तेजी से घटा है भारत में बुजुर्गों का मान सम्मान
देश और दुनिया में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक
दुनियाभर में आगामी 2030 तक प्रत्येक 6 में से एक व्यक्ति की आयु 60 वर्ष से ज्यादा होंगी।
हमारे देश की बात करें तो भारत की बुजुर्ग आबादी अगले दशक में 41 प्रतिशत तक बढ़ जाने
का अनुमान है, यानी 2031 तक इस देश में 194 मिलियन वरिष्ठ नागरिक हो जाएंगे। यह
जानकारी एक सरकारी रिपोर्ट में दी गई है। दुनिया के कुछ देश बुजुर्गों को एक ही छत के नीचे
स्वास्थ्य सहित सभी प्रकार की मूलभूत सुविधाएं सुलभ करा रहे है। मगर हमारे देश में बुजुर्गों
को पेंशन की सुविधा जरूर दी जा रही है मगर अन्य आवश्यक सुविधाओं की दृष्टि से हम बहुत
पीछे है।
भारत में कभी बुजुर्गों की पूजा की जाती थी। बुजुर्ग घर की आन बान और शान थे। बिना बुजुर्ग को पूछे
कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता था। आज वही बुजुर्ग अपने असहाय होने की पीड़ा से गुजर रहा है।
दुर्भाग्य से उसे यह मर्मान्तक पीड़ा देने वाले कोई और नहीं अपितु उनके परिजन ही है। बुजुर्गो का सम्मान
करने और सेवा करने की हमारे समाज की समृद्ध परंपरा रही है। समाचार पत्रों में इन दिनों बुजुर्गों के
सम्बन्ध में प्रकाशित होने वाले समाचार निश्चय ही दिल दहला देने वाले हैं। राम राज्य का सपना देखने
वाला हमारा देश आज किस दिशा में जा रहा है, यह बेहत चिंतनीय है। भारत में बुजुर्गों का मान-सम्मान
तेजी से घटा है। यह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का अवमूल्यन है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत
है। बुजुर्गों की वास्तविक समस्याएं क्या है और उनका निराकरण कैसे किया जाये इस पर गहनता से मंथन
की जरूरत है। आज घर घर में बुजुर्ग है। ये इज्जत से जीना चाहते है। मगर यह कैसे संभव है यह विचारने
की जरूरत है।
संयुक्त राष्ट्र की इंडिया एजिंग 2023 रिपोर्ट के मुताबिक देश और दुनिया की आबादी बूढ़ी हो
रही है। वैश्विक स्तर पर बात करें तो 2022 में 7.9 अरब की आबादी में से करीब 1.1 अरब
लोगों की उम्र 60 साल से अधिक होगी। यह जनसंख्या का लगभग 13.9 प्रतिशत है। 2050
तक वैश्विक आबादी में बुजुर्गों की संख्या बढ़कर लगभग 2.2 बिलियन हो जाएगी। भारत की
बात करें तो देश में बुजुर्गों की आबादी बढ़ने का सिलसिला 2010 से शुरू हुआ है। वर्तमान
चलन के अनुसार, 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या लगभग 15 वर्षों में दोगुनी
हो रही है। मगर आबादी की वृद्धि के बावजूद बुजुर्गों को जीविनोपयोगी पूरी सुविधाएं आज भी
नहीं मिल रही है। वृद्धावस्था जीवन का वह सच है जिसे आज नहीं तो कल सब को स्वीकारना
होगा। एक दिन बुढापा आपको भी आएगा जिसके आगोश में हर किसी को आना है। जो लोग
आज इस सच्चाई को स्वीकार नहीं रहे है उन्हें बुढ़ापा अपनी रंगत जरूर दिखायेगा। बुजुर्गजन
वटवृक्ष के समान हैं। इनकी छाया में रहने वाले लोग धूप, बरसात, आंधी और असामान्य
विपत्तियों से बचे रहते हैं। हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक परम्पराओं का इतिहास गौरवशाली
रहा है। हमारे संस्कार में माता-पिता, गुरु, बुजुर्ग को देवताओं की श्रेणी दी गई है। तभी तो
हमारी सामाजिक परंपरा में मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव का
ज्ञान परिवार की पाठशाला में ही सिखाया जाता है। जिदगी के हर बड़े फैसले या हर खुशखबरी
के वक्त बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद लेने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। बुजुर्गों का सम्मान
करना हमारी समृद्ध परंपरा है। वृद्धजनों से हमें सदैव मार्गदर्शन मिलता है। जिस समाज में
बुजुर्गो का सम्मान न हो, उन्हें परायों से नहीं, अपनों से ही प्रताड़ना मिले, उस समाज को
धिक्कार है। अब स्थिति यह हो गई है कि लाचार और बुजुर्ग ही क्यों, अच्छे-खासे, चलते-फिरते
माता-पिता को भी बच्चे अपने साथ रखना नहीं चाहते। सामाजिक मूल्यों के अवमूल्यन के कारण
बुजुर्गों का मान-सम्मान घटा है। आज भी ऐसे अनेक बुजुर्ग मिल जायेंगे जो अपनी संतान और परिवार की
उपेक्षा व प्रताड़ना के शिकार हैं। बुजुर्गों की देखभाल और उनके सम्मान की बहाली के लिए समाज में चेतना
जगाने की जरूरत है। सद्व्यवहार से हम इनका दिल जीत सकते हैं।
- बाल मुकुन्द ओझा