यूजीसी के नए नियमों पर पुनर्विचार सामाजिक न्याय और समानता के बीच संतुलन जरूरी
सौरभ वार्ष्णेय
उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा बनाए गए नए नियम अब खुद एक बड़े विवाद का विषय बन गए हैं। जिस व्यवस्था का मकसद विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में हर विद्यार्थी को सुरक्षित, सम्मानजनक और भेदभावमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना था, उसी के प्रावधानों पर सवाल उठने लगे हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अब केंद्र सरकार ने अदालत को बताया है कि वह इन नियमों पर नए सिरे से विचार कर रही है। सरकार की ओर से कमेटी गठित करने की संभावना भी जताई गई है। यह घटनाक्रम बताता है कि सामाजिक न्याय के उद्देश्य से बनाई जाने वाली नीतियों में संवेदनशीलता के साथ-साथ व्यापक स्वीकार्यता भी कितनी आवश्यक है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि सरकार नियमों की समीक्षा कर रही है, ताकि विद्यार्थियों की आशंकाओं का समाधान किया जा सके और किसी भी वर्ग में असंतोष या असुरक्षा की भावना पैदा न हो। इस पर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि नीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे सभी युवा संतुष्ट महसूस करें। अदालत ने मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी है। यह टिप्पणी केवल यूजीसी के नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए एक व्यापक संदेश भी देती है।
दरअसल, इस विवाद की जड़ उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की वह कड़वी वास्तविकता है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाता रहा है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे विद्यार्थियों की दुखद मौत ने देश को यह सोचने पर मजबूर किया था कि क्या हमारे विश्वविद्यालय वास्तव में सभी विद्यार्थियों के लिए समान अवसर और सम्मान का वातावरण उपलब्ध करा पा रहे हैं? वर्ष 2019 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की ओर से दायर याचिकाओं में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था की मांग की गई थी। इन याचिकाओं का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी विद्यार्थी को उसकी जाति, सामाजिक पृष्ठभूमि अथवा पहचान के कारण अपमान, उत्पीडऩ या अलगाव का सामना न करना पड़े।
इसी पृष्ठभूमि में यूजीसी ने विचार-विमर्श के बाद जनवरी 2026 में नए नियम अधिसूचित किए। लेकिन इन नियमों के कुछ प्रावधानों, विशेषकर जातिगत भेदभाव की परिभाषा को लेकर विवाद खड़ा हो गया। नए ढांचे में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों के साथ होने वाले भेदभाव पर विशेष ध्यान दिया गया। दूसरी ओर सामान्य वर्ग के कुछ विद्यार्थियों और याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि इस व्यवस्था में उनके खिलाफ होने वाले भेदभाव को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया है। उनका तर्क है कि यदि भेदभाव रोकने के लिए बनाई गई व्यवस्था ही किसी दूसरे वर्ग को संरक्षण से बाहर रखती है, तो समानता का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को इन नियमों पर अंतरिम रोक लगाते हुए फिलहाल 2012 के नियम लागू रखने का निर्देश दिया था। अदालत की चिंता यह थी कि नए प्रावधानों की भाषा और उनका दायरा कहीं ऐसी स्थिति न पैदा कर दे, जिससे समाज में विभाजन और असंतोष बढ़े। यह ध्यान रखना होगा कि अदालत की अंतरिम रोक को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। इसका उद्देश्य मामले के सभी पहलुओं की गंभीरता से जांच करना और किसी संभावित अन्याय को रोकना है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जातिगत भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा की व्यवस्था को किसी एक सामाजिक वर्ग तक सीमित किया जाना चाहिए? निश्चित रूप से भारतीय समाज में ऐतिहासिक रूप से वंचित और कमजोर वर्गों ने लंबे समय तक भेदभाव और सामाजिक असमानता का सामना किया है। शिक्षा संस्थानों में उनके लिए विशेष सुरक्षा उपायों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। संविधान भी समानता के साथ-साथ सामाजिक न्याय और कमजोर वर्गों के संरक्षण की भावना को महत्व देता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि किसी अन्य विद्यार्थी की शिकायत को केवल उसकी जाति या सामाजिक पहचान के आधार पर कम महत्व दिया जाए।
समानता का वास्तविक अर्थ यही है कि हर विद्यार्थी को न्याय पाने का समान अधिकार मिले। यदि किसी अनुसूचित जाति, जनजाति या पिछड़े वर्ग के विद्यार्थी के साथ जातिगत अपमान होता है तो उसे तत्काल संरक्षण मिलना चाहिए। इसी प्रकार यदि सामान्य वर्ग का कोई विद्यार्थी जाति के आधार पर उत्पीडऩ, अपमान या अनुचित व्यवहार का सामना करता है तो उसकी शिकायत को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए। भेदभाव की कोई भी घटना गलत है, चाहे उसका शिकार किसी भी वर्ग का विद्यार्थी हो। न्याय की कसौटी पीडि़त की जाति नहीं, बल्कि उसके साथ हुआ व्यवहार होना चाहिए।
यह भी समझना होगा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं हैं। वे देश के भविष्य, विचारों और सामाजिक चेतना का निर्माण करते हैं। यदि शिक्षा के मंदिरों में ही जाति, वर्ग और पहचान के आधार पर अविश्वास की दीवारें खड़ी होने लगें तो इसका असर आने वाली पीढिय़ों पर पड़ेगा। विद्यार्थियों के बीच आपसी सम्मान, संवाद और सहयोग का वातावरण बनाना विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है। शिकायत निवारण समितियां निष्पक्ष हों, जांच प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी शिकायतकर्ता को प्रताडऩा या प्रतिशोध का भय न रहे।
केंद्र सरकार के सामने अब चुनौती केवल नियमों में संशोधन करने की नहीं, बल्कि ऐसा संतुलित ढांचा तैयार करने की है, जिस पर सभी वर्ग भरोसा कर सकें। प्रस्तावित कमेटी में शिक्षाविदों, सामाजिक न्याय के विशेषज्ञों, विधि विशेषज्ञों और विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। नियमों की भाषा स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि भेदभाव की परिभाषा को लेकर भ्रम की गुंजाइश न रहे। साथ ही झूठी शिकायतों की आशंका को दूर करने के लिए निष्पक्ष जांच की व्यवस्था हो, लेकिन इस आधार पर वास्तविक पीडि़तों की आवाज दबने भी न पाए।
यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य किसी वर्ग को दूसरे के मुकाबले खड़ा करना नहीं, बल्कि शिक्षा संस्थानों को भेदभाव से मुक्त बनाना होना चाहिए। सामाजिक न्याय और सामान्य वर्ग की आशंकाएं एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है। सरकार को ऐसा रास्ता निकालना होगा, जिसमें वंचितों को प्रभावी संरक्षण मिले और किसी अन्य वर्ग के विद्यार्थी को भी अन्याय का अनुभव न हो। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। शिक्षा का परिसर ऐसा होना चाहिए, जहां विद्यार्थी अपनी जाति से नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा, परिश्रम और योग्यता से पहचाना जाए। यही समानता का वास्तविक अर्थ है और यही एक स्वस्थ, समावेशी तथा मजबूत भारत की बुनियाद भी।