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किसकी नाव पर सवार होंगे दलित

किसकी नाव पर सवार होंगे दलित

किसकी नाव पर सवार होंगे दलित

 

आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियां दलित वोटो को रिझाने में जुटी हैं।
सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों धड़े दलितों पर डोरे डाल रहे हैं। राजनीतिक दलों ने अपने तरकश के
तीरों को धार देनी शुरू कर दी है। जातीय वोटों को हासिल करने के लिए नए नए दांव और
पैतरे आजमाए जा रहे है। इनमें सबसे प्रमुख दलित वोट है। बताया जाता है दलित वोट जिधर
जाते है सत्ता की चाबी उसे ही मिलती है। दलित जिस दल की ओर जाएंगे, उसकी काफी हद
तक राह आसान कर देंगे। इनकी संख्या को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों ने इनको अपने
पाले में खींचने की कवायद तेज कर दी है। भाजपा को पिछले दो लोकसभा चुनावों में झोली
भरकर दलित वोट मिले थे। भाजपा ने एक दलित महिला को राष्ट्रपति के पद पर बैठाकर इन
वोटों को रिझाने का काम किया है। अब 2024 के लोकसभा चुनावों में एनडीए और इंडिया
गठबंधनों ने दलित वोटों को लुभाने के अपने प्रयास तेज कर दिए है।
भारत की सियासत में जाति विशेष के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। जातियों के कारण
बहुत से नेता राजनीति में बलशाली बने हुए है। सभी पार्टियों में कमोवेश ऐसे नेता मिल जायेंगे
जिनकी सियासत जाती से ही शुरू होकर वहीं जाकर थम जाती है। यहाँ हम दलित सियासत की
बात कर रहे है। दलित का मतलब पीड़ित, शोषित व्यक्ति से है। अनुसूचित जाति को दलित बताया
जाता है। संवैधानिक भाषा में इन्हें अनुसूचित जाति कहां गया है। भारतीय जनगनणा 2011 के अनुसार
भारत की जनसंख्या में लगभग 16.6 प्रतिशत या 20.14 करोड़ आबादी दलितों की है। आरोप है कि स्वर्ण
जाति ने हजारों वर्षों से दलित कही जानेवाली जाति के लोगों का शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न और शोषण
किया जिसके फलस्वरूप इस समुदाय के लोग कभी ऊपर नहीं उठ पाए।
आजादी के बाद सातवें दशक तक कांग्रेस पार्टी दलितों की सर्वेसर्वा रही। समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर
लोहिया ने जाति तोड़ों का नारा बुलंद किया और पिछड़े पावे सौ में साठ की वकालत की। उन्होंने अपनी पार्टी
में रविराय को संसदीय दल का नेता बना कर दलितों को आगे बढ़ाया। लोहिया के बाद दलित राजनीति पर
कांग्रेस का वर्चस्व रहा। जनता पार्टी के शासन में जगजीवन राम ने कांग्रेस से अलग होकर दलितों की
हिमायत का परचम लहराया मगर यह भी अधिक दिनों तक नहीं चला। आठवें दशक के बाद कांशीराम
दलितों के नए मसीहा के रूप में उभरे। कांशीराम ने दलितों की भावना को भड़काया और उन्हें एकजुट करने
में सफलता प्राप्त की। कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन किया जिसने तिलक, तराजू और तलवार,

इनको मारो जूते चार नारे के साथ कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियों के सारे समीकरण बिगाड़ दिए।
कांशीराम को मायावती जैसी सहयोगी मिलने के बाद उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की सत्ता हासिल करने में
ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़ा। कांशीराम के निधन के बाद मायावती दलितों की एकछत्र नेता के रूप में
स्थापित हो गयी।
आजादी के बाद दलितों को चुनावी हथियार समझा गया। कांग्रेस पार्टी का इस वर्ग के वोटों पर एकाधिकार
स्थापित हो गया। जगजीवन राम 1977 तक दलितों के एकछत्र नेता के रूप में स्थापित हुए। दरअसल 1977
के बाद दलित सियासत में एक नए युग की शुरुआत हुई। दलित वोट कांग्रेस से छिटक कर दूसरे दलों की
तरफ जाने लगे। इंदिरा गाँधी ने एक बार फिर दलितों का विश्वास जीता। राजीव गाँधी को भी दलितों का
हितचिंतक समझा गया। जनता पार्टी के विघटन के बाद दलित भी बिखर गए। महाराष्ट्र के कुछ नेताओं ने
दलित सियासत की कमान सँभालने का प्रयास किया मगर सफल नहीं हुए। जगजीवन राम के बाद
कांशीराम दलितों के बड़े नेता के रूप में उभरे और कुछ हद तक यूपी के दलितों के एक बड़े तबके ने उन्हें
अपने रहनुमा के रूप में स्वीकारा। शुरू में उन्होंने सवर्णों के विरुद्ध आग उगली मगर जल्दी ही उन्हें समझ
में आ गया की ऊँची जातियों से गठजोड़ किये बिना दलितों का भला नहीं होगा। मुलायम सिंह से गठजोड़
कर कांशीराम ने दलित सियासत को धार दी जिसके फलस्वरूप यूपी की राजनीति में उन्हें पैर जमाने में
सफलता मिली। बाद के दिनों में मायावती को साथ लेकर कांशीराम ने स्वर्ण जातियों से गठजोड़ कर दलित
सियासत को शिखर पर पहुँचाया।
इसी बीच भारतीय जनता पार्टी ने शेष भारत में दलित वोटों को अपनी झोली में डाल कर दलित वोटों पर
अपनी पकड़ मजबूत की। मायावती से यूपी का ताज छीनने के बाद भाजपा ने दलितों में अपना आधार
बढ़ाया। दलित वोटों का कांग्रेस से मोह भंग होने से यह पार्टी सत्ताविहीन हो गयी। मायावती का जनाधार
खिसकने से दलितों के पास शक्तिशाली नेतृत्व नहीं रहा। दलित नेतृत्व भाजपा ने हथिया लिया।

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