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विशाखापट्टनम की समुद्री ढाल की कहानी, दो तोपों से हुई थी शुरुआत

विशाखापट्टनम की समुद्री ढाल की कहानी, दो तोपों से हुई थी शुरुआत

विशाखापट्टनम. विशाखापट्टनम की पहचान सिर्फ बड़े बंदरगाह, समुद्री कारोबार या पर्यटन से नहीं है। यह शहर लंबे समय से भारत की समुद्री और नौसैनिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसी रणनीतिक महत्व के बीच यहां विकसित हुई Naval Coast Battery, Visakhapatnam यानी NCB-V की कहानी भी सामने आती है।

आज समुद्री सुरक्षा का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है, लेकिन कभी तट की सुरक्षा का बड़ा भरोसा भारी तोपों पर हुआ करता था। विशाखापट्टनम में बनी यह तटीय रक्षा व्यवस्था उसी दौर की याद दिलाती है, जब समुद्र की तरफ से आने वाले संभावित दुश्मन जहाजों पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर उन्हें रोकना इसका प्रमुख उद्देश्य था।

1940 में दो भारी तोपों से शुरुआत

इस तटीय रक्षा व्यवस्था की जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध के शुरुआती वर्षों में मिलती हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वर्ष 1940 में विशाखापट्टनम में 5th Indian Heavy Battery स्थापित की गई थी। यहां दो 6-इंच की भारी तोपें तैनात की गईं।

उस समय समुद्री युद्ध में युद्धपोतों का खतरा एक बड़ी चुनौती था। इसलिए बंदरगाह और महत्वपूर्ण तटीय प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए ऐसी जगहों पर भारी तोपें लगाई जाती थीं, जहां से समुद्र में दूर तक नजर रखी जा सके और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जा सके।

दिसंबर 1941 में इस इकाई का नाम बदलकर 5th Indian Coast Battery कर दिया गया। उस दौर में तटीय तोपखाना समुद्री रक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता था।

जापानी हमले के दौर में बढ़ा महत्व

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विशाखापट्टनम का सामरिक महत्व और बढ़ गया था। वर्ष 1942 में जापानी विमानों द्वारा शहर पर हमले का भी ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में जापानी सैन्य गतिविधियों के विस्तार के बीच भारत के पूर्वी समुद्री तट पर भी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी हुई थी।

ऐसे माहौल में विशाखापट्टनम जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाह की सुरक्षा के लिए तटीय रक्षा व्यवस्था का महत्व और बढ़ गया। उस समय निगरानी के लिए आधुनिक रडार जैसी तकनीक उपलब्ध नहीं थी। सैन्यकर्मी समुद्र पर नजर रखने के लिए मानव निगरानी, दूरबीन, संचार माध्यमों और दूसरे उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर रहते थे।

सैन्य जरूरतों के बीच बदली तटीय बस्तियों की तस्वीर

तटीय रक्षा व्यवस्था तैयार करते समय केवल सैन्य जरूरतों का ही ध्यान नहीं रखा गया, बल्कि इलाके की भौगोलिक स्थिति भी महत्वपूर्ण थी। समुद्र की ओर खुला क्षेत्र होने के कारण यहां से समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने की सुविधा थी।

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, सैन्य जरूरतों के चलते तटीय इलाके में रहने वाले कुछ परिवारों को दूसरी जगह स्थानांतरित किया गया। बाद में उस क्षेत्र में Kotha Jalaripeta जैसी बस्ती विकसित हुई। इस तरह समुद्री रक्षा से जुड़े फैसलों का असर आसपास रहने वाले लोगों की जिंदगी पर भी पड़ा।

1964 में नौसेना को मिली जिम्मेदारी

आज की Naval Coast Battery की पहचान बनने में वर्ष 1964 महत्वपूर्ण रहा। इसी दौरान Coastal Batteries की जिम्मेदारी भारतीय नौसेना को सौंपने का निर्णय लिया गया। इसके बाद विशाखापट्टनम की तटीय रक्षा इकाई को Naval Coast Battery, Visakhapatnam यानी NCB-V के नाम से जाना जाने लगा।

नौसेना के अधीन आने के बाद तटीय रक्षा को व्यापक समुद्री सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ने का रास्ता मजबूत हुआ। इसी अवधि में विशाखापट्टनम का महत्व भी भारतीय नौसेना के पूर्वी तट के प्रमुख केंद्र के रूप में लगातार बढ़ता गया।

