महिलाएं ही समाज की असली आर्किटेक्ट
यह बहुत ही दुखद और विडंबनापूर्ण है कि मणिपुर में पिछले लगभग तीन महीनों से या यूं कहें कि पिछले 83 दिनों से रह-रहकर हिंसा की घटनाएं जारी है। इसी बीच, कुछ ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जिसने पूरे देश को शर्मसार कर दिया है। हाल फिलहाल जो विडियो सामने आए हैं, उससे संपूर्ण देश की गरिमा को गहरा आघात लगा है। सच तो यह है कि इन विडियो ने संपूर्ण देश को दहला कर रख दिया है। इस वीडियो में कुकी समुदाय की दो महिलाओं को नग्न करके सड़क पर घुमाते हुए दिखाया जा रहा है और ये वीडियो आज भारत ही नहीं अपितु पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन चुका है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी गहरी निंदा की है और आक्रोश व्यक्त किया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह बात कही है कि, 'मेरा हृदय पीड़ा से भरा है, क्रोध से भरा है। मणिपुर की जो घटना सामने आई है, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मसार करने वाली घटना है। पाप करने वाले, गुनाह करने वाले, कितने हैं-कौन हैं, यह अपनी जगह है, लेकिन बेइज्जती पूरे देश की हो रही है। 140 करोड़ देशवासियों को शर्मसार होना पड़ रहा है। सभी मुख्यमंत्रियों से आग्रह करता हूं कि वे माताओं-बहनों की रक्षा करने के लिए कठोर से कठोर कदम उठाएं। अपने राज्यों में कानून व्यवस्था को और मजबूत करें। घटना चाहे राजस्थान की हो, छत्तीसगढ़ की हो या मणिपुर की हो, हम राजनीतिक विवाद से ऊपर उठकर कानून व्यवस्था और नारी के सम्मान का ध्यान रखें। किसी भी गुनहगार को बख्शा नहीं जाएगा। मणिपुर की इन बेटियों के साथ जो हुआ है, उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि दोषियों को किसी भी हालत में बख्शा नहीं जाएगा। यहां तक कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने केंद्र और राज्य सरकार को सख्त कार्रवाई किए जाने के निर्देश दिए हैं। चीफ जस्टिस ने तो यहां तक कहा है कि या तो सरकार मणिपुर मामले पर तुरंत कार्रवाई करे, नहीं तो हम खुद इस मामले में हस्तक्षेप करेंगे। मामले पर संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत ने यहां तक कहा है कि सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से अदालत को अवगत कराया जाना चाहिए ताकि अपराधियों पर हिंसा का मामला दर्ज किया जा सके। यह बहुत ही संवेदनशील, दुखद व महत्वपूर्ण है कि आज देश में महिलाओं पर ऐसे अत्याचार किए जा रहे हैं। मीडिया के हवाले से जो कुछ भी सामने आ रहा है वह दर्शाता है कि आज महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं और उन पर हिंसा, अत्याचार ढ़ाया जा रहा है। वास्तव में, महिलाओं को हिंसा के साधन के रूप में इस्तेमाल करना संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ है। भारत वह देश है जहां युगों युगों से महिलाओं को हमेशा सम्मान दिया जाता रहा है, महिलाओं को शक्ति स्वरूपा कहा गया है। यह वह देश है जहां नवरात्रि में कुंजिका पूजन का प्रावधान,रीति रिवाज व परंपरा रही है। लेकिन आज महिलाओं को हिंसा के साधन के रूप में इस्तेमाल करके मानव जीवन का उल्लघंन करना यही दर्शाता है कि आज भले ही हम बात बात में महिलाओं को सम्मान देने का ढ़िढ़ोरा पीटते हों लेकिन आज महिलाओं की सुरक्षा कहीं न कहीं घेरे में ही नजर आती है। हमें आज यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि समाज को बदलने का सबसे तेज़ तरीका दुनिया की महिलाओं को एकजुट करना है। नेल्सन मंडेला ने एक बार यह बात कही थी कि 'जब तक महिलाओं को सभी प्रकार के उत्पीड़न से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती।' बहरहाल, हमें यह बात हमेशा ध्यान में रखने की जरूरत है कि एक महिला ही हमें इस दुनिया में लाई है, अत: हमें उसका अपमान करने का कोई हक़ नहीं है। जहां नारी का आदर सम्मान होता है, वहां पर ईश्वर का वास होता है। जिस परिवार, समाज और देश में नारी का सम्मान होता है, वही सभ्य है।