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उत्तराखंड की बेटी क्यों कहलाती हैं मां नंदा देवी? जानिए उनकी अनोखी महिमा

उत्तराखंड की बेटी क्यों कहलाती हैं मां नंदा देवी? जानिए उनकी अनोखी महिमा

उत्तराखंड। देवभूमि उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में मां नंदा देवी का विशेष स्थान है। यहां उन्हें केवल देवी स्वरूप में नहीं, बल्कि घर की बेटी मानकर पूजा जाता है। यही कारण है कि उनके प्रति श्रद्धा के साथ आत्मीयता और पारिवारिक भावनाएं भी जुड़ी हुई हैं।

लोकमान्यताओं के अनुसार मां नंदा देवी, पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती का ही स्वरूप हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में उन्हें सुख, समृद्धि और आनंद प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। प्रदेश की लोक संस्कृति, रीति-रिवाज और धार्मिक परंपराओं में उनका गहरा प्रभाव देखने को मिलता है।

हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मां नंदा देवी की महिमा का उल्लेख किया। उन्होंने अल्मोड़ा स्थित पवित्र मंदिर का वीडियो साझा करते हुए इसे क्षेत्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक बताया। उन्होंने श्रद्धालुओं से मंदिर दर्शन का आग्रह भी किया।

मां नंदा देवी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध धार्मिक परंपराओं में नंदा राजजात यात्रा शामिल है। मान्यता है कि देवी हर 12 वर्ष में अपने मायके नौटी गांव आती हैं। इसके बाद उनकी विदाई के रूप में एक विशाल और कठिन पदयात्रा निकाली जाती है, जो चमोली जिले के नौटी गांव से शुरू होकर होमकुंड तक पहुंचती है। लगभग 280 किलोमीटर लंबी यह यात्रा हिमालयी क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है।

इस यात्रा की एक खास पहचान चौसिंग्या खाडू यानी चार सींग वाले दुर्लभ काले मेढ़े से भी जुड़ी है। श्रद्धालु इसे मां नंदा देवी का वाहन मानते हैं और यात्रा के दौरान यह आगे-आगे चलता है। यही परंपरा यात्रा को और अधिक विशिष्ट बनाती है।

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली नंदा अष्टमी भी विशेष महत्व रखती है। इस अवसर पर उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े उत्साह के साथ धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। कई स्थानों पर केले के पेड़ (कदली) से मां नंदा की प्रतिमा बनाकर पूजा-अर्चना की जाती है और भक्त उनसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं।

मां नंदा देवी केवल एक देवी नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक आस्था, संस्कृति और पारिवारिक भावनाओं का जीवंत प्रतीक मानी जाती हैं। यही वजह है कि प्रदेश के लोग उन्हें अपनी बेटी के रूप में सम्मान और स्नेह देते हैं।

 

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