विश्व रंगमंच दिवस मनाया
27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस के रूप में मनाया जाता है। जानकारी देना चाहूंगा कि मनोरंजन के दृष्टिकोण से विश्व रंगमंच दिवस अपना खास स्थान रखता है।पूरे विश्व में रंगमंच को अपनी अलग पहचान दिलाने के लिए साल 1961 में अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संस्थान (आईटीआई) ने इस दिन की नींव रखी थी। वर्ष 2022 में इस दिवस की थीम 'थिएटर एंड ए कल्चर ऑफ पीस' (रंगमंच और शांति की संस्कृति) रखी गई थी। वास्तव में, नाट्य कलाओं के महत्व के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए, कि कैसे नाट्यशास्त्र ने मनोरंजन के क्षेत्र में एक आवश्यक भूमिका निभाई है, और रंगमंच लोगों के जीवन में क्या सुधार ला सकता है, यह इस दिन मनाया जाता है। प्राचीन यूनानियों के समय से नाटक विधा प्रचलन में आई थी। वास्तव में, थिएटर शब्द ग्रीक से आया है। इसका अर्थ है देखने का स्थान। यह वह जगह है जहां लोग जीवन और सामाजिक स्थिति के बारे में सच्चाई देखने आते हैं। रंगमंच अपने समय का आध्यात्मिक और सामाजिक एक्स-रे है। भारत में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना है और ऐसा समझा जाता है कि नाट्यकला सबसे पहले भारत में विकसित,पल्लवित और पोषित हुई थी। इस संसार की तुलना एक रंगमंच से की जाती है और अंग्रेजी के महान कवि व नाटककार विलियम शेक्सपियर ने 'एज यू लाइक इट' में कहते हैं- आल द वर्ल्ड इज ए स्टेज, एंड ऑल द मेन एंड वीमेन मियरली प्लेयर्स'। यानी कि 'पूरी दुनिया एक मंच है, और सभी पुरुष और महिलाएं केवल खिलाड़ी हैं।' लुसियस अन्नायस सेनेका का जीवन के बारे में यह कहना है कि-'जीवन एक नाटक की तरह है: लंबाई नहीं, बल्कि अभिनय की उत्कृष्टता मायने रखती है।' बहरहाल, वास्तव में भारतीय रंगमंच का उद्गम सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद से हुआ बताते हैं। जानकारी देना चाहूंगा कि 'रंगमंच' वह स्थान है जहाँ नृत्य, नाटक, खेल आदि हों।ऋग्वेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं जो कि एक प्रकार से भारत में नाटक के विकास के चिह्न हैं।भारत में रंगमंच का इतिहास लगभग 5,000 साल पुराना है और यह संस्कृति और परंपरा में डूबा हुआ है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र हिन्दी रंगमंच के पुरोधा कहलाते हैं। 'भारतीय रंगमंच' भारत की तरह ही विविध छवियों का जटिल मिश्रण है, इसमें स्थानगत, समयगत, शैलीगत, कथ्यगत विविधता है तो आंतरिक एकता का सूत्र भी है। वैसे भारतीय रंगमंच में भरतमुनि का योगदान बहुत ही अहम् व महत्वपूर्ण माना जाता है, जैसा कि उन्होंने नाट्यशास्त्र की 36 पुस्तकें लिखी थी। आधुनिक भारतीय रंगमंच के जनक पद्य विभूषण इब्राहिम अल्काज़ी माने जाते हैं। अल्काज़ी ने गिरीश कर्नाड की तुगलक , धर्मवीर भारती की अंधा युग और मोहन राकेश की आषाढ़ का एक दिन जैसे नाटकों का निर्माण किया था।अल्काज़ी 'सच्चे पुनर्जागरण पुरुष' माने जाते है।यदि हम यहाँ पहले भारतीय थियेटर की बात करें तो भारत में बनने वाला पहला मूवी थियेटर चैपलिन सिनेमा था, जिसे एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस के नाम से भी जाना जाता है । चैपलिन सिनेमा 1907 में जमशेदजी फ्रामजी मदन द्वारा बनाया गया था। महल को बाद में "मिनर्वा" नाम दिया गया था और यह हॉलीवुड फिल्मों की स्क्रीनिंग के लिए एक लोकप्रिय थिएटर था। वैसे, भारतीय रंगमंच में अभिनय, वार्तालाप, कविता और संगीत सभी का उपयोग किया जाता है। जानकारी देना चाहूंगा कि रंगमंच के छह मुख्य तत्व हैं , जिनमें क्रमशः प्लॉट, कैरेक्टर, थॉट, डिक्शन, म्यूजिक और तमाशा शामिल हैं।नाटक को रूपक, दृश्यकाव्य और प्रेक्षकाव्य भी कहा जाता था। अश्वघोष, कालिदास, विशाखदत्त और अन्य लोगों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। समय की करवट के साथ रंगमंच सामाजिक आनंद का ही क्षेत्र नहीं रहा अपितु यह ज्ञान के व्यापक प्रसार की तकनीक बन गया है। कुल मिलाकर, भारतीय रंगमंच भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक संरचना का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह कई तरह से समाज के सामाजिक रीति-रिवाजों, यहाँ की संस्कृति और मान्यताओं को दर्शाता है।
सुनील कुमार महला