जिस समाज में नारी का सम्मान नहीं होता, उस समाज का पतन होना निश्चित है। महिलाएं ही किसी समाज की असली आर्किटेक्ट होतीं हैं। ब्रिजम यंग ने महिलाओं को लेकर क्या शानदार बात कही है। उन्होंने कहा है कि जब आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं तब आप एक आदमी को ही शिक्षित करते हैं लेकिन जब आप एक महिला को शिक्षित करते हैं तब आप एक पीढ़ी को शिक्षित करते हैं, लेकिन यह बहुत ही विडंबना की बात है कि आज हम महिलाओं के अधिकारों, उनके सम्मान की बात तो करते हैं लेकिन धरातलीय स्थिति कुछ और ही नजर आती है। आज महिलाओं के खिलाफ समाज में निरंतर अपराध बढ़ रहे हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि एक महिला पुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है जितना अँधेरे से प्रकाश। बहरहाल,देश में महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते अपराध आज घोर चिंता का विषय हैं। एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021 में महिलाओं के खिलाफ अपराध में 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि बलात्कार के मामले 12 प्रतिशत तक बढ़ गये हैं। बीते 10 वर्षों में महिलाओं के विरुद्ध अपराध में 75 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। यह चिंताजनक है कि भारतीय समाज में महिलाएँ एक लंबे समय से अवमानना, यातना और शोषण का शिकार रही हैं। मणिपुर में जो हुआ है,वह हम सभी को शर्मसार करता है। महिलाओं के प्रति अपराधों, हिंसा, अत्याचार अब हर हाल में रूकना चाहिए। बहरहाल,मणिपुर तो मणिपुर हाल ही में हावड़ा के पांचला इलाके में पंचायत चुनाव के मतदान के दिन ग्राम पंचायत की महिला प्रत्याशी ने एक पार्टी विशेष के कार्यकर्ताओं पर शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। प्रत्याशी का आरोप है कि पार्टी विशेष के कार्यकर्ताओं ने उसे निर्वस्त्र कर पूरे गांव में घुमाया। महिला ने अपनी शिकायत में कहा है कि उसे लगभग 40-50 उपद्रवियों द्वारा मारा पीटा गया। हालांकि सच क्या है,यह तो घटना की जांच के बाद ही पता चल पाएगा लेकिन यदि वास्तव में ऐसा हुआ है तो यह बहुत ही शर्मनाक और निंदनीय ही कहा जा सकता है। अब बात करते हैं मणिपुर के बारे में, तो यहां पाठकों को यह जानकारी देना चाहूंगा कि मणिपुर में पिछले चार मई को कुकी समुदाय की दो महिलाओं का आपत्तिजनक वीडियो आज वायरल होने के साथ ही मणिपुर में फिर से तनाव बढ़ गया है। सड़क से लेकर संसद तक मणिपुर हिंसा की गूंज सुनाई दे रही है। मीडिया में हर जगह आजकल मणिपुर की ही खबरें दिखाई सुनाई पड़ रही हैं। हिंसा किसी भी समस्या का कभी भी कोई समाधान नहीं होती लेकिन विडंबना ही है कि पिछले 3 मई से ही मणिपुर जातीय हिंसा की चपेट में है, जिसमें अब तक 160 लोगों की जानें जा चुकी हैं। आखिर जिनकी जान गई है उनका दोष क्या था ? मणिपुर में कानून व्यवस्था आखिर कहां हैं ? वास्तव में यहां यह जानने की जरूरत है कि आखिर मणिपुर में हिंसा भड़कने के पीछे कारण क्या हैं? तो इस संबंध में जानकारी देना चाहूंगा कि मणिपुर की राजधानी इंफाल में प्रदेश की लगभग 57 प्रतिशत आबादी निवास करती है जो कि पूरे प्रदेश का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा है। शेष 90 प्रतिशत हिस्से में प्रदेश की 43 प्रतिशत आबादी निवास करती है और ये पहाड़ी इलाका है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इन पहाड़ी इलाकों में 33 मान्यता प्राप्त जनजातियां निवास करती हैं। इनमें नगा और कुकी जनजातियां प्रमुख हैं और ये दोनों ही जनजातियां मुख्य रूप से ईसाई धर्म को मानने वाली हैं। वास्तव में,इम्फाल घाटी वाले इलाके में मैतेई समुदाय की आबादी ज्यादा है और ये ज्यादातर हिंदू हैं। मणिपुर की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब 53% है। आंकड़ें देखें तो सूबे के कुल 60 विधायकों में से 40 विधायक मैतेई समुदाय से हैं।इसके अलावा मणिपुर में आठ-आठ प्रतिशत आबादी मुस्लिम और सनमही समुदाय की भी है। उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 371C के तहत मणिपुर की पहाड़ी जनजातियों को विशेष दर्जा और सुविधाएं मिली हुई हैं, जो मैतेई समुदाय को नहीं मिलती हैं। 