जुबां पर चढ़े न दूजा रंग
चुनावी दौर है। गली-गली,मोहल्ले-मोहल्ले, गांव-गांव, शहर-शहर पार्टी बदलने को लेकर उमड़ रहा आज शोर है। पार्टी बदलने-बदलवाने का कार्यक्रम चल रहा घनघोर है। पार्टी बदलने को मन हो रहा 'मोर' (मयूर) है। किया क्या आपने इस बात पर कभी गौर है ? अजी ! पार्टी बदलो,किस्मत को चमकाओ और फिर सातों पीढ़ी बैठकर खाओ। मौज उड़ाओ।चुनाव के दौर में नेता जी आज से नहीं सदियों सदियों से पार्टी बदलते आए हैं। पार्टी बदल कर मीडिया में खूब छाए हैं। अभी कल-परसों की तो बात है। हमारे खासमखास व लंगोटिया रामलुभाया जी ने भी तो ऐसा ही किया। दूसरी पार्टी के नेताजी से प्रतीक चिह्न और साफा ग्रहण किया। अजी ! दूसरे नेताजी को देख कर उन्होंने भी फटाक से अपनी पार्टी बदल ली। इधर से उधर दखल दी। लेकिन उनकी जुबान से पहले वाली पार्टी का नाम नहीं जा रहा है। बारंबार पहले वाली पार्टी का नाम ही उनकी जुबां पर आ रहा है। उनकी जुबां पहली पार्टी पर ही फिदा है, उनकी जुबां से पहली पार्टी का नाम अभी तक भी (दूसरी पार्टी ज्वाइन करने के बाद भी) हो नहीं पा रहा जुदा है। उस दिन नेता जी(रामलुभाया जी) एक सभा में बैठे हुए थे। पंडाल पार्टी कार्यकर्ताओं, पार्टी हितैषियों से कांपैक्ट स्टाइल में भरा हुआ था। हर तरफ नेताजी रामलुभाया जी की हो रही वाहवाही थी, दरअसल यही वाहवाही ही तो उन्होंने कभी चाही थी। पंडाल में उस दिन रामलुभाया जी जिंदाबाद के नारे खूब गूंजे। नारे सुनकर नेताजी की बांछें खिल आई। अजी उस दिन नेताजी का दिल 'गार्डन-गार्डन' हो गया। नेताजी गुलाब की भांति खिले थे। अब उन्हें नई पार्टी के कार्यकर्ताओं को, सदस्यों को संबोधित करना था। नई पार्टी का दंभ भरना था। संबोधन करने लगे तो उनकी जुबान से पहले वाली पार्टी (छोड़ी हुई पार्टी) का नाम ही अचानक निकल गया। बेचारे आदत से मजबूर थे। आदत भी बड़ी पहुंची हुई चीज होती है, छुटाए नहीं छूटती। तभी तो हर कहीं आकर ये फूटती। कार्यकर्ताओं, पार्टी सदस्यों ने एक बार तो नेताजी की गलती को समझा कि नेताजी गलती से पहली ही पार्टी का नाम बोल गए, लेकिन दूसरी बार नेता जी(रामलुभाया जी) ने फिर ऐसा ही कहा तो नई पार्टी के सदस्य व कार्यकर्ताओं की हंसी फूट पड़ी। नई पार्टी के सदस्यों व कार्यकर्ताओं की हंसी फूटती देखकर यानि कि अपनी किरकिरी होते देख रामलुभाया जी को यह कहना ही पड़ा-'अजी ! क्या करें, पुरानी पार्टी से हमारी जुबान को शायद अभी भी खास लगाव है। तभी तो पुरानी पार्टी का नाम जुबां से जाता नहीं है और नई पार्टी का नाम आता नहीं है। जुबां ने पुरानी पार्टी का नमक आज तक खूब चखा है। इसलिए निभा रही हमारी जुबां खूब 'वफा'(निष्ठा) है। हमारे से तो 'हमारी जुबां' ही अच्छी है जो अभी तक भी अपना वादा निभा रही है।
-सुनील कुमार महला