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फर्क नज़र आएगा

फर्क नज़र आएगा

ऊपर‌ से खुश‌ हूं,
मन‌‌ से तंग नहीं हूं,
पर‌ रंगीन रंग भी नहीं हूं,
दिल‌ में कहीं ‌टीस है,
कि मैं बच्चों को ही
समर्पित क्यों नहीं हूं ?

उठाना चाहता हूं चोक,
बच्चों को पढ़ाना चाहता हूं,
इसी बीच‌ मतदाता आ जाता,
उसके काम में लग जाता हूं,
मैं बच्चों को‌ पढ़ा‌ नहीं पाता हूं !

बीत रहा‌ है पूरा साल,
हाल‌ बेहाल‌ रहा इस बार,
कभी आनलाइन प्रशिक्षण,
कभी‌ एप की शरण,
मूल काम के चरण तक
पहुंच नहीं ‌पाता हूं !

चटखारेदार पोषाहार खिलाता हूं,
अब रोज़ दूध पिलाता हूं,
यूनिफॉर्म बांटकर बच्चों को,
खुद भी खुश हो लेता हूं,
ब्लैक बोर्ड करता रहता इंतज़ार,
मैं जनाधार - आधार में
फंस जाता हूं।

ब्रिज कोर्स भी पढाओ,
मूल‌ कोर्स भी पढाओ,
सोचा चलो पढ़ाते हैं,
तभी ओफलाइन प्रशिक्षण
के आदेश आ गए,
मेरे सपने फिर‌ काफूर हो गए,
मैं बस यूं ही उलझ जाता हूं,
मूल काम की सीढ़ी चढ़
नहीं पाता हूं।

मेरे प्यारे ‌देश को,
जिसे मैं दिलोजान से चाहता हूं,
वो बार‌ - बार‌ मुझसे कहता है,
ये गरीबों के बच्चे हैं,
सब तो फिर भी‌ नहीं ‌पढ़ पाएंगे,
ब्लैक बोर्ड तक नहीं ‌जाओगे,
तो कोरे ही रह‌ जाएंगे,
मत डरो कि पढ़ लिखकर ये,
नौकरी के लिए लाइन‌ लगाएंगे !
पढ़ा दोगे पर्याप्त इन्हें तो
ये देश के‌ काम ही‌ आएंगे,
मैं फिर मूल निवासी,जाति
जन्म प्रमाण पत्र बनवाने में
लग‌ जाता हूं।

कैसे‌ उठाऊं‌ चोक
बुनियाद‌ देश की मज़बूत
कैसे बनाऊं?
हमें हमारा काम दे दो
करने दो‌ हमें राष्ट्र‌ का निर्माण,
फिर देखना
दुनिया की समस्याओं का
समाधान नज़र आएगा,
रहा था‌ मेरा देश कभी विश्वगुरु,
वो फिर‌ से बन जाएगा !
तब जाकर‌ दुनिया को
चाणक्य, चन्द्रगुप्त और सिकंदर में फर्क नज़र आएगा!!
फर्क नज़र आएगा!!

 

स्वरचित कविता - हारून रशीद पठान (बीसीए, एमसीए, एमबीए) अध्यापक, राज.उच्च माध्य. विद्यालय,डाबी जिला - बूंदी ( राज . ) मो. नं. 966 7450 922

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