आचार्य विद्यासागर महाराज का 56वां मुनि दीक्षा दिवस समारोह भक्तिभाव से मनाया
मदनगंज किशनगढ़। जैन जगत के सर्वोच्च, संत मूकमाटी महाकाव्य के रचयिता, अध्यातम सरोवर के राजहंस, परम पूज्य संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का 56वां मुनि दीक्षा दिवस समारोह विविध कार्यक्रमों के साथ मनाया गया। श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आदिनाथ भगवान के मस्तकाभिषेक के तत्पश्चात शांतिधारा की गई। शांतिधारा का पुण्यार्जन विनय कुमार रौनक कुमार गंगवाल परिवार, सुमेर चंद आलोक कुमार मनीष अतुल अजमेरा परिवार, घीसालाल सुलोचना देवी बडजात्या परिवार, सुनील कुमार पाटनी परिवार ने प्राप्त हुआ। नित्य नियम पूजा, नव देवता पूजन, आदिनाथ भगवान की पूजा भक्ति भाव से की गई। ततपश्चात आचार्य छत्तीसी विधान पूजन हुआ। कमल सेठी एवं शांता पाटनी ने संगीत को मधुर स्वर लहरियों के साथ नाचते गाते भक्ति भाव से अर्घ्य समर्पित किए। विधान पर आचार्य परमेष्ठी के 36 मूलगुण के 36 अर्घ्य समर्पित किये। विधान के सौधर्म इंद्र सुमेर चंद आलोक कुमार अतुल कुमार मनीष कुमार अजमेरा परिवार थे। शाम को भक्तामर जी के पाठ तत्पश्चात 56 रजत दीपको द्वारा आचार्य श्री की महाआरती की गई। इस अवसर पर आर के परिवार से कंवरलाल पाटनी, शांता पाटनी, आदिनाथ पंचायत के अध्यक्ष प्रकाशचंद गगंवाल, उपाध्यक्ष महावीर प्रसाद गगंवाल, उपमंत्री इंदर चंद पाटनी, नौरतमल पाटनी, निर्मल कुमार छाबड़ा, नरेंद्र कासलीवाल, रतन दगडा, विजय कुमार काला, पवन लुहाडिया, संजय जांझरी, पवन काला, राकेश पाटनी, राकेश काला आदि उपस्थित थे।
आचार्य श्री संक्षिप परिचय
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की मुनि दीक्षा मात्र 22 वर्ष की उम्र में 30 जून 1968 को अजमेर के सुभाष उद्यान में परम पूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के द्वारा हुई। आचार्य श्री की शिक्षा किशनगढ़ के चंद्रप्रभु मंदिर मे हुई थी। केडी जैन विधालय के प्राचार्य ओमप्रकाश जैन ने उनको अंग्रेज़ी व महेंद्र कुमार पाटनी ने संस्कृत पढाई थी। वर्तमान में आचार्य श्री द्वारा अनेक ग्रंथों को रचना कर चुके है। सबसे बडा मूकमाटी महाकाव्य गुरुदेव ने लिखा है। जो पांच भाषा मै अब तक छप चुके है। आपकी प्रेरणा से अनेको गौशाला चिकित्सालय हथकरघा प्रतिभासथलीया अनेकों नये तीर्थ क्षैत्र एवं पुराने तीर्थ क्षैत्रो के जीर्णोद्धार का कार्य चल रहा है। आचार्य श्री ने अब तक 350 से अधिक बाल ब्रह्मचारी मुनिदीक्षा प्रदान की है। वर्तमान मे आचार्य श्री का वर्ष 2023 का चातुर्मास डोंगरगढ़ मे संपन्न हो रहा है। लगभग 50 से अधिक उपसंघ पूरे भारतवर्ष मे 50 जगहो पर चातुर्मास कर धर्म की प्रभावना कर रहे है।
दीक्षा ली जाती है दी नहीं जाती और पद दिया जाता है लिया नहीं जाता
स्मृति वर्तमान में होती है लेकिन उसका अनुभव नहीं होता है। आचार्य कुंदकुंद ने बताया कि दीक्षा के दिन को याद करने से क्या होता है। दीक्षा के दिन को याद नहीं करना किन्तु दीक्षा क्यों धारण किया है। उसको याद रखने को कहा है। आप लोग घरों में प्रवेश करते हैं जब कहीं जाते हैं तो लौटकर वापस घर ही आते हैं। किन्तु दीक्षा होने के उपरांत लौटने कि बात नहीं होती है। यदि लौटना ही है तो फिर जाना नहीं चाहिये। इस रहस्य को जो समझ गया वह कभी लौटने कि बात नहीं करता, वह सिर्फ आगे बढ़ते जाता है और जो दीक्षा उपरांत छोटे घर से निकल कर बड़े घर में रह रहा है उसे यह रहस्य अभी भी समझ में नहीं आया है। दीक्षा ली जाती है दी नहीं जाती और पद दिया जाता है लिया नहीं जाता। जब दीक्षा लेते हैं तो गुरु का आशीर्वाद भी रहता है। यथायोग्य दीक्षा के उपरांत नियमों का पालन आदि रुचि पूर्वक एवं श्रद्धान के साथ करते हैं। स्मृति का हमें अनुभव नहीं हो सकता, वर्तमान में प्रत्यक्ष होता है वही अनुभव में आता है। संसार सब कुछ दिख रहा है लेकिन देखने वाला नहीं दिखता। गुरु ने मुझे गुरु समय दिया लघु बन्ने के लिये। पहले मुनि महाराज जंगलों में रहते थे वहाँ उन्हें जिन बिम्ब का दर्शन नहीं होता था तो वे परोक्ष में ही बिम्ब का दर्शन कर लेते थे। गुरु ने पद दिया है निर्वाह करना है जब तक चल रहे है ठीक है जब खीचने लग जायें तो यहाँ पर खीचा– तानी नहीं होना चाहिये। यह बहुत बड़ा पद है जिसको लघु बन करके शक्ति को विकसित किया है। जिस प्रकार रेल में चालक और गार्ड होता है। गार्ड जब हरी झंडी दिखाता है तभी चालक रेल को आगे बढाता है और जब गार्ड लाल झंडी दिखाता है तो चालक रेल को वही रोक लेता हैं। स्मृति का अर्थ शास्त्र होता है और उसका दूसरा अर्थ लिखा हुआ भी होता है। पहले फलक पर लिखा जाता था जिसे पढ़कर उसका पालन करते थे। भगवान से यही प्रार्थना है कि लघु से लघुतर, लघुतर से लघुतम बनु। यहाँ लघु से आशय छोटा है किन्तु उसका दूसरा अर्थ हल्का है। जैसे एक कढाई में घी को चुरोते हैं फिर उसमे कच्ची पूरी डालते हैं जब उसमे कच्ची पूरी डालते हैं तो वह निचे जाती है क्योंकि उसमे पानी का भार था और जब वह चुरने लगती है और आप लोग उसमे ऊपर से घी का अभिषेक करने लगते हो तो उसका सारा पानी निकल जाता है और वह हल्की– फुल्की होकर ऊपर आ जाती है। हल्की मतलब भार कम होना और फुल्की मतलब फूलना (अच्छा लगना)। इसी प्रकार हमें हल्का होना है पूरी कि भांति लेकिन उसके लिये हमें इस चुरनी को सहन करना पड़ेगा। गुरु जी ने आचार्य पद को त्याग कर दिया था क्योंकि मुनि बनकर ही सल्लेखना ले सकते हैं। मुनि दीक्षा का अंतिम लक्ष्य सल्लेखना ही होता है।