वैश्विक झटकों के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, IMF ने बढ़ाया ग्रोथ अनुमान
नई दिल्ली: वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता और ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी मजबूती बनाए रखी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत की आर्थिक नीतियों, वित्तीय अनुशासन और सुधारों की सराहना करते हुए कहा कि देश बाहरी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम रहा है। संस्था के मुताबिक, भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाए हुए है।
बैंकॉक में आयोजित प्रेस ब्रीफिंग के दौरान IMF के एशिया और प्रशांत विभाग के निदेशक कृष्णा श्रीनिवासन ने कहा कि हालिया ऊर्जा संकट के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत थी। बेहतर विकास दर और वित्तीय अनुशासन ने देश को बाहरी झटकों का सामना करने में मदद की।
IMF ने क्यों बढ़ाया भारत का विकास अनुमान?
भारत की अप्रैल-जून तिमाही में उम्मीद से बेहतर आर्थिक वृद्धि के बाद IMF ने अपने विकास दर अनुमान में संशोधन किया है। संस्था के ताजा विश्व आर्थिक परिदृश्य (World Economic Outlook) के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था चालू वर्ष और अगले वर्ष दोनों में 7 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। मध्यम अवधि में विकास दर लगभग 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
वहीं, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से जून की तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इस प्रदर्शन ने भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं।
घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र से मिल रहा सहारा
IMF की रिपोर्ट में भारत की आर्थिक मजबूती के पीछे कई प्रमुख कारण बताए गए हैं। इनमें घरेलू बाजार में मांग, सेवा क्षेत्र की सक्रियता, अनुकूल जनसांख्यिकीय स्थिति और लगातार हो रहे संरचनात्मक सुधार शामिल हैं।
भारत का बड़ा घरेलू बाजार आर्थिक गतिविधियों को सहारा देता है। वहीं, सेवा क्षेत्र में जारी गतिविधियां भी विकास की गति बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। IMF के मुताबिक, इन कारकों ने भारत को वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने में मदद की है।
रुपये में गिरावट को कमजोरी का पैमाना नहीं मानता IMF
भारतीय रुपये पर हाल में बने दबाव को लेकर भी IMF ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कृष्णा श्रीनिवासन ने कहा कि किसी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन केवल उसकी मुद्रा की चाल के आधार पर नहीं किया जा सकता।
उन्होंने बताया कि विनिमय दर पर वैश्विक ब्याज दरों, निवेशकों की धारणा और कच्चे तेल की कीमतों जैसे कई कारकों का असर पड़ता है। भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में बदलाव का प्रभाव उसकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।
इसके बावजूद, IMF के अनुसार, रुपये की चाल को अकेले आर्थिक कमजोरी का संकेत मानना सही नहीं होगा। अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति समझने के लिए विकास दर और दूसरे आर्थिक संकेतकों को भी देखना जरूरी है।
GDP की नई गणना पद्धति को मिला समर्थन
IMF ने भारत की जीडीपी गणना पद्धति में किए गए बदलावों का भी समर्थन किया है। श्रीनिवासन के अनुसार, इन बदलावों को अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं और IMF की पूर्व सिफारिशों के अनुरूप तैयार किया गया है।
उन्होंने सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की ओर से राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी को बेहतर बनाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। आर्थिक आंकड़ों की गुणवत्ता और गणना पद्धति में सुधार से देश की आर्थिक गतिविधियों का आकलन अधिक प्रभावी ढंग से करने में मदद मिल सकती है।
एशिया में भारत का प्रदर्शन बना सकारात्मक संकेत
क्षेत्रीय आर्थिक हालात पर चर्चा करते हुए IMF अधिकारी ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण एशिया की कई अर्थव्यवस्थाओं की विकास संभावनाओं पर दबाव पड़ा है। इसके बावजूद भारत ने अपेक्षाओं से बेहतर प्रदर्शन किया है।
कुल मिलाकर, IMF की टिप्पणियां भारत की आर्थिक वृद्धि, घरेलू मांग और सुधार प्रक्रिया को लेकर सकारात्मक आकलन पेश करती हैं। हालांकि, वैश्विक ऊर्जा कीमतों, वित्तीय बाजारों और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों में होने वाले बदलाव आगे भी भारत की विकास दर को प्रभावित कर सकते हैं।