याददाश्त
सलमान ने घर का ताला खोला और दरवाज़ा खुला ही छोड़ दिया। अंदर से खाट निकाली,चद्दर बिछायी और उस
पर बैठ गया। पूरे दो वर्ष बाद शहर से गांव लौटा है वह। चौपाल में बस से उतरते हुए लोगों ने दूर से उसे देखा तो था ही,
सो मिलने भी आयेंगे ही।
यही सोचते-सोचते पता नहीं कब उसे नींद आ गई। जब आँख खुली,तो आसमान पर तारे चमक रहे थे। उसने घड़ी
देखी, रात्रि के एक बज रहे थे। तो क्या इस दौरान घर में कोई नहीं आया ? ऐसा कैसे हो सकता है ! जब मन बेचैन हो,तो
समय भी बहुत धीरे चलने लगता है। इतनी लम्बी रात तो पहले कभी नहीं रही।
सुबह होते ही सलमान मुँह धोकर गली में निकल पड़ा। रहमान चाचा अपने घर के सामने चबूतरे पर बैठे थे।
दुआ-सलाम हुई। इधर-उधर की कई बातें करने के बाद आख़िर मन की बात सलमान के होठों पर आ ही गई - " चाचा !
गांव वाले मुझे पूरी तरह भूल चुके हैं क्या ? "
" नहीं भाई, ऐसा नहीं है " चाचा ने जवाब दिया- " दो बरस पहले जब गांव में सैलाब आने की ख़बर फैली, तो किस
तरह तुम रातों-रात परिवार को लेकर चुपचाप शहर की तरफ निकल लिए थे, गांव वालों को आज भी अच्छी तरह याद
है
बनवारी ख़ामोश चूरूवी