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एक देश एक चुनाव की चर्चा ने जोर पकड़ा

एक देश एक चुनाव की चर्चा ने जोर पकड़ा

एक देश एक चुनाव की चर्चा ने सियासी हलकों में व्यापक हलचल मचा दी है। विशेषकर संसद के विशेष
सत्र को आहूत करने के मोदी सरकार के एलान से इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। मोदी सरकार ने 18 से 22
सितंबर तक संसद का विशेष सत्र बुलाने का ऐलान कर सियासी क्षेत्रों में सब को चौंका दिया है। सरकार की
ओर से संसद का विशेष सत्र क्यों बुलाया गया है? इसको लेकर अलग-अलग चर्चा शुरू है। ऐसी चर्चा भी शुरू
हो गई है कि एक देश एक चुनाव जैसा महत्वपूर्ण बिल सरकार इस विशेष सत्र में ला सकती है। प्रधानमंत्री
मोदी लंबे समय से इसकी वकालत करते रहे हैं। कहा जा रहा है इससे चुनाव कराने की लागत कम होगी
और शासन के लिए समय भी बचेगा।
एक देश एक चुनाव की बात कोई नई नहीं है, क्योंकि देश में वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा
और राज्य विधानसभा दोनों के चुनाव साथ-साथ हो चुके हैं। एक राष्ट्र एक चुनाव का अर्थ है कि भारत में
संघीय ढांचे के सभी तीन स्तरों के लिए चुनाव प्रक्रिया एक समकालिक तरीके से होगी। एक राष्ट्र एक चुनाव
का मतलब है कि एक मतदाता एक ही दिन सरकार के सभी स्तरों (केंद्रीय, राज्य और स्थानीय) के लिए
अपना वोट डालेगा। इसलिए एक साथ होने वाले चुनाव को एक देश एक चुनाव भी कहा जा सकता है। इससे
देश को बढ़ रहे चुनावी व्यय से छुटकारा मिलेगा। गौरतलब है पिछले दिनों संसदीय समिति ने संसद के
दोनों सदनों में पेश अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि अगर देश में एक ही बार में सभी प्रकार के चुनाव संपन्न
किए जाएंगे, तो न केवल इससे सरकारी खजाने पर बोझ कम पड़ेगा, बल्कि राजनीतिक दलों का खर्च कम
होने के साथ साथ मानव संसाधन का भी अधिकतम उपयोग किया जा सकेगा। साथ ही मतदान के प्रति
मतदाताओं की रूचि में वृद्धि होंगी।
एक देश-एक चुनाव के लिए अनुच्छेद- 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करना होगा। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ कराने के विचार पर जोर देते रहे हैं। इस सत्र में पांच
बैठकें होंगी। मीडिया रिपोर्ट में सरकार से जुड़े कुछ सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि संसद के इस विशेष
सत्र में मोदी सरकार 'एक देश, एक चुनाव वाला बिल ला सकती है। सूत्रों ने कहा है कि विशेष सत्र के दौरान
यूनिफॉर्म सिविल कोड और महिला आरक्षण बिल भी पेश किया जा सकता है। देश में एक देश एक चुनाव
को लेकर बहस काफी समय से चल रही है. इसी साल जनवरी में लॉ कमीशन ने इसको लेकर राजनीतिक
दलों से छह सवालों के जवाब मांगे थे। सरकार इसे लागू कराना चाहती है।

लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराये जाने के मसले पर लंबे समय से बहस
चल रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस विचार का समर्थन कर इसे आगे बढ़ाया है। आपको बता दें कि इस
मसले पर चुनाव आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग और संविधान समीक्षा आयोग विचार कर चुके हैं।
अभी हाल ही में विधि आयोग ने देश में एक साथ चुनाव कराये जाने के मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों,
क्षेत्रीय पार्टियों और प्रशासनिक अधिकारियों की राय जानने के लिये तीन दिवसीय कॉन्फ्रेंस का आयोजन
किया था। इस कॉन्फ्रेंस में कुछ राजनीतिक दलों ने इस विचार से सहमति जताई, जबकि ज्यादातर
राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया। उनका कहना है कि यह विचार लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है।
जाहिर है कि जब तक इस विचार पर आम राय नहीं बनती तब तक इसे धरातल पर उतारना संभव नहीं
होगा।
एक देश-एक चुनाव से बार-बार चुनावों में खर्च होने वाली धनराशि बचेगी। इसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य
और जल संकट निवारण आदि ऐसे कार्यों में हो पाएगा, जिससे लोगों के जीवन स्तर में बेहतरी आएगी। कई
देशों ने विकास को गति देने के लिए एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था अपना रखी है।

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