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मोबाइल बना रहा बच्चों को एकाकी, स्कूलों में हो मोबाइल फोन

मोबाइल बना रहा बच्चों को एकाकी, स्कूलों में हो मोबाइल फोन

हाल ही में यूनाइटेड नेशन के एजुकेशन साइंस एंड कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन (यूनेस्को) ने स्कूलों में मोबाइल का प्रयोग किए जाने को बैन करने की बात कही है। यूनेस्को ने यह बात कही है कि बहुत अधिक समय तक मोबाइल स्क्रीन के सामने रहने से बच्चों की मानसिक स्थिति पर काफी असर पड़ता है। यूनेस्को ने बच्चों द्वारा मोबाइल के अधिक प्रयोग को ठीक नहीं बताया गया है। बहरहाल, यह बहुत ही काबिलेतारिफ बात है कि यूनेस्को द्वारा मोबाइल के प्रयोग को लेकर
छात्रों के हित में सही व बहुत अच्छी सलाह दी गई है, क्यों कि आज के समय में अधिकतर बच्चे लगातार मोबाइल से चिपके रहते हैं। यूनेस्को ने बिल्कुल भी ग़लत नहीं कहा है कि मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल छात्रों(स्कूली बच्चों)के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। जानकारी देना चाहूंगा कि यूनेस्को द्वारा जारी एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि विश्व में आज नीदरलैंड, सिंगापुर समेत कई देश क्लास में स्मार्टफोन(एंड्रॉयड मोबाइल)के उपयोग पर बैन लगा चुके हैं। इतना ही नहीं आज संयुक्त राज्य अमेरिका में ओहियो, कोलोराडो, मैरीलैंड, वर्जीनिया, कैलिफोर्निया, पेंसिल्वेनिया और कनेक्टिकट ने इस साल से स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, अमेरिका के कुछ स्कूलों ने मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है।चीन ने फरवरी 2021 से स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। ऑस्ट्रेलिया के एक द्वीप तस्मानिया ने 2020 में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगा दिया। 2018 में फ्रांस ने छात्रों का ध्यान केंद्रित रखने के लिए प्राथमिक और माध्यमिक छात्रों के लिए स्कूल में मोबाइल फोन नहीं लाना अनिवार्य कर दिया।यूनाइटेड किंगडम ने भी हाल ही में स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने की वकालत की है, लेकिन भारत में स्कूलों में मोबाइल फोन का उपयोग न करने के संबंध में कोई कानून या विनियमन नहीं है। सरकारी और निजी स्कूलों का प्रबंधन अपने फैसले खुद लेता है। बहरहाल, यूनेस्को का यह कहना है कि यदि स्कूलों में मोबाइल फोन का इस्तेमाल होता है तो बच्चे अनुशासन में नहीं रहते हैं और उनका ध्यान पढ़ाई से भी निश्चित रूप से डिस्टर्ब होता है। वैसे भी, स्कूली बच्चों का मन काफी कुम्हार के मिट्टी के कच्चे बर्तन की तरह बहुत ही कोमल(मृदु) होता है और कोमल मन पर मोबाइल का लगातार प्रयोग बहुत ही गहरा प्रभाव डालता है। मोबाइल के निरंतर प्रयोग से बच्चों की कोमल आंखों, मन-मस्तिष्क व स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है और वे बहुत बार अवसाद, तनाव, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द का शिकार हो जाते हैं। मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से बच्चों की आदतों तक में काफी बदलाव आ सकता है, यहां तक कि कुछ बच्चों को न्यूरोलॉजिकल डिस्आर्डर भी हो सकता है, मोबाइल से निकलने वाली रेडिएशन से ट्यूमर तक का भी खतरा बच्चों को हो सकता है। मोबाइल बच्चों की कोमल आंखों को बहुत नुक्सान पहुंचा सकता है। इससे बच्चों की आंखों में जलन, सूखापन, थकान व बच्चों को जल्दी नजर का चश्मा लग सकता है। कम्प्यूटर विजन सिंड्रोम से पलकें साधारणतया कम झपकने लगतीं हैं। बच्चों के सामाजिक व व्यक्तित्व विकास में दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। बच्चे बहुत बार भावनात्मक रूप से भी कमजोर हो सकते हैं।