में सियासी दल एक दूसरे पर
दंगाई और अपराधियों को अपनी पार्टी का टिकट देने का आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते है।
देश की सर्वोच्च अदालत ने भी अपने एक बहुचर्चित फैसले में कहा था कि उम्मीदवारों के नामों
की घोषणा करते वक्त राजनीतिक दलों के लिए संबंधित व्यक्ति का अपराधिक रिकॉर्ड
सार्वजनिक करना अनिवार्य है। चुनाव आयोग के भी स्पष्ट निर्देश है आपराधिक मामलों वाले
उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारने वाले राजनीतिक दलों को अपनी वेबसाइट पर इस तरह
के व्यक्तियों का विवरण अनिवार्य रूप से अपलोड करना होगा और चुनाव के लिए उन्हें टिकट
देने का कारण भी बताना होगा।
राजनीति में शुचिता को लेकर ऊपरी तौर पर सभी सियासी दल सहमत है मगर व्यवहार में
उनकी कथनी और करनी में भारी अंतर है। लगभग सभी दल चुनाव जीतने के लिए ऐसे
उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारते है जो बाहुबली होने के साथ आपराधिक आचरण वाले
है। नेताओं के खिलाफ अदालती मुकदमें कोई नयी बात नहीं है। आजादी के बाद से ही नेताओं
को विभिन्न धाराओं में दर्ज मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले दो दशकों में ऐसे
मामलों में यकायक ही तेजी आयी। दर्ज मुकदमों में हत्या, हत्या के प्रयास, सरकारी धन का
दुरूपयोग, भ्रष्टाचार, बलात्कार जैसे गंभीर प्रकृति के मुकदमें भी शामिल है। कई नामचीन नेता
आज भी जेलों में बंद होकर सजा भुगत रहे है और अनेक नेता जमानत पर बाहर आकर
मुकदमों का सामना कर रहे है। वर्षों से इन मुकदमों का फैसला नहीं होने से हमारी लोकतान्त्रिक
प्रणाली पर सवाल उठते रहे है। लम्बे मुकदमें चलने से सबूत मिलने में काफी परेशानी होती है
और अंततोगत्वा आरोपी बरी हो जाते है। सुप्रीम अदालत यदि ऐसे मुकदमों के शीघ्र निस्तारण
के लिए कोई सख्त कदम उठाये तो पीड़ितों को न्याय मिल पायेगा।
पिछले सालों में देश में जिस तरह हमारी राजनीति का अपराधीकरण हुआ है और आपराधिक
तत्वों की ताकत बढ़ी है, वह जनतंत्र में हमारी आस्था को कमजोर बनाने वाली बात है।
राजनीतिक दलों द्वारा अपराधियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकृति और
सम्मान देना और फिर कानूनी प्रक्रिया की कछुआ चाल, यह सब मिलकर हमारी जनतांत्रिक
व्यवस्था और जनतंत्र के प्रति हमारी निष्ठा, दोनों, को सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं।
ईमानदार राजनीति का तकाजा है कि राजनीति को आपराधिक तत्वों से मुक्त कराने की
प्रक्रिया तत्काल शुरू हो न्याय-व्यवस्था में बदलाव लाकर राजनीति के अपराधियों के मामले
निश्चित समय-सीमा में निपटाये जाएं। हालाँकि यूपी में योगी सरकार ने अपने शासन में अपरधियों को
कानून के शिकंजे में लेने और अपराध मुक्त प्रदेश का दावा किया है।
- बाल मुकुन्द ओझा