बेटी हुई तो तानों से परेशान पति ने की खुदकुशी:ससुरालवालों ने मुझे घर से निकाला, प्रोफेसर बनी; लड़के-लड़कियों में फर्क पर करती हूं जागरूक
नई दिल्ली . यूपी के सीतापुर की शिल्पी शर्मा एक ऐसी महिला हैं, जिन्होंने पति और पैसे का अभाव झेला। दो बेटियां होने पर ससुरालवालों ने उनके पति को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। क्योंकि उन्हें अपनी पत्नी का साथ छोड़ना गंवारा नहीं था। शिल्पी अपने मां-बाप की दुलारी थीं, उतनी ही पति की प्यारी भी। शिल्पी का कहना है, ससुराल वालों के टाॅर्चर और पति की मृत्यु के बाद वह सदमे में आ गईं। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। शिल्पी ने दोनों बेटियों को अपने मायके मां के पास छोड़ा और अपनी मेहनत के दम पर बदायूं के महिला डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर बन गईं। अपनी परेशानियों को कविताओं और कहानियों में समेटा। आज महिलाओं को जागरूक करने में जुटी हैं। वह कहती हैं, जो मेरे साथ हुआ वह किसी और महिला के साथ नहीं होने दूंगी। उनके अभियान का नाम है-नारी ही नारी की दुश्मन क्यों।
आज ‘ये मैं हूं’ में मिलते हैं शिल्पी शर्मा से।
आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर सपने गवाएं, पिता ने प्रोफेसर बनाया
शिल्पी कहती हैं मैं लोअर मिडिल क्लास परिवार में पैदा हुई। पिताजी सिंचाई विभाग में वोरिंग टेक्नीशियन थे। हम चार बहनें और दो भाई हैं। मैं सांइंस स्टूडेंट रही और एमबीबीएस करके डॉक्टर बनना चाहती थी। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से एक बड़ा सपना अधूरा रहा गया, लेकिन मेरे पापा मुझे प्रोफेसर बनाने में कामयाब हुए। हम चार बहनें हैं, लेकिन हमारे माता-पिता ने हमें कभी यह महसूस नहीं कराया कि हम उनके लिए बोझ हैं। हम सभी उनकी लाडली थीं। घर के खर्चे इतने थे कि बाहर जाकर पढ़ाई कर पाना संभव नहीं था। मैं पापा को परेशान नहीं देखना चाहती थी। लेकिन पापा ने बहुत समझाया और पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया। जिसके बाद मैंने साइंस छोड़ दी, ताकि खर्चा कम हो और आर्ट साइड से पढ़ाई शुरू की। फिर एमए और बीएड करने बाद इंटर कॉलेज में मेरा चयन हो गया।
मैं अब महिलाओं को कैंपेन चलाकर जागरूक करती हूं।
दूसरी बेटी होने के बाद पति ने सुसाइड किया और ससुराल वालों ने घर से निकाला
मैं देखने में ऐवरेज लड़की हूं। 2015 में मेरी शादी हुई। मैं और मेरे पति बहुत खुश थे। लेकिन यह खुशी ससुराल वालों को बर्दाश्त नहीं हुई। सास ने मुझे तंग करना शुरू कर दिया। दहेज को लेकर भी ताने मिलते। मैं नजरअंदाज करती रही। ननद, सास, ससुर से लेकर सबने मुझे परेशान किया, लेकिन पति का सपोर्ट था इसलिए सहती रही। क्योंकि पति का पूरा सपोर्ट मिला। मैं ज्यादातर मायके में रही क्योंकि मेरा जॉब वहीं था। ससुराल कभी--कभी जाना होता। लेकिन सास मुझे तंग करने से न रुकती। बाद में हम शाहजहांपुर रहने लगे। करीब डेढ़ साल बाद मेरी पहली बेटी हुई और मेरी परेशानियां बढ़ गई। करीब 5 साल बाद जब दूसरी बेटी हुई तो परेशानियां दोगुनी हो गईं। मेरे साथ साथ पति को भी परेशान किया जाने लगा और उन्होंने अपने ही घर वालों से तंग आकर सुसाइड कर लिया।
बहू के लिए सोच नहीं बदली
मायके में हमारे घर का माहौल बहुत मॉडर्न नहीं था, लेकिन हमें अपनी बात रखने की आजादी थी। मुझे पढ़ाई के लिए कभी रोका नहीं गया। मैंने पढ़ाई के साथ घर के सारे काम, यहां तक कि कढ़ाई-बुनाई, ड्राइंग, इंटीरियर डैकोरेशन भी सीखा। लेकिन जब मैं ससुराल पहुंची तो ऐसे लगा जैसे मैं प्राचीन युग में पहुंच गई हूं। मुझे लोगों की इस सोच से शिकायत है कि उन्हें बहू की कमाई तो चाहिए, लेकिन उसे नॉर्मल लाइफ देना भी उन्हें मंजूर नहीं होता। दुनिया इतनी आगे बढ़ गई है, लेकिन महिलाओं की दुनिया आज भी नहीं बदली है।