भविष्य गढ़ने वाला असली शिल्पकार है शिक्षक
-सुनील कुमार महला
शिक्षक को पीढ़ियों का निर्माता और समाज का मार्गदर्शक माना जाता है और वह है भी।सच तो यह है कि शिक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक हैं और किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था से ही तय होता है।हम सभी यह जानते हैं कि शिक्षा व्यक्ति को केवल पढ़ना-लिखना नहीं सिखाती, बल्कि यह शिक्षा ही होती है जो हमें सोचने, समझने, निर्णय लेने और सही-गलत में अंतर करने की क्षमता देती है। वास्तव में,सच तो यह है कि एक शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होता है तथा समाज और राष्ट्र के विकास में प्रभावी भूमिका निभाता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि शिक्षा से आत्मविश्वास, सम्मान, रोजगार और आत्मनिर्भरता का मार्ग खुलता है और एक शिक्षित व्यक्ति अपने परिवार की दिशा बदल सकता है और एक शिक्षित समाज पूरे राष्ट्र का भविष्य बदल सकता है। शायद इसीलिए यह बात कही जाती है कि धन छिन सकता है, संपत्ति नष्ट हो सकती है, लेकिन शिक्षा वह संपदा है जिसे कोई भी छीन नहीं सकता।
शिक्षकों के योगदान,उनके शिक्षा को समर्पण और शिक्षा में उनकी भूमिका को सम्मान देने के लिए हर वर्ष 5 अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस मनाया जाता है। शिक्षक छात्रों को केवल और केवल ज्ञान ही प्रदान नहीं करते, बल्कि वे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व, चरित्र और भविष्य के निर्माण तथा राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दरअसल, 5 अक्टूबर 1966 को पेरिस में यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक विशेष सम्मेलन में शिक्षको के अधिकारों, जिम्मेदारियों, प्रशिक्षण और रोजगार की स्थितियों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सिफारिश को अपनाया गया था। ऐसे में यहां यह स्पष्ट है कि इस दिवस का आयोजन यूनेस्को, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन , यूनिसेफ और एजुकेशन इंटरनेशनल मिलकर करते हैं। यहां यह भी गौरतलब है कि हमारे देश भारत में राष्ट्रीय शिक्षक दिवस 5 सितंबर को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर मनाया जाता है। यहां यह गौरतलब है कि विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर 1994 से मनाया जा रहा है।
विश्व शिक्षक दिवस मनाने के पीछे के मुख्य उद्देश्यों की यदि हम यहां पर बात करें तो इनमें क्रमशः शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा करना मसलन -शिक्षकों के काम करने के वातावरण, वेतन, स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देना मसलन-समाज को बेहतर बनाने के लिए कुशल और प्रेरित शिक्षकों की आवश्यकता पर बल देना,शिक्षा नीतियों में भागीदारी मसलन सरकार और नीति निर्माताओं को शिक्षा संबंधी निर्णयों में शिक्षकों के अनुभव का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ ही साथ वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा मसलन कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी कि तकनीक और जलवायु परिवर्तन जैसे नए दौर में शिक्षकों की भूमिका को मजबूत करना आदि हैं।
