विपक्षी गठबंधन में अविश्वास का भाव
केंद्र की सत्ता से बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की सरकार को हटाने के लिए बड़े ही जोर—शोर के साथ 26 विपक्षी दलों ने दो बैठकों के बाद नए गठबंधन इंडिया के गठन का ऐलान किया था। अभी गठबंधन की तस्वीर पूरी तरह साफ भी नहीं हुई है कि दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र, यूपी और पश्चिम बंगाल तक भरोसे की कमी दिखाई देने लगी है।
विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में दरारें और अविश्वास के भाव पनपने लगे हैं। भारत में राजनीतिक गठबंधनों की नियति यही रही है कि वे बनते हैं, क्योंकि उन्हें टूटना होता है। वे टूटते हैं, क्योंकि फिर बनना होता है। सियासी गठबंधन का कोई भी ‘स्थायी भाव’ नहीं होता। शरद पवार देश के रक्षा और कृषि मंत्री रह चुके हैं। वह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे हैं। एक दौर था कि उनका नाम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद के लिए भी चर्चा में रहता था। यह दीगर है कि उनकी पार्टी इतनी छोटी है कि वह कभी इन पदों तक पहुंच ही नहीं सके और न ही संभव था। अलबत्ता वह भाजपा में आ जाएं, तो विचार किया जा सकता है, लेकिन वह देश के प्रधानमंत्री कभी भी नहीं बन सकते। ऐसे वयोवृद्ध और अनुभवी नेता पर शिवसेना (उद्धव) और कांग्रेस के वे नेता सवाल कर रहे हैं, जो नौसीखिया जमात के हैं और विपक्षी गठबंधन के धागे बुनने में जिनका रत्ती भर भी योगदान नहीं है।
दिल्ली में कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता अलका लांबा ने मीडिया को सार्वजनिक तौर पर ब्रीफ किया कि कांग्रेस नेतृत्व ने दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर चुनावी तैयारी के निर्देश दिए हैं, जाहिर है कि पार्टी सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी। यह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और दिल्ली के प्रादेशिक नेताओं ने एक बैठक में तय किया। तल्ख प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, लिहाजा दिल्ली सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज और आम आदमी पार्टी (आप) की मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने गठबंधन के औचित्य पर सवाल उठा दिए। यह भी कहा कि ‘इंडिया’ की मुंबई बैठक में शामिल होने का मतलब ही क्या है? अलबत्ता उन्होंने अंतिम फैसला मुख्यमंत्री केजरीवाल पर छोड़ दिया। अलका लांबा के बयान के बाद मचा घमासान अभी थमा भी नहीं था कि कांग्रेस के दिग्गज नेता संदीप दीक्षित ने आप को बेवकूफों की पार्टी करार दे दिया है। उन्होंने साथ ही अलका लांबा का बचाव भी किया है। उन्होंने बिना नाम लिए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल पर भी बड़ा हमला बोला है।
संदीप दीक्षित ने एक निजी चैनल के साथ बातचीत में कहा, ‘‘आम आदमी पार्टी तो बेवकूफों की फौज है... वे पूरे दिन झूठ बोलते हैं ब्लैकमेल करके जीते हैं। जो आदतन इस तरह के काम करने के लिए मजबूर हैं,उनका क्या कर सकते हैं। चुनाव के लिए आपको सभी सीटों पर तैयारी करनी पड़ती है। अगर हमने नई दिल्ली सीट के लिए तैयारी की और गठबंधन के बाद चांदनी चैक सीट मिल गई, तो हम क्या करेंगे? वे बेवकूफ लोग हैं एक नंबर के। उन्हें न किसी चीज के समझ है। जो आदमी इतना धोखा देता है, उसे लगता है दुनिया उसे धोखा दे रही है। वह खुद धोखेबाज है। टायर फटने पर ऐसा जताते हैं, जैसे गोली चल गई हो।’’ अलका लांबा और संदीप दीक्षित के तल्ख बयानों के बाद दोनों दलों के रिषतों को आसानी से समझा जा सकता है। राजनीतिक विशलेषकों के मुताबिक दिल्ली सर्विस बिल पास होने के बाद से ही दोनों दलों के बीच खटास बढ़नी शुरू हो गई थी।
