Dark Mode
भिक्षावृत्ति उन्मूलन और जनभागीदारी

भिक्षावृत्ति उन्मूलन और जनभागीदारी

आज कल भिक्षावृत्ति की समस्या दिनों-दिन जटिल होती जा रही है। कुछ लोग तो अशक्त होने पर भीख
मांगने पर मजबूर होते हैं। तीर्थ स्थानों, धार्मिक स्थलों, मंदिरों में तो यह बहुत अधिक संख्या में पाये जाते
हैं। सड़कों, चौराहों, पर्यटन स्थलों और बाजारों में भी भिक्षावृत्ति का साम्राज्य है। आज भिक्षावृत्ति ने एक
व्यवसाय का रूप ले लिया है। दया, सहानुभूति जैसी मानवीय भावनाओं का लाभ उठा कर भिक्षावृत्ति का
व्यवसाय फल फूल रहा है। गली गली घूम कर, मुहल्लों में जाकर प्रतिदिन भिखारी कुछ पाने की अपेक्षा
रखते हैं। जरूरी नहीं कि जो इन्हें दिया जाये उससे वह प्रसन्न हो जायें। आजकल तो भिखारी भिक्षा भी ले
लेते हैं और ताना भी मार देते हैं। वस्तुस्थिति यह है कि भिक्षावृत्ति में अब कई प्रकार के भिखारियों ने कदम
जमा लिये हैं। किन्नर भी इसमें हाथ आजमा रहे हैं और याचना से काम ने चलने पर धौंस जमाकर और
धमकी देकर पैसे ऐंठते भी देखे गये हैं। भिक्षा मांगना भी एक कला है। कुछ भिखारी अपने अंधे लंगड़े या
अपाहिज होने का कारण बताते हुए भीख मांगते हैं। कुछ वेषभूषा को अजीब बना कर, लम्बे बाल करके, राख
पोत कर स्वांग करके मांगते हुये दिख जाते हैं। कुछ बसों एवं रेलगाड़ियों में गा बजा कर पैसे मांगते हैं। कुछ
केसरी वस्त्र पहन कर भीख मांगते हैं तो कुछ साधु संतों के रूप में पर कई भिखारी खतरनाक होते हैं। वह
महिलाओं एवं बच्चों को ठगते हैं। मौका पाकर वह उनके गहने लूटने से भी बाज नहीं आते। इनसे सावधान
रहना चाहिए। भीख मांगना अब कानूनन भी अपराध माना जाता है।
हमारे देश में भिक्षा ,भीख और दान की परम्परा रही है। मगर इन तीनों में अंतर समझना जरुरी है। भीख
भिखारी को सहायता के रूप में दी जाती है भीख का कोई उद्देश्य नही होता । भीख देने के लिए किसी की
योग्यता-अयोग्यता भी नही देखी जाती है। भिक्षा लेने वाले से यह आशा की जाती है कि वह इसे लेकर सभी
के हित के लिए कार्य करेगा या फिर स्वयं का जीवन यापन करेगा। इसी भांति दान में भी भिक्षा के ही समान
लक्षण होते हैं परंतु अंतर इतना होता है कि दान देने वाला इन्ही सब कारणों व लक्षणों को ध्यान में रखते
हुये स्वयं जाकर इच्छित स्थान और समय पर व्यक्ति को दान देता है। मगर अब भीख, भिक्षा और दान
को एक ही तराजू पर तोला जाने लगा है जिससे इनका भेद मिट गया है।
भीख भिक्षा और दान का पात्र अब केवल भिखारी ही रह गया है और बदलते जमाने में उसे भिखारी के नाम
से ही सम्बोधित किया जाने लगा है। भारत में कानूनी तौर पर भिखारी की जो परिभाषा है उसके अनुसार
भिखारी वह व्यक्ति है जिसके पास जीने का कोई साधन नहीं है, ना ही उसके पास सिर छिपाने के लिए छत
है। वह लाचार, असमर्थ और अपंग है। सामान्य भाषा में ऐसा व्यक्ति भिखारी कहलाता है। 2011 की

जनगणना बताती है कि देश में तीन लाख बहत्तर हजार भिखारी थे, जिनमें से 21 फीसद यानी 78 हजार
भिखारी शिक्षित थे। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्यमंत्री ने राज्यसभा में एक सवाल के
जवाब में बताया कि देश में भिखारियों की संख्या चार लाख तेरह हजार छह सौ सत्तर है, जिनमें पुरुषों की
संख्या दो लाख बीस हजार और महिलाओं की संख्या एक लाख इक्यानबे हजार है।
आप सुबह सुबह घर से ऑफिस या व्यवसाय के सिलसिले में बाहर निकलते हैं, तो आपको रेलवे स्टेशन,
बस पड़ाव या मार्केट में अल्लाह के नाम पर देदे बाबा् या फिर भगवान के नाम पर दे दे बाबा जैसा शब्द
सुनाई देता हैं। जब आप उधर नजर दौड़ाते हो तब आपको कुछ भिखारी डब्बे, बर्तन जैसे टिन का कटोरा
आदि लिए यह वाक्य बार-बार दोहराते हैं। उसमें बच्चे, बूढ़े, नौजवान, विकलांग शामिल होते हैं। अंधे भी इस
धंधे में शामिल होते हैं।
यह सच है कि केवल कानून के माध्यम से भिक्षावृति पर रोक नहीं लगाई जासकती। इस बुराई पर रोक के
लिए समाज को आगे आकर प्रयास करने होंगे ,शारीरिक रूप से लाचार लोगों को रोजी रोटी का सरकार प्रबंध
करे मगर जो सक्षम है और विभिन्न कारणों से ऐसा कर रहे है उनके रोजगार का प्रबंध सरकार करे ताकि
मिलजुल कर भिक्षावृति रोकी जा सके।

Comment / Reply From

Newsletter

Subscribe to our mailing list to get the new updates!