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यूपी में जातीय सियासत और सत्ता की बेचैनी

यूपी में जातीय सियासत और सत्ता की बेचैनी

देश के सबसे बड़े और अधिसंख्य प्रधान मंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीति एकबार फिर करवट ले रही है। हालाँकि यहां विधानसभा चुनाव में अभी एक साल से भी अधिक बचे है मगर चुनावी सरगर्मियां अभी से शुरू हो गई है। छोटे बड़े सभी सियासी दलों ने अपने अपने चुनावी हथियार संभाल किये है और वार प्रतिवार शुरू कर दिए है। इनमें सबसे बड़े चुनावी हथियार जातीय वोटों की गोलबंदी के है। यहां सबसे पहले राजपूत समाज के पार्टी विधायकों की बैठक हुई थी। इसके बाद कुर्मी समाज के विधायक मिले और अब हाल में ब्राह्मण विधायकों की बैठक हुई जो भोज पर इकट्ठा हुए। इससे यूपी की राजनीति में ब्राह्मणों की उपस्थिति और उनकी भूमिका को लेकर एक नया विमर्श पैदा हो गया। पिछले विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी के 46 ब्राह्मण प्रत्याशी जीतकर सदन में पहुंचे हैं। जबकि समाजवादी पार्टी के सिर्फ 5 और कांग्रेस का सिर्फ एक ब्राह्मण प्रत्याशी ही जीत पाया। हाल ही में भाजपा के ब्राह्मण विधायकों की बैठक को लेकर प्रदेश का राजनीतिक माहौल गरमा गया। प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए अब लगभग साल-सवा साल का वक्त ही बाकी रह गया है। यानी कह सकते हैं कि यूपी का चुनावी साल शुरू हो चुका है। बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की यह गोलबंदी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि यूपी में सत्ता के शीर्ष पर ठाकुरवादी राजनीति के आरोप लगते रहे हैं।
यूपी इस समय जातीय संघर्ष के महाभारत में डूबकी लगा रहा है। सभी राजनैतिक पार्टियों ने सिद्धांतों और विचारों के इतर जात- पांत को जीत के मूल मंत्र रूप में स्वीकार कर लिया है और तदनुरूप अपनी गतिविधियां बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की गतिविधियां अपने परवान पर है। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीतियां बनाना शुरू कर दिया है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जातियों की सियासत जोर शोर से शुरू हो गयी है। जातियों की बहती गंगा में हाथ धोने के लिए सभी सियासी दलों में होड़ सी मच गयी है। इस जातीय महासंग्राम में एक दूसरे को पछाड़ने के लिए राजनीतिक पार्टियों ने अपनी कमर कसनी शुरू करदी है। चुनावी हथियार निकाल लिए है और प्रहार शुरू कर दिए है। उत्तर प्रदेश की सियासत जातियों के ईर्दगिर्द ही घूमती रही है। यूपी चुनाव में जातीय समीकरण शुरु से ही अहम भूमिका निभाता आया है, ऐसे में सभी पार्टियां अपनी चुनावी रणनीति जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही बनाती हैं। राजनीति में जातीय समीकरण का बड़ा खेल हमेशा से माना जाता रहा है। यूपी में ओबीसी और दलितों के बाद सबसे ज्यादा 23 प्रतिशत आबादी सवर्णों की है। सवर्ण यानी ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार, कुछ बनिया, आदि। इनमें भी सबसे ज्यादा ब्राह्मण (11-13 फीसदी), फिर राजपूत (7-8 फीसदी), कायस्थ (करीब 2.25 फीसदी) और अन्य अगड़ी जातियां (करीब 2.75 फीसदी) हैं।
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी दल ब्राह्मण वोटरों पर दांव लगाने में जुटे हैं। यूपी में एक बार फिर ब्राह्मणों की पूछ शुरू हो गयी है। इस बार ब्राह्मण मतों पर सबकी निगाहें टिकी है। ब्राह्मण वोटों के लिए सियासी संग्राम छिड़ गया है। चुनाव से पहले सभी दलों ने ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने के लिए संग्राम छेड़ दिया है। कहा जा रहा है भगवान राम के मुद्दे पर यूपी के ब्राह्मणों का बड़ा वर्ग भाजपा के साथ है जिनकी काट के लिए बसपा और सपा ने ब्राह्मण राजनीति शुरू कर दी है। सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस ने ब्राह्मणों का गुणगान करना शुरू कर दिया है। उत्तरप्रदेश की सियासत में इन दिनों हर तरफ ब्राह्मण वोटों की चर्चा रही है। नेता और पार्टियां उठते बैठते ब्राह्मणों की माला जपने लगे है।
उत्तर प्रदेश की सियासत में लंबे समय तक सत्ता की कमान ब्राह्मणों के हाथों में रही है। नारायण दत्त तिवारी के बाद यूपी में कोई भी ब्राह्मण समुदाय से मुख्यमंत्री नहीं बन सका। 1989 यूपी में छह ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने। इनमें गोविंद वल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी बने शामिल थे। इनमें नारायण दत्त तिवारी तीन बार यूपी के सीएम रहे।


-बाल मुकुन्द ओझा

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