दूसरी तरफ महाराष्ट्र के भीतरघात हैं। वहां उपमुख्यमंत्री अजित पवार और दिग्गज नेता शरद पवार की मुलाकात पुणे के एक उद्योगपति के आवास पर हुई। इससे पहले भी दो-तीन मुलाकातें हो चुकी थीं। शरद पवार उपमुख्यमंत्री के सगे चाचा हैं और पवार परिवार में पिता-तुल्य हैं, लिहाजा ऐसी मुलाकातें स्वाभाविक हैं। एनसीपी में बगावत और विभाजन के बाद ये मुलाकातें हुई हैं। उद्धव ठाकरे की पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में इन मुलाकातों के मद्देनजर संपादकीय तक लिख दिया गया कि शरद पवार भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने संभावनाओं का पिटारा ही खोल दिया कि अजित के जरिए शरद पवार भाजपा-एनडीए में जा सकते हैं। उन्हें केंद्रीय कृषि मंत्री या नीति आयोग का उपाध्यक्ष बनाने की पेशकश दी गई है। शरद की सांसद-पुत्री सुप्रिया सुले को भी केंद्रीय मंत्री बनाया जा सकता है। हालांकि शरद और सुप्रिया ने पेशकश की अफवाहों का खंडन किया है और भाजपा को ‘सांप्रदायिक और दरारें पैदा करने वाली’ पार्टी करार देकर उसके खिलाफ ‘राजनीतिक संघर्ष’ का संकल्प भी दोहराया है, लेकिन शरद पवार फिर भी सवालिया हैं।
दरअसल पार्टी में दोफाड़ होने के बाद शरद पवार की ताकत भी विभाजित हुई है। उनकी पार्टी का नाम और निशान का मामला चुनाव आयोग के विचाराधीन है, लेकिन जिन नेताओं के प्रयासों से ‘इंडिया’ गठबंधन अस्तित्व में आया है, उनमें शरद पवार भी शामिल हैं। उन्हें कमोबेश महाराष्ट्र की राजनीति का ‘पुराना चाणक्य’ माना जाता है। यदि भ्रम और पालाबदल के सवाल और संदेह पैदा होते रहेंगे, तो विपक्ष का कोई भी गठबंधन लामबंद कैसे रह सकता है? जहां तक ‘आप’ का सवाल है, तो उसका उदय ही कांग्रेस का जनाधार छीनने की राजनीति के साथ हुआ है। ‘आप’ और कांग्रेस का किसी भी स्तर पर गठजोड़ ‘अप्राकृतिक’ है।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कांग्रेस से अलग अपनी लकीर खींचने, इमेज बिल्डिंग में जुटे हैं। नीतीश कुमार ने दिल्ली पहुंचकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि सदैव अटल पहुंचकर उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित की। नीतीश कुमार के इस कदम को ऐसी इमेज बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा जो सभी दलों को स्वीकार्य हो।
उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की घोसी विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव हो रहे हैं। घोसी सीट से बीजेपी ने दारा सिंह चैहान को उम्मीदवार बनाया है जिनके इस्तीफे के कारण ये सीट रिक्त हुई थी। वहीं, समाजवादी पार्टी (सपा) ने सुधाकर सिंह को टिकट दिया है। घोसी में कांग्रेस का स्टैंड क्या होगा? इसे लेकर सस्पेंस है। सपा समर्थन मांगेगी या कांग्रेस बिना मांगे समर्थन का ऐलान कर देगी या कांग्रेस अपना उम्मीदवार उतारेगी? इस पर नजरें टिकी हुई हैं।
लेफ्ट पार्टियों की बात करें तो वो विपक्षी गठबंधन में होकर भी अलग राह पर नजर आ रही हैं। पश्चिम बंगाल की धूपगुड़ी विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में नए गठबंधन में शामिल लेफ्ट और तृणमूल कांग्रेस, दोनों ही आमने-सामने हैं। कांग्रेस ने भी लेफ्ट के समर्थन का ऐलान किया है। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर ने जादवपुर यूनिवर्सिटी में रैगिंग से छात्र की मौत के मामले में भी टीएमसी पर हमला बोला है। संभावना की राजनीति का ये मॉडल पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव के बाद बोर्ड गठन में भी नजर आ रहा है जहां टीएमसी को रोकने के लिए धुर विरोधी माने जाने वाले लेफ्ट और राइट विंग ने हाथ भी मिलाया है। बीजेपी और सीपीआई ने गठबंधन कर पूर्वी मेदिनीपुर में तीन बोर्ड का गठन कर लिया था। तमिलनाडु में भी आपसी विश्वास दिखाई दे रहा है।
गठबंधन के संयोजक से लेकर संरचना और सीट बंटवारे तक, मुंबई में होने वाली बैठक में चर्चा होनी है। लेकिन मुंबई बैठक से पहले ही सवाल खड़े होने लगे हैं कि दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल तक की जो तस्वीर नजर आ रही है, क्या नए गठबंधन के घटक दलों में भरोसे की कमी है? आम चुनाव को अभी छह महीने से ज्यादा का समय बाकी है, ऐसे में विपक्षी गठबंधन की राजनीति के करवटें देखने को मिलेगी।