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ब्रेंट क्रूड 97 डॉलर के पार, भारत पर बढ़ा तेल का दबाव

ब्रेंट क्रूड 97 डॉलर के पार, भारत पर बढ़ा तेल का दबाव

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। कच्चे तेल के दामों में तेजी का रुख बना हुआ है और ब्रेंट क्रूड ने 97 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर लिया है। वहीं, अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) भी 92 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया है।

भारतीय समय के अनुसार सुबह 9:45 बजे ब्रेंट क्रूड 1.14 प्रतिशत की मजबूती के साथ 97.38 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था। इससे पहले इसने 96.90 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार की शुरुआत की थी। शुरुआती गिरावट के दौरान भाव 96.34 डॉलर तक आया, लेकिन इसके बाद खरीदारी बढ़ने से कीमत में तेजी लौट आई और यह 97.43 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

डब्ल्यूटीआई क्रूड में भी इसी तरह मजबूती देखने को मिली। इसने 0.71 डॉलर की बढ़त के साथ 92.19 डॉलर प्रति बैरल से दिन का कारोबार शुरू किया। शुरुआती दौर में भाव 91.70 डॉलर तक फिसला, लेकिन बाद में इसमें तेजी आई और कीमत 92.57 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। सुबह 9:45 बजे डब्ल्यूटीआई 1.11 प्रतिशत की बढ़त के साथ 92.50 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।

कच्चे तेल की इस तेजी को भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए आर्थिक मोर्चे पर चिंता बढ़ाने वाला माना जा रहा है। टीएनवी फाइनेंशियल सर्विसेज के सीईओ तारकेश्वर नाथ वैष्णव के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 80 डॉलर प्रति बैरल या उससे अधिक बनी रहती हैं, तो इसका असर देश के करंट अकाउंट डेफिसिट पर पड़ सकता है। इसके साथ ही सरकार के फिस्कल डेफिसिट लक्ष्य के सामने भी चुनौती खड़ी हो सकती है।

महंगे कच्चे तेल का असर केवल आयात बिल तक सीमित नहीं रहता। इससे भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और घरेलू स्तर पर महंगाई भी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा विदेशी निवेशकों की ओर से पूंजी निकासी बढ़ने की स्थिति में बाजार पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर तेल की कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है तो सरकार के सामने सब्सिडी, ब्याज दर और रुपये-डॉलर विनिमय दर जैसे मुद्दों पर संतुलन बनाने की चुनौती बढ़ सकती है। ऐसे माहौल में शेयर बाजार में भी अनिश्चितता बढ़ने की आशंका रहती है। यानी पश्चिम एशिया का तनाव केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहकर भारत की व्यापक आर्थिक तस्वीर को भी प्रभावित कर सकता है।

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