'लैंड रिफॉर्म एक्ट' के कारण मैतेई समुदाय पहाड़ी इलाकों में जमीन खरीदकर नहीं बस सकता है, जबकि जनजातियों पर पहाड़ी इलाके से घाटी में आकर बसने पर कोई रोक नहीं है। इससे भी दोनों समुदायों में मतभेद बढ़े हैं। देखा जाए तो मणिपुर में हिंसा के पीछे तीन प्रमुख वजहें हैं जिनमें क्रमशः मोती समुदाय के एसटी दर्जे का विरोध, सरकार की अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई और कुकी विद्रोह संगठनों द्वारा सरकार से हुए समझौते को तोड़ना है। मणिपुर भारत का एक छोटा सा राज्य है और इससे बड़ी विडंबना भला और क्या हो सकती है कि वहां भाई-भाई के बीच नफरत की आग लगी हुई है और वह एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। नस्लीय हिंसा हो या किसी भी प्रकार की हिंसा हो, हिंसा को कभी भी ठीक नहीं ठहराया जा सकता है। हिंसा के कारण हजारों लोग घर बेघर हुए हैं और बहुत से लोगों का आशियाना तक उजड़ गया है। किसी ने अपना पति खोया है तो किसी का बेटा लौटकर नहीं आया है । अनेकानेक घर खंडहर हो गए हैं। संगीनों के साए में, डर और खौफ में पल पल जिंदगी गुजर रही है। मगर हालात हैं कि सुधर ही नहीं रहे हैं। वास्तव में,कुकी समुदाय पहाड़ पर मैतेई का दखल नहीं चाहता है और यही विवाद की जड़ है, क्योंकि पहाड़ी इलाको में रहने वालों को लगता है कि अगर मैतई को एसटी का दर्जा मिलता है, तो वो ऊपरी इलाकों में आएंगे और उनके अधिकार ले लेंगे। बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए कुछ कर नहीं रही है। मणिपुर के संबंध में भी बहुत से एक्शन लिए हैं। यहां तक कि सरकार ने हालात काबू करने के लिए सेना और असम राइफल्स को डिप्लॉय किया है। कुछ समय पहले चालीस आईपीएस अधिकारियों के नेतृत्व में 20 मेडिकल टीमें भेजी गईं थी, और भारतीय वायु सेना को भी सर्विस में लगाया गया था।जहां हिंसा हुई वहां कर्फ्यू भी लगाया गया। सोशल मीडिया पर फर्जी और गलत जानकारी पोस्ट ना हो, हिंसा ना भड़के, इसलिए इंटरनेट पर बैन लगाया गया।आगजनी, लूटपाट, हिंसा करनेवालों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए। खुद गृहमंत्री अमित शाह ने मणिपुर का दौरा भी किया और हिंसा में शामिल लोगों से हथियार डालने की अपील भी की। लेकिन सरकार अकेले कुछ भी नहीं कर सकती है,इसके लिए सभी पक्षों को एक साथ मिलकर आगे आने की जरूरत है और समस्याओं को बातचीत के जरिए धैर्य और संयम से हल करने की जरूरत है। हिंसा से कोई समस्या कभी भी नहीं सुलझाई जा सकती है, अपितु इससे तो स्थिति बिगड़ती ही है।आज देश के पूर्वी राज्य मणिपुर में शांति की बहाली बहुत जरूरी है। मणिपुर मामला संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा एवं राज्यसभा में उठाया गया। विपक्षी सदस्यों ने मणिपुर के मामले पर केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास किया। हंगामे के कारण संसद के दोनों सदनों लोकसभा एवं राज्यसभा में कोई भी काम नहीं हो पाया। कांग्रेस अध्यक्ष ने भी मणिपुर के मुद्दे पर लोकसभा में चर्चा कराने की मांग की। मानसून सत्र में विपक्षी नेता ने भी प्रधानमंत्री से ऐसी ही मांग की है। विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रधानमंत्री मणिपुर के मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं जो देश हित में नहीं है। वास्तव में यह समय राजनीतिक दलों द्वारा आरोप प्रत्यारोप का समय नहीं है, अपितु समस्या का हल करने में सभी को आपस में मिलकर काम करने की जरूरत है।कुल मिलाकर यह बात कही जा सकती है कि हाल फिलहाल मणिपुर की स्थिति लगातार जटिल होती जा रही है। मणिपुर भारत का एक सीमावर्ती राज्य है और सीमावर्ती राज्य होने के कारण इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। मीडिया के हवाले से पता चलता है कि मणिपुर की अस्थिरता का फायदा का उठाकर आतंकी संगठन मणिपुर में फिर से सक्रिय हो गए हैं। इन संगठनों को विदेशों से भी सहयोग व समर्थन मिल रहा है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार एवं देश की विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों को विशेष सतर्क व मुस्तैद रहने की आवश्यकता है। उम्मीद की जा सकती है कि संसद के वर्तमान सत्र के दौरान मणिपुर की समस्या के समाधान के लिए पक्ष और विपक्ष के बीच कोई ठोस सहमति बन सकती है।
-सुनील कुमार महला