बच्चे अक्सर फोन में गेम खेलते या कार्टून देखते हुए खाना खाते हैं, इसलिए वे जरूरत से अधिक या बहुत कम भोजन करते हैं। अधिक समय तक ऐसा करने से उनमें मोटापे की अथवा कमजोर होने की आशंका तक बढ़ जाती है। फोन के अधिक इस्तेमाल से वे बाहरी दुनिया से संपर्क करने में कतराते हैं। जब उनकी यह आदत बदलने की कोशिश की जाती है तो वो चिड़चिड़े, आक्रामक और कुंठाग्रस्त हो जाते हैं। वास्तव में, बच्चों की मानसिक स्थिति पर भी मोबाइल प्रभाव डालता है।कहना ग़लत नहीं होगा कि स्कूलों में स्मार्टफोन पर प्रतिबंध लगाने से क्लास में अनुशासन बना रहेगा और बच्चों को ऑनलाइन डिस्टर्ब होने से भी बचाया जा सकेगा।यूनेस्को ने अपनी एजुकेशन रिपोर्ट में यह बात कही है कि आज के समय में मोबाइल फोन हर किसी की रोजमर्रा की जरूरत बन गया है।चाहे भुगतान करना हो या बुकिंग करनी हो, सोशल मीडिया का उपयोग करना हो, या यहां तक कि शैक्षणिक संसाधनों की तलाश करनी हो, इस युग में स्मार्टफोन के बिना काम करना कठिन है। स्टेटिस्टा के अनुसार, दुनिया भर में स्मार्टफोन(एंड्रॉयड मोबाइल फोन)उपयोगकर्ताओं की कुल संख्या 2028 तक 525 करोड़ से अधिक तक पहुंचने की उम्मीद है। आज का युग डिजीटल युग है और डिजीटल युग में स्मार्टफोन का बहुत ही महत्वपूर्ण और अहम् योगदान व भूमिका है।
आज बच्चे मोबाइल फोन, लैपटॉप, कंप्यूटर के आदी(हैबिट्यूअल) हो गए हैं। वास्तव में,स्मार्टफोन(एंड्रॉयड मोबाइल फोन)का उपयोग बेहतर सीखने के साथ छात्रों और शिक्षकों की भलाई के लिए होना चाहिए, न कि उनके नुकसान के लिए। आज के समय हमें बच्चों को तकनीकों के साथ और उसके बिना भी रहना सिखाना चाहिए। यह ठीक है कि तकनीक आज की बहुत बड़ी आवश्यकता है, जरूरत है ; लेकिन तकनीक का उपयोग कहीं न कहीं सीमित इसलिए होना चाहिए ताकि इसका स्वागत पर ग़लत प्रभाव न पड़े। हाल ही में आई यूनेस्को की टेक्नोलॉजी(तकनीक )से संबंधित इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि डिजिटल शिक्षा में चाहे कितनी ही क्षमता हो, वह शिक्षक छात्र के प्रत्यक्ष संवाद की जगह नहीं ले सकती है। एआई जिसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या कृत्रिम बुद्धि के नाम से भी जाना जाता है, या किसी भी प्रकार की डिजिटल तकनीक को मानव केंद्रित शिक्षण के एक सहायक घटक के रूप में देखा जाना चाहिए। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पढ़ाई में व्यवधान टालने और सायबर बुलिंग ( साइबर दादागिरी) से विद्यार्थियों को बचाने के लिए स्कूलों में स्मार्टफोन या मोबाइल लाने पर रोक लगनी चाहिए। मोबाइल के अधिक इस्तेमाल से शैक्षणिक स्तर गिरता है। स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों की भावनात्मक स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव(नेगेटिव इफेक्ट) पड़ता है। अतः यह बात कही जा सकती है कि यूनेस्को ने इस बात की पुरजोर रूप से पैरवी की है कि कक्षा में व्यवधान टालने और अध्ययन क्षमता बढ़ाने के लिए स्कूलों में मोबाइल पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति पर ध्यान केंद्रित करने वाली यूनेस्को की इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि यह छात्रों की क्रिएटिविटी को भी एक हद तक मारने का काम करता है। वास्तव में,
रिपोर्ट में स्मार्टफोन को केवल एक टूल की तरह ही इस्तेमाल करने के महत्व पर जोर दिया गया है।
