आखिर कब तक उड़ता रहेगा यह ‘उडऩ ताबूत’
-अमरपाल सिंह वर्मा-
वायुसेना का एक और मिग-21 लड़ाकू विमान आज सुबह राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले मेंं बहलोलनगर गांव के पास क्रेश हो गया। सौभाग्य से विमान का पायलट बच गया लेकिन हादसे की वजह से गांव की तीन महिलाओं की जान चली गई। के्रश होने के बाद यह विमान एक मकान पर गिरा, जिससे इन महिलाओं को जान से हाथ धोना पड़ा। मिग-21 के क्रेश होने की इस घटना के बाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि ‘उडऩ ताबूत’ कहा जाने वाला यह लड़ाकू विमान आखिर कब तक उड़ता रहेगा और कब तक हम इस तरह के हादसों को होते देखते रहेंगे?
हमारी वायुसेना के के लिए मिग-21 विमान 1960 में तत्कालीन सोवियत संघ से खरीदे गए। इन विमानों को 1963 में वायुसेना मेंं शामिल किया गया। एक जमाना था, जब हम मिग-21 को गर्व से फौज की रीढ़ कहते नहीं थकते थे। सन् 1971 की जंग मेंं मिग-21 का योगदान अविस्मरणीय है। उस समय मिग-21 ही था, जिसने दुश्मन के लड़ाकू विमानों को करारी मात दी पर पिछले तीन दशक से जिस तरह इसके हादसे बढ़े हैं, तब से इसकी उपादेयता पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। इसे न युद्ध के लिए मुफीद माना जा रहा है और न नियमित प्रशिक्षण उड़ान के काबिल। इसकी वजह मिग-21 के लगातार दुर्घटनाग्रस्त होना है। मिग-21 इतनी ज्यादा बार क्रेश हुआ है और इसकी वजह से हमारे इतने अधिक जांबाज जवानों की शहादत हुई है कि अब इसकी पहचान उड़ते ताबूत के रूप मेंं स्थापित हो चुकी है।
हनुमानगढ़ जिले मेंं आज हुआ मिग-21 हादसा कोई नई बात नहीं है। मिग-21 के क्रेश होने की घटनाएं इतनी आम हो चुकी हैं कि जब भी एयरफोर्स के किसी फाइटर प्लेन के क्रेश होने की खबर आती है तो आम आदमी भी कह उठता है-मिग-21 ही गिरा होगा।
सवाल उठता है कि आखिर इस तरह की परिस्थिति क्यों पैदा हुई है? जवाब है मिग-21 के बार-बार क्रेश होने की घटनाएं। पिछले पांच दशक में चार सौ से अधिक मिग-21 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो कर जमींदोज हो चुके हैं और इसकी कीमत देश को दो सौ से ज्यादा जांबाज पायलटों को खोकर चुकानी पड़ी है। हादसों में करीब पचास नागरिकों की मौतें भी हुई हैं।
विमानों के साथ हादसे का डर हमेशा बना रहता है। दुनिया भर में विमान हादसे होते रहते हैं लेकिन मिग-21 जिस प्रकार हादसों का पर्याय बना हुआ है, वह चिंताजनक है। सन् 2012 में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंथनी द्वारा संसद में दिए बयान पर गौर करें तो रूस से खरीदे गए 872 मिग विमानों में आधे से ज्यादा हादसे का शिकार हो चुके हैं। यह आंकड़ा तो वर्ष 2012 का है, इसके बाद तो अनेक हादसे और हो चुके हैं।
1960 मेंं भारत ने मिग-21 विमान तत्कालीन सोवियत संघ से खरीदे थे। वहां 1985 में ही इन विमानों को सेना से हटा दिया गया। इसके उपरांत अफगानिस्तान और बांग्लादेश भी इसे रिटायर कर चुके हैं। हमारे यहां इन विमानों को नब्बे के दशक में रिटायर किया जाना था लेकिन इन्हें अभी तक इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारी वायुसेना मिग-21 विमानों को अपग्रेड करके इस्तेमाल कर रही है। मीडिया रिपोट्र्स के अनुसार हमारी वायुसेना मिग-21 को इसलिए रिटायर नहीं कर पा रही है क्योंकि इसके बदले में उसे जितने विमानों की जरूरत है, वह उसके पास नहीं है। हालांकि वायुसेना में नए विमान शामिल किए जा रहे हैं मगर उनकी तादाद में अपेक्षित संख्या से कम है।
बीबीसी की एक रिपोर्ट पर भरोसा करें तो पायलट मिग विमानों के कुछ मॉडल्स में दिक्कतों के बारे में निरंतर शिकायत करते हैं। शिकायतों के अनुसार इनकी लैंडिंग बहुत तेज होती है एवं इनकी कॉकपिट विंडो ऐसी है कि उससे पायलट को रनवे ढंग से नजर ही नहीं आता। फिर इनका सिंगल इंजन होना सर्वाधिक खतरे की घंटी है। परिंदों के टकराने से मिग-21 के दुर्घटनाग्रस्त होने की आशंका अधिक रहती है। इसका इंजन अक्सर उड़ते समय फेल हो जाता है। इसका परिणाम मिग-21 के क्रेश होने के रूप में सामने आता है। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले मेेंं आज सुबह हुआ मिग-21 हादसा इसका ताजा उदाहरण है।
सरकार की योजना है कि मिग-21 को चरणबद्ध तरीके से 2025 तक वायुसेना के बेड़े से बाहर कर दिया जाए लेकिन बड़ा सवाल यह है कि तब तक न जाने और कितने मिग-21 जमींदोज हो चुके होंगे और न जाने हमें कितने जांबाज पायलट को शहीद होते हुए देखना पड़ेगा?