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कर्नाटक चुनाव में कौन किसका खेल बिगाड़ेगा या बनाएगा ?

कर्नाटक चुनाव में कौन किसका खेल बिगाड़ेगा या बनाएगा ?

एक बात बहुत साफ है कि आप ने बहुत कम समय में बहुत कुछ हासिल कर लिया है।। जहां आम आदमी पार्टी दिल्ली में सरकार बनाकर बैठी है तो वहीं पंजाब में भी पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी । आप ने पंजाब में 117 में से 92 सीटों पर जीत दर्ज की थी । अब बात करें गोवा विधानसभा चुनाव की तो यहां भी अरविंद केजरीवाल की पार्टी के नेताओं का दो सीटों पर कब्जा है। वहीं हाल ही में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 5 सीटों पर जीत दर्ज की और करीब 14 फीसदी वोट हासिल किए हैं। गुजरात पीएम मोदी और अमित शाह का गढ़ है। ऐसे में आम आदमी पार्टी ने वहां पांच सीटें जीतकर अपनी मौजूदगी बड़ी मजबूती से दर्ज की है। हालांकि राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के बाद आम आदमी पार्टी भी पहली बार राज्य की कमोबेश सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इससे पहले 2018 के चुनाव में अरविंद केजरीवाल की पार्टी 28 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। हालांकि वो कुछ ख़ास कर नहीं पाई थी। इस बार भी भले ही वो दावा कर रही है कि बेंगलुरु और उसके आस-पास की 15 सीटों पर वो बड़ा उलटफेर कर सकती है, लेकिन फिलहाल इस तरह की संभावना नहीं दिखती है। बहरहाल 20 अप्रैल को नामांकन की आखिरी तारीख थी। कौन किस सीट से लड़ रहा है, उसका भी खुलासा हर जगह से हो गया है। इसके साथ नेताओं में पाला बदलने का सिलसिला भी अब थम चुका है। कर्नाटक की सभी 224 विधानसभा सीटों पर 10 मई को मतदान होना है। ऐसे में अब सभी पार्टियों ने प्रचार अभियान को और भी तेज़ कर दिया है।

देखा जाय तो कर्नाटक चुनाव में मुख्य तौर से भाजपा , कांग्रेस और जेडीएस के बीच मुकाबला है। जेडीएस को ओवेसी समेत कई और पार्टिया सपोर्ट कर रही है जिनका कर्नाटक में कोई खास वजूद नहीं है । हम सबसे पहले भाजपा की बात करते हैं। कर्नाटक की सत्ता में वापसी भाजपा के लिए दो कारणों से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। दक्षिण के 5 बड़े राज्यों कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में से सिर्फ़ कर्नाटक ही ऐसा सूबा है, जहां हम कह सकते हैं कि भाजपा का सही मायने में जनाधार है। बाकी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में भाजपा पिछले 30-35 साल से चाहे कितने भी हाथ-पांव मारते आई हो, राज्य में सरकार बनाने के लिहाज से न तो उसकी राजनीतिक हैसियत बन पाई है और न ही जनाधार में कोई बड़ा उछाल आया है। अगर इस बार कर्नाटक की सत्ता भाजपा के हाथों से चली जाती है, तो फिर दक्षिण भारत से उसका पूरी तरह से सफाया हो जाएगा और उसके मिशन साउथ को भी गहरा झटका लगेगा। ऐसे तो भाजपा दावा करती है कि वो कार्यकर्ताओं के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन अगर वो कर्नाटक का चुनाव हार जाती है, तो ये सोचिए कि दुनिया की उस बड़ी पार्टी का भारत के दक्षिण के बड़े राज्यों में से किसी में सत्ता ही नहीं रह जाएगी। इसका सबसे ज्यादा फायदा विपक्ष को मिलेगा इस तरह के परसेप्शन बनाने में कि भाजपा को भी हराया जा सकता है। भाजपा के लिए इस बार कर्नाटक चुनाव इसलिए भी ख़ास है कि क्योंकि अगले साल केंद्र की सत्ता के लिए लोकसभा चुनाव होना है। लोकसभा के हिसाब से कर्नाटक उन राज्यों में शामिल है, जहां 2019 में भाजपा को अपार समर्थन हासिल हुआ था। उस वक्त यहां की 28 लोकसभा सीटों में 25 पर भाजपा की जीत हुई थी। ऐसे तो लोकसभा और विधानसभा चुनावों के समीकरण, मुद्दे और वोटिंग पैटर्न अलग-अलग होते हैं, लेकिन कर्नाटक में जो भी विधानसभा के नतीजे रहेंगे, उससे अगले साल के आम चुनाव के लिए सूबे में माहौल बनाने में बहुत हद तक मदद तो मिलेगी ही।

