जल, पृथ्वी की योनी है, शिव स्वयं जल हैं
जल ही जीवन है, जल अमृत है। जल को अग्नि का स्वरूप माना गया है। जल, पृथ्वी की योनि है। जल अमृत की उत्पत्ति का स्थान है। इसीलिए महापुरुषों का कहना है कि, जल सभी प्राणियों का आधार है। इसीलिए संस्कृत में बड़े ही शानदार शब्दों में यह कहा गया है कि-'अग्नेर्मूतिः क्षितेर्योनिरमृतस्य च सम्भवः ।अतोऽम्भः सर्वभूतानां मूलमित्युच्यते बुधैः।।' लेकिन प्राणियों का आधार 'जल' स्वयं आज संकट में है।आज विश्व जल की कमी, जल प्रदूषण का सामना कर रहा है।हाल ही में वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट 2023 जारी की गई है। यह बहुत ही गंभीर और संवेदनशील है कि आज विश्व की जनसंख्या लगातार बढ़ती चली जा रही है और बढ़ती जनसंख्या के बीच यह आंकड़ा कि दुनिया में हर चौथे व्यक्ति को पीने लायक पानी नहीं मिल रहा है। जल जीवन की प्रथम आवश्यकता है, क्योंकि जल के बिना जीवन संभव नहीं है। वास्तव में संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट वैश्विक जल उपलब्धता पर एक डरावनी तस्वीर ही पैदा करती है। इससे अब यह प्रतीत होने लगा है कि किसी ने यह बात गलत नहीं कही है कि तीसरा विश्व युद्ध अब पानी के लिए ही होगा। बहुत समय पहले रहीम जी ने पानी के महत्व व महत्ता को समझकर यूं ही नहीं कहा था कि-'रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून,पानी गये न उबरे मोती,मानुस, चून।' हाल ही में जो रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है उसके अनुसार, हाल-फिलहाल दुनिया के 26% लोगों ( करीब 200 करोड़) को स्वच्छ- सुरक्षित पेयजल नसीब नहीं है और दुनिया के 46% लोगों की पहुंच बुनियादी स्वच्छता तक नहीं है। इतना ही नहीं दुनिया में करीब 350 करोड़ लोग साल में एक महीने पानी की किल्लत से गुजरते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में अभी जितने लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं, जल्द ही वो आंकड़ा आसमान छूने वाला है। आज बढ़ती जनसंख्या, औधौगिक धंधों के लगातार विकास, जलवायु परिवर्तन, हरित गृह प्रभाव, पेड़ पौधों की अंधाधुंध कटाई, पानी के व्यर्थ बहाने, धरती के पानी का असीमित दोहन आदि के कारण धरती के सीमित संसाधन 'पानी' की समस्या कमोबेश हर तरफ उठ खड़ी हो रही है। आज विश्व के अनेक देशों, भारत के राजस्थान के दूर-दराज के गांवों, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता जैसे महानगरों में पानी की किल्लत की समस्याएं हमें हर दिन मीडिया, अखबारों की सुर्खियों में देखने को मिलती रहती हैं। एक अध्ययन के मुताबिक एशिया और अफ्रीका के लोग सबसे अधिक पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। आज विश्व के कतर, इज़राइल, लेबनान, ईरान, जॉर्डन, लीबिया, कुवैत, सऊदी अरब, इरिट्रिया, यूएई, सैन मैरिनो, बहरीन, भारत, पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ओमान और बोत्सवाना जैसे देशों में पानी का गंभीर संकट है। कोई भी देश हो, आज पानी की खपत लगातार बढ़ती चली जा रही है। जनसंख्या बढ़ती है तो पानी की खपत भी बढ़ती ही है। यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 40 सालों में विश्व स्तर पर पानी का उपयोग लगभग 1% की दर से हर साल बढ़ रहा है। दुनिया की आबादी का औसतन 10% हिस्सा पानी की गंभीर कमी वाले देशों में रहता है। रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में दुनिया की शहरी आबादी में 93 करोड़ लोगों ने पानी की कमी का सामना किया। संवेदनशील व अत्यंत गंभीर होने के साथ ही यह चिंताजनक है कि पानी के लिए संघर्ष करने वालों की ये संख्या 2050 तक 240 करोड़ हो सकती है। आज दुनिया के अरबों लोगों को दूषित पानी पानी पड़ रहा है। आज राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में निरंतर अवैध बोरिंग, धरती के पानी के अविवेकपूर्ण व असीमित दोहन के कारण धरती का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। यदि दोहन की यही गति रही तो देश में अनेक स्थानों पर स्वच्छ पेयजल की जबरदस्त समस्या पैदा हो जाएगी। आज जितना पानी दूषित किया जा रहा है, उस अनुरूप उसे स्वच्छ करने के लिए ट्रीटमेंट नहीं किया जा रहा है, यह बहुत गंभीर और चिंताजनक है। दूषित जल से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां तक हो सकती हैं। इसके अलावा दस्त, हैजा पेचिश, टायफाइड, पीलिया यहाँ तक कि पोलियो और मेनिन्जाइटिस भी इसमें शामिल किए जा सकते हैं। धुलाई के लिए अशुद्ध पानी से त्वचा और संक्रामक नेत्र रोग जैसे ट्रेकोमा हो सकता है। ट्रेकोमा से दृश्य हानि या अंधापन हो सकता है।आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में लगभग 3.1% मौतें पानी की गन्दी और खराब गुणवत्ता के कारण होती हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में 80% बीमारियाँ जल द्वारा उत्पन्न होती है।चिंताजनक रूप से, भारत के 600 जिलों में से एक तिहाई जिलों में भूजल पीने के लिए अयोग्य है, जिसमें फ्लोराइड, लोहा, खारापन और आर्सेनिक खतरनाक स्तर पर पाया जाता है। आज न जाने कितने मिलियन लोग फ्लोरोसिस से पीड़ित हैं।दूषित पानी हेपेटाइटिस ए और ई जैसे विषाणु, इ.कोली जैसे जीवाणु का वाहक हो सकता है। वास्तव में आज पानी को बचाने, जल संरक्षण और पानी के पुनः प्रयोग की तकनीक को अपनाये जाने की जरूरत है। जल संरक्षण और जल सुरक्षा के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक किए जाने की जरूरत है। हाल ही में जो रिपोर्ट आई है वह बताती है कि अस्वच्छ पानी और साफ- सफाई से जुड़ी बीमारियों के कारण पूरी दुनिया में हर साल 14 लाख लोगों की मौत होती है और 7 करोड़ 40 लाख लोगों की उम्र कुछ कम हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक पानी की मांग (जमीन से निकासी) 2050 तक 55% तक बढ़ने का अनुमान है। आश्चर्यजनक है कि आज विश्व स्तर पर 80% अपशिष्ट जल बिना किसी उपचार के पर्यावरण में छोड़ दिया जाता है। कई विकासशील देशों में यह आंकड़ा करीब 99% है। इस संबंध में विकासशील देशों को सतर्क होने की जरूरत है। इस हिसाब से वर्ष 2050 में विश्व में गंभीर जल संकट पैदा हो सकता है। वास्तव में रिपोर्ट हमें चेता रही है भविष्य में मानव के लिए जल उपलब्धता का एक बड़ा संकट पैदा होने वाला है। चिंताजनक बात यह है कि भारत पर इस जल संकट का गंभीर व व्यापक असर पड़ेगा। भारत में जल को देवता माना गया है और हमारे यहाँ नदियां पूजनीय रहीं हैं लेकिन आज भारत की गंगा, यमुना व सरस्वती जैसी नदियां प्रदूषित हो गई हैं। एक आंकड़़े के अनुसार आज भारत की 10 नदियां सूखने का खतरा पैदा हो गया है। न्यूयॉर्क में हुए जल सम्मेलन में पिछले दिनों यू. एन. के महासचिव गुटेरस ने दुनिया और भारत में पानी की स्थिति के बारे में एक भयावह चित्र प्रस्तुत किया था। आज ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारत समेत दुनिया में ग्लेशियरों का पिघलना जारी है और नदियों में पानी ग्लेशियरों से ही आता है, ऐसे में ग्लेशियरों का पिघलना चिंताजनक है। वास्तव में पानी के बारे में आम आदमी की यह बहुत ही सामान्य सी सोच है कि पानी इस धरती से कभी भी न खत्म होने वाला असीमित संसाधन है लेकिन यह सोच सही नहीं है। पानी सीमित संसाधन है और हमें इसका विवेकपूर्ण, संयमित उपयोग करना चाहिए, पानी को व्यर्थ बहाना कतई ठीक नहीं है, क्योंकि यदि हम ऐसा करते रहे तो इसके लिए हमें हमारी भावी पीढ़ियां कोसेंगी। वास्तव में, पानी एक ऐसी नियामत है, जो हमें कुदरत से ही मिलता है। पानी कुदरत की अनुपम देन है धरती के समस्त जीव-जंतुओं, मनुष्यों व वनस्पतियों को। हम पानी का निर्माण प्रकृति की भांति असीमित रूप से नहीं कर सकते हैं और यही बात हमें आज सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है। रिपोर्ट के अनुसार, आज पृथ्वी पर पानी की उपलब्धता लगातार घटती चली जा रही है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टँडर्डस के मुताबिक अगर पानी में टीडीएस की मात्रा प्रति लीटर में 500 मिलीग्राम से कम है तो गंध रहित पानी पीने योग्य है। लेकिन ये मात्रा 250 से कम नहीं होनी चाहिए। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक प्रति लीटर पानी में 300 से 600 मिलीग्राम टीडीएस को भी पीने योग्य मान लिया जाता है। बहरहाल, कहना गलत नहीं होगा कि आज हमारे वैज्ञानिक भी इस तथ्य को भली-भांति स्वीकार करते हैं कि मनुष्य शरीर में यदि जल की कमी आ जाए तो उसका जीवन खतरे में पड़ जाता है। वर्तमान युग में जब जल की कमी, जल प्रदूषण की गंभीर चुनौतियां सारा संसार स्वीकार कर रहा है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हम जल का संरक्षण करें, इसे बचाएं, इसे व्यर्थ न बहाएं। जल की महत्ता को समझें।जो जल इस समस्त जगत् के प्राणियों में जीवन का संचार करता है वह जल स्वयं उस परमात्मा शिव का रूप है। इसीलिए जल का अपव्यय नहीं वरन् उसका महत्व समझकर उसकी पूजा करनी चाहिए। संस्कृत में कहा गया है-'संजीवनं समस्तस्य जगतः सलिलात्मकम्। भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मनः।।'