रिपोर्ट में यह आग्रह किया गया है कि आमने-सामने शिक्षण के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और प्रभावी शिक्षण के लिए छात्रों और शिक्षकों के बीच सामाजिक संपर्क बहुत ही जरूरी है और इसे किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। जानकारी देना चाहूंगा कि यूनेस्को महानिदेशक ऑड्रे अज़ोले ने कहा है कि , 'डिजिटल क्रांति में जबरदस्त संभावनाएं हैं लेकिन, समाज में इसका नियमन नहीं है। साथ ही इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी है कि शिक्षा क्षेत्र में इस डिजिटल क्रांति का उपयोग कैसे किया जा रहा है।' स्मार्टफोन के इस्तेमाल से छात्रों को नुकसान न हो ये सुनिश्चित होना चाहिए। शैक्षिक अनुभव को समृद्ध करने और शिक्षक-छात्र संबंधों को मजबूत करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना चाहिए। डिजिटल प्रौद्योगिकी के किसी भी रूप को मानव-केंद्रित शिक्षा के सहायक के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह कभी भी शिक्षक और छात्र के बीच वास्तविक संवाद की जगह नहीं ले पाएगा। पाठकों को जानकारी देता चलूं कि 'बिजनेस लाइन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल के अंत तक भारत में मोबाइल यूजर्स की संख्या 100 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। एक्सप्लोडिंग टॉपिक्स रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में हर व्यक्ति हर दिन औसतन 3 घंटे 15 मिनट मोबाइल पर बिताता है। दुनिया के अन्य देशों की तुलना में फिलीपींस में लोग मोबाइल पर सबसे ज्यादा समय बिताते हैं। डेटा रिपोर्टल के अनुसार, फिलिपिनो हर दिन मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए पांच घंटे और 47 मिनट बिताते हैं। जबकि जापानी नागरिक अपने मोबाइल फोन का इस्तेमाल सबसे कम एक घंटा 39 मिनट तक करते हैं। भारत की बात करें तो भारत में औसत मोबाइल उपयोग चार घंटे पांच मिनट है। डेटा रिपोर्ट के मुताबिक विकसित देशों की तुलना में विकासशील या अविकसित देशों में मोबाइल पर समय अधिक बिताया जाता है। बहरहाल, यह ठीक है कि कोरोना काल में मोबाइल का बेतहाशा प्रयोग बढ़ा, क्यों कि यह महामारी ही कुछ ऐसी थी जिसने पूरी दुनिया को एक प्रकार से घरों में बंद रहने के लिए मजबूर कर दिया और मोबाइल या यूं कहें कि तकनीक का प्रयोग बढ़ा लेकिन तकनीक के अपने फायदे और नुकसान हैं। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वरदान है या अभिशाप इस पर कोई भी एकमत नहीं है। किसी प्रगति से मानव का भविष्य उज्ज्वल होगा या बिगड़ेगा, इस मुद्दे पर भी विचार करने की जरूरत है क्यों कि यदि विद्यार्थी एआई पर बहुत ज्यादा निर्भर हो जाएंगे और चैट जीपीटी का उपयोग करते रहेंगे तो मौलिक चिंतन और लेखन की प्रक्रिया खत्म हो जाएगी।वे सब कुछ रेडीमेड चाहेंगे। यह ठीक है कि कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन जरूरी था लेकिन अब उसकी कोई बाध्यता नहीं है, क्यों कि कोरोना अब लगभग लगभग खत्म हो चुका है अथवा अब उसका इतना भय नहीं रहा जितना कि पहले था। आज ओटीटी प्लेटफॉर्म पर हकीकत दिखाने के नाम पर ऐसी ऐसी वेबसीरीज दिखाई जाती है जिसमें अपशब्दों, मारधाड़, क्राइम आदि की भरमार होती है और इससे छात्रों के मन-मस्तिष्क बुरा असर पड़ना स्वाभाविक ही है। मोबाइल में अनावश्यक बातों पर भी बच्चों का कहीं न कहीं ज्यादा ध्यान जाता ही है। आज बच्चे खेल के मैदानों में खेलने नहीं जाते, वे अपने अभिभावकों, माता पिता,दादा दादी,नाना नानी के साथ समय नहीं बिताना चाहते क्योंकि मोबाइल ने उन्हें एकांकी बना दिया है। पहले के जमाने में बच्चे अपनी पुरानी पीढ़ी की सीख व अनुभव से बहुत कुछ सीखते थे और विभिन्न जीवनमूल्यों, संस्कारों व नैतिकता को ग्रहण करते थे लेकिन मोबाइल ने उन्हें एकाकी बना दिया है। आउटडोर गेम में उनकी रुचि बहुत ही कम हो गई है। सच तो यह है कि आज की युवा पीढ़ी मोबाइल से पल भी दूर नहीं रह सकती है।

                                                                                                                                     सुनील कुमार महला

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