भाजपा के लिए कर्नाटक की चुनावी बिसात में जगह-जगह कई कांटे हैं। उसके दो बड़े नेता जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं। इसमें से जगदीश शेट्टार जुलाई 2012 से मई 2013 तक मुख्यमंत्री भी रहे हैं। उनकी गिनती उन नेताओं में होती है, जिन्होंने बीएस येदियुरप्पा के साथ मिलकर दक्षिण भारत के किसी राज्य में पहली बार कमल को खिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हुबली-धारवाड़ सेंट्रल सीट से टिकट नहीं मिलने से नाराज जगदीश शेट्टार 17 अप्रैल को कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कांग्रेस ने उन्हें इसी सीट से उम्मीदवार भी बना दिया है। जगदीश शेट्टार का सीधे-सीधे कहना है कि ये सब कुछ भाजपा के संगठन महासचिव बीएल संतोष के कहने पर हो रहा है।

वहीं राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी भी कुछ दिन पहले टिकट नहीं दिए जाने से नाराजगी के बाद भाजपा से पल्ला झाड़ते हुए कांग्रेस का हाथ थाम चुके हैं। सावदी को कांग्रेस ने बेलगावी जिले की अथानी सीट पर पार्टी का उम्मीदवार बनाया है। मौजूदा एमएलसी लक्ष्मण सावदी अथानी से तीन बार विधायक रह चुके हैं। सावदी, येदियुरप्पा सरकार में 2019 से 2021 तक उपमुख्यमंत्री और परिवहन मंत्री रह चुके हैं।

जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी दोनों ही लिंगायत समुदाय से आते हैं। लिंगायत समुदाय को पिछले तीन दशक से भाजपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है। हालांकि 2021 में बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाकर बसवराज बोम्मई को सीएम बनाने के बाद से ही कहा जा रहा है कि लिंगायत समुदाय के लोग भाजपा से नाराज चल रहे हैं। आरक्षण का भी एक मुद्दा है जिसको लेकर लिंगायत समुदाय के लोग भाजपा से नाराज माने जा रहे हैं। हालांकि चुनाव ऐलान से चंद दिन पहले मुस्लिम कोटे के 4 फीसदी आरक्षण को खत्म कर उसके जरिए वोक्कालिगा और लिंगायतों के समूह में दो-दो फीसदी आरक्षण बढ़ाने का दांव बसवराज बोम्मई सरकार ने चली है, लेकिन ये मुद्दा भी अभी कोर्ट में पहुंच गया है, जिसके बाद से इसके अमल पर रोक लगी हुई है। लिंगायत यहां के काफी प्रभावशाली समुदाय हैं। इनकी आबादी करीब 17 से 18 फीसदी के बीच मानी जाती है और अगर इनकी नाराजगी मतदान में दिख गई तो फिर भाजपा के लिए कर्नाटक की सत्ता में वापसी बेहद कठिन हो जाएगी।

अब बात करते हैं कांग्रेस की। कर्नाटक के नतीजे अगर पक्ष में हुए तो कांग्रेस के लिए संजीवनी होगी। पिछले दस साल चुनावी राजनीति के लिहाज से कांग्रेस के लिए बहुत ही बुरा रहा है। इक्के-दुक्के राज्यों को छोड़ दें तो दो लोकसभा चुनाव के साथ ही कई राज्यों में कांग्रेस को बहुत ही बुरी हार का सामना करना पड़ा है। एक तरह से अस्तित्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस के लिए कर्नाटक उम्मीद की किरण बन सकती है। ऐसे भी अभी जहां कुल 200 से ज्यादा विधानसभा सीटें हो, उन राज्यों में कहीं भी कांग्रेस की सरकार अपने दम पर नहीं है। कर्नाटक में जीत हासल करने पर कम से कम एक ऐसा राज्य कांग्रेस के पास हो जाएगा।