हर वर्ष इस दिवस की एक थीम निर्धारित की जाती है और यहां पाठकों को बताता चलूं कि पिछले साल यानी कि वर्ष 2025 में इस दिवस की थीम-'शिक्षण को सहयोगात्मक पेशे के रूप में पुनर्परिभाषित करना: क्या बदलाव आवश्यक हैं?' रखी गई थी। वास्तव में इस थीम का मतलब यह है कि शिक्षक केवल और केवल पढ़ाने वाला या शिक्षा प्रदान करने वाला व्यक्ति मात्र ही नहीं है, अपितु वह तो विद्यार्थियों, अभिभावकों, अन्य शिक्षकों, विद्यालय प्रबंधन और समुदाय के साथ मिलकर काम करने वाला एक पेशेवर है। सरल व सीधे शब्दों में अगर कहें तो यह थीम इस बात पर जोर देती है कि बेहतर शिक्षा केवल एक शिक्षक के प्रयास से नहीं, बल्कि सभी संबंधित पक्षों के सहयोग से संभव है।वहीं इस वर्ष यानी कि वर्ष 2026 में इस दिवस की थीम -'शिक्षकों के साथ खड़े होना: पेशे की रक्षा करना, इसकी स्थिति को आगे बढ़ाना और हमारे भविष्य को संवारना' रखी गई है।यह थीम 1966 की अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन/यूनेस्को सिफारिशों के 60वें वर्ष की वर्षगांठ को ध्यान में रखकर रखी गई है।
आज एआइ का युग है और एआइ और आधुनिक तकनीक के तेज़ी से बदलते दौर में शिक्षकों के अधिकारों, उनके कार्य वातावरण और पेशेवर सम्मान की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है।इस वर्ष की थीम यह स्पष्ट करती है कि जब तक समाज शिक्षकों को सही संसाधन, प्रशिक्षण और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में सम्मानजनक स्थान नहीं देगा, तब तक एक मज़बूत और समावेशी शिक्षा प्रणाली का निर्माण संभव नहीं है।कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) के दौर में आज शिक्षकों को नई तकनीकों का ज्ञान और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना तथा उनके सम्मान और पेशेवर गरिमा को मजबूत करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। वास्तव में तभी हमारे शिक्षक बदलती दुनिया के साथ कदम मिलाकर नई पीढ़ी को सही ज्ञान, संस्कार और दिशा दे सकेंगे और उसके उज्ज्वल भविष्य की नींव मजबूत कर सकेंगे। एआइ के दौर में आज शिक्षकों की भूमिका निरंतर बदलती चली जा रही है। आज तकनीक का तेज दौर है और तकनीक से छात्रों को बहुत सी सुविधाएं उपलब्ध हो चुकीं हैं। मसलन, आज बिना शिक्षकों के ही वे एआइ की सहायता से आसानी से सवालों का जवाब पा लेते हैं, इसलिए आज के दौर में शिक्षक का काम सिर्फ जानकारी देना नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन और मेंटरशिप देना बन गया है। चीटिंग रोकना और अकादमिक ईमानदारी बनाए रखना आज एक प्रमुख चुनौती बन गया है। आज शिक्षकों को नए डिजिटल तकनीकों के अनुसार ढलना आवश्यक हो गया है, लेकिन आज भी हमारे शहरों और गाँवों के बीच इंटरनेट/एआइ सुविधाओं का अंतर तथा प्रशिक्षण की बहुत कमी है। बावजूद इसके एआइ केवल ज्ञान देने का एक मददगार उपकरण जरूर बन सकता है, लेकिन एक सच्चा शिक्षक बच्चे का मार्गदर्शक और जीवन-निर्माता होता है, जिसकी जगह कोई तकनीक नहीं ले सकती।सच तो यह है कि एआइ कभी भी मानवीय सोच, दया, नैतिक मूल्यों और प्रेरणा का मुकाबला नहीं कर सकती है ।शिक्षकों को भी यह चाहिए कि वे एआइ को अपना दुश्मन नहीं, बल्कि एक मददगार उपकरण मानें ,ताकि वे बच्चों के सर्वांगीण विकास में बेहतर योगदान दे सकें।बच्चे को सही-गलत का फर्क सिखाना, अच्छा बुरा और नैतिक अनैतिक में अंतर करना, उन्हें अनुशासन में रहना और एक अच्छा इंसान बनाना केवल मानवीय मार्गदर्शन से ही संभव है। हमें यह याद रखना चाहिए कि बच्चे के मन की बात, उसकी उदासी, खुशी या झिझक को सिर्फ एक शिक्षक समझ सकता है। बच्चों को प्रेरणा और प्रोत्साहन मशीन नहीं दे सकती है, यह वास्तव में एक शिक्षक का ही काम है।