एयरोस्पेस में भारत की उड़ान तेज, 2035 तक 61 अरब डॉलर का बाजार
नई दिल्ली। भारत का एयरोस्पेस क्षेत्र आने वाले वर्षों में बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। केंद्रीय नागर विमानन मंत्री किंजरापु राममोहन नायडू ने कहा कि देश का एयरोस्पेस बाजार 2025 के 30 अरब डॉलर से अधिक के स्तर से बढ़कर वर्ष 2035 तक करीब 61 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसके साथ ही भारतीय कंपनियों और एमएसएमई के लिए वैश्विक विमानन आपूर्ति शृंखला में अपनी जगह मजबूत करने के नए रास्ते खुलेंगे।
सीआईआई और नागर विमानन मंत्रालय की संयुक्त पहल वोर्टेक्स 2026 में बोलते हुए नायडू ने कहा कि सरकार भारत में मजबूत एयरोस्पेस विनिर्माण इकोसिस्टम तैयार करना चाहती है। उनका कहना था कि देश के कई मौजूदा उद्योग अपनी क्षमताओं का विस्तार कर इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां एवियोनिक्स, प्रिसिजन इंजीनियरिंग फर्म विमान कलपुर्जों और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में काम कर रहे एमएसएमई एयरोस्पेस सप्लाई चेन का हिस्सा बन सकते हैं।
मंत्री ने कहा कि भारत के सामने घरेलू मांग के साथ-साथ वैश्विक बाजार का भी बड़ा अवसर मौजूद है। भारतीय एयरलाइंस ने करीब 1,640 विमानों के ऑर्डर दिए हुए हैं। इन विमानों के निर्माण और संचालन के लिए आने वाले समय में करीब 80 करोड़ पुर्जों और कलपुर्जों की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में घरेलू विनिर्माण क्षेत्र के लिए यह एक बड़ा कारोबारी अवसर बन सकता है।
नायडू ने भारत के ऑटो कंपोनेंट और मोबाइल फोन विनिर्माण क्षेत्रों को उदाहरण के तौर पर पेश किया। उन्होंने कहा कि करीब 70 अरब डॉलर के ऑटो कंपोनेंट उद्योग ने अपनी क्षमता साबित की है। वहीं देश में इस्तेमाल होने वाले लगभग 99 प्रतिशत मोबाइल फोन अब भारत में ही निर्मित होते हैं। उनके मुताबिक इसी तरह की सफलता एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग में भी हासिल की जा सकती है।
एमएसएमई की बढ़ती क्षमता का जिक्र करते हुए मंत्री ने बताया कि इन कंपनियों का निर्यात पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। 2021 में एमएसएमई निर्यात करीब 4 लाख करोड़ रुपये था, जो 2025 तक बढ़कर 12.4 लाख करोड़ रुपये हो गया। फिलहाल 1.73 लाख से ज्यादा एमएसएमई सीधे वैश्विक बाजारों में निर्यात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि एयरोस्पेस क्षेत्र की करीब 80 प्रतिशत जरूरतों के लिए जरूरी आधारभूत क्षमता भारतीय उद्योग के पास पहले से मौजूद है, जबकि बाकी हिस्से के लिए सरकार नियामकीय सहयोग उपलब्ध कराएगी।
भारत के बढ़ते विमानन बाजार को भी एयरोस्पेस उद्योग के लिए महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। नायडू के अनुसार 2035 तक देश में हवाई यात्री यातायात में औसतन 8.9 प्रतिशत सालाना वृद्धि होने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि तेजी से बढ़ता घरेलू बाजार और वैश्विक कंपनियों का अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने का प्रयास भारत के लिए एक साथ बड़े अवसर पैदा कर रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर भी संभावनाएं कम नहीं हैं। दुनिया की प्रमुख विमान निर्माता कंपनियों एयरबस और बोइंग के पास फिलहाल 15,000 से अधिक वाणिज्यिक विमानों के ऑर्डर बताए गए हैं। ऐसे में भारतीय एमएसएमई के पास केवल घरेलू जरूरतें पूरी करने ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर विमान के पुर्जे और कंपोनेंट सप्लाई करने का भी मौका है।
नागर विमानन मंत्रालय के सचिव समीर कुमार सिन्हा ने बताया कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाजार बन चुका है। वर्ष 2014 में देश में 74 हवाईअड्डे परिचालन में थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 166 हो गई है। इसी अवधि में विमान बेड़ा भी करीब 350 से बढ़कर 874 विमानों तक पहुंच गया है। आने वाले दो दशकों में भारतीय विमानन बेड़े में 2,000 से अधिक नए विमान जुड़ने की उम्मीद है।
उन्होंने बताया कि करीब 29,000 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान वाली संशोधित उड़ान योजना के तहत 100 नए हवाईअड्डों और 200 आधुनिक हेलिपैड के विकास की योजना है। इससे देश के विमानन इकोसिस्टम को और विस्तार मिलने की उम्मीद है।
भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के अध्यक्ष विपिन कुमार ने कहा कि भारतीय एमएसएमई और स्टार्टअप पहले से ही हर साल 18,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के विमान कलपुर्जे वैश्विक बाजार में उपलब्ध करा रहे हैं। यात्री यातायात बढ़ने के साथ विमान, कलपुर्जों, एमआरओ, ग्राउंड सपोर्ट उपकरण, नेविगेशन सिस्टम और एयरपोर्ट टेक्नोलॉजी की मांग भी बढ़ेगी।
वहीं, बोइंग इंडिया एवं दक्षिण एशिया के अध्यक्ष और सीआईआई राष्ट्रीय एयरोस्पेस विनिर्माण समिति के अध्यक्ष सलिल गुप्ते ने कहा कि बोइंग के भारत में करीब 300 सप्लायर पार्टनर हैं, जिनमें लगभग 25 प्रतिशत एमएसएमई हैं। उन्होंने कहा कि भारत एयरोस्पेस उत्पाद बना सकता है या नहीं, यह अब सवाल नहीं है, क्योंकि देश पहले ही यह क्षमता दिखा चुका है। अब चुनौती इस क्षमता को तेजी से बड़े पैमाने पर विस्तार देने की है।