दूसरा फायदा कांग्रेस को 2024 के आम चुनाव के लिए रणनीति बनाने के लिहाज से भी होगा। ये हम सब जानते हैं कि केंद्रीय राजनीति के हिसाब से भाजपा अभी जितनी मजबूत है, बिखरा विपक्ष 2024 में उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। भाजपा के खिलाफ 'एक के मुकाबले एक' फार्मूले की रणनीति को लेकर विपक्षी एकता बनाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि उसमें सबसे बड़ी बाधा ये आ रही है कि उस विपक्षी एकता की अगुवाई कौन सी पार्टी करेगी। कायदे से पैन इंडिया जनाधार होने की वजह से ये सिर्फ़ कांग्रेस ही कर सकती है, लेकिन अभी भी बहुत सारी विपक्षी पार्टियां जैसे ममता बनर्जी की टीएमसी, केसीआर की बीआरएस, नवीन पटनायक की बीजेडी, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस पर राजी नहीं दिख रही है या फिर ये लोग चुनाव पूर्व कांग्रेस को नेतृत्व देने के मुद्दे पर संशय में हैं। अगर कांग्रेस अपने दम पर कर्नाटक का चुनाव जीत जाती है, तो कांग्रेस की अगुवाई में विपक्षी एकता की संभावना को ज्यादा बल मिल सकता है। जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी के आने से कांग्रेस को उम्मीद है कि एक बार फिर लिंगायत समुदाय के लोगों का थोड़ा ही सही कांग्रेस पर भरोसा बढ़ेगा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी के शिवकुमार तो इससे इतना ज्यादा उत्साहित नज़र आ रहे हैं कि उन्होंने ये तक दावा कर दिया है कि पार्टी अब 150 सीटें आसानी से जीत लेगी। क्योंकि उनको भरोसा है कि इन दोनों के कांग्रेस में आने से वीरशैव लिंगायत के 2 से 3 प्रतिशत वोट उनकी पार्टी को बढ़ जाएंगे।

अब अगर जेडीएस की बात करें तो भले ही उसके नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी ये दावा कर रहे हों कि इस बार उनकी पार्टी अकेले दम पर बहुमत हासिल कर लेगी, लेकिन कर्नाटक में ग्राउंड रियलिटी इससे काफी दूर है। जेडीएस पिछले तीन विधानसभा चुनावों में 25 से 40 सीटों के बीच झूलते रही है। जेडीएस को 2018 में 37 सीटें, 2013 में 40 और 2008 में 28 सीटें हासिल हुई थी। 2008 से ही एक तरह से एचडी देवगौड़ा की पार्टी की कमान उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी संभाल रहे हैं। जिस तरह का अभी माहौल है, उससे इस बार भी यही अनुमान है कि जेडीएस इस बार भी इन आंकड़ों के बीच ही सिमट कर जाएगी। हालांकि जेडीएस इतनी सीटें लाकर भी कई बार किंगमेकर की भूमिका में रही है और 2018 में महज़ 40 सीटें लाने के बावजूद एचडी कुमारस्वामी कांग्रेस से गठजोड़ कर कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उससे पहले भी वे फरवरी 2006 से अक्टूबर 2007 के बीच सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इन दोनों ही मौके वैसे थे जब राज्य में किसी भी दल को बहुमत हासिल नहीं हुआ था और दोनों मौकों पर जेडीएस को कांग्रेस और भाजपा से कम सीटें हासिल हुई थी। फरवरी 2006 में जेडीएस भाजपा के साथ 20 महीने सरकार में रह चुकी है। वहीं 2018 चुनाव के बाद जेडीएस 14 महीने कांग्रेस के साथ सरकार में रह चुकी है। कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा के साथ जाने के चलते कर्नाटक के लोगों का जेडीएस पर भरोसा पूरी तरह से कभी नहीं बन पाया है। ऐसे अगर भाजपा या कांग्रेस में से कोई भी पार्टी बहुमत हासिल करने में कामयाब नहीं रही तो एक बार फिर जेडीएस कम सीट लाकर भी सरकार बनाने में सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

-अशोक भाटिया

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