1971 के युद्ध में भी रही तैयारी

भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 के दौरान भी विशाखापट्टनम की तटीय सुरक्षा को लेकर विशेष सतर्कता बरती गई थी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार Naval Coast Battery को हाई अलर्ट पर रखा गया और सैन्यकर्मियों की operational readiness बनाए रखने के लिए अभ्यास किए गए।

उस समय पूर्वी समुद्री क्षेत्र का महत्व काफी अधिक था। भारतीय नौसेना ने 1971 के युद्ध में समुद्री मोर्चे पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसे में विशाखापट्टनम जैसे प्रमुख नौसैनिक केंद्रों की सुरक्षा भी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी।

तोपों से रडार तक पहुंचा तटीय सुरक्षा का सफर

द्वितीय विश्व युद्ध के समय तटीय सुरक्षा का आधार भारी तोपें थीं। आज स्थिति काफी अलग है। समुद्री क्षेत्र की निगरानी के लिए रडार, संचार नेटवर्क, समुद्री गश्त, नौसैनिक पोत, विमान और हेलीकॉप्टर जैसी कई क्षमताएं एक साथ काम करती हैं।

समुद्र में किसी संदिग्ध गतिविधि का पता चलने पर सूचना अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियों के बीच साझा की जाती है। यानी तटीय सुरक्षा अब किसी एक स्थान पर तैनात हथियारों या एक सैन्य इकाई तक सीमित नहीं है, बल्कि कई स्तरों वाला नेटवर्क बन चुकी है।

26/11 के बाद और मजबूत हुआ तटीय सुरक्षा तंत्र

मुंबई में 26/11 आतंकी हमलों के बाद देश की तटीय सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की गई। इसके बाद समुद्री निगरानी और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया।

भारतीय नौसेना के साथ Coast Guard, Marine Police, Customs, Fisheries और अन्य एजेंसियां भी तटीय सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनीं। आधुनिक व्यवस्था में संदिग्ध नौकाओं की पहचान, समुद्री गतिविधियों की निगरानी और जरूरत पड़ने पर त्वरित प्रतिक्रिया को महत्व दिया जाता है।

विशाखापट्टनम में एजेंसियों का समन्वय

पूर्वी तट पर विशाखापट्टनम की भूमिका को देखते हुए यहां विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल भी महत्वपूर्ण है। Joint Operations Centre (East) जैसी व्यवस्थाएं समुद्री सुरक्षा से जुड़े समन्वय में भूमिका निभाती हैं।

समय-समय पर तटीय सुरक्षा अभ्यास भी आयोजित किए जाते हैं। इनमें नौसेना, Coast Guard, Marine Police और अन्य संबंधित एजेंसियां हिस्सा लेती हैं। इन अभ्यासों का मकसद वास्तविक आपात स्थिति के दौरान अलग-अलग एजेंसियों की प्रतिक्रिया और आपसी तालमेल को परखना होता है।

आज खतरा सिर्फ युद्धपोतों तक सीमित नहीं

समुद्री सुरक्षा की चुनौती अब केवल दुश्मन के युद्धपोतों तक सीमित नहीं है। संदिग्ध नावें, समुद्री तस्करी, अवैध गतिविधियां, समुद्री आतंकवाद और दूसरे सुरक्षा जोखिम भी इसके दायरे में आते हैं।

इसी कारण समुद्र में चलने वाले जहाजों और नावों पर निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान और समय पर संबंधित एजेंसियों तक सूचना पहुंचाना आधुनिक तटीय सुरक्षा का अहम हिस्सा बन गया है।

दो तोपों से शुरू हुई कहानी अब नेटवर्क तक पहुंची

Naval Coast Battery का इतिहास दरअसल भारत की तटीय सुरक्षा में आए बदलाव की कहानी भी है। वर्ष 1940 में दो 6-इंच की भारी तोपों से शुरू हुई व्यवस्था उस समय की सैन्य जरूरतों के हिसाब से तैयार की गई थी। 1964 में नौसेना के अधीन आने के बाद इसका संबंध व्यापक समुद्री रक्षा ढांचे से जुड़ता गया।

आज समुद्र की सुरक्षा के लिए रडार, सेंसर, संचार नेटवर्क, समुद्री गश्त, नौसैनिक पोत, हवाई निगरानी और कई एजेंसियों का समन्वय जरूरी है। विशाखापट्टनम की Naval Coast Battery इसी लंबे बदलाव की ऐतिहासिक कड़ी है—जहां कभी समुद्र की ओर दो भारी तोपों से नजर रखी जाती थी और आज उसी समुद्री सुरक्षा की तस्वीर कहीं ज्यादा तकनीकी और बहुस्तरीय हो चुकी है।

विशाखापट्टनम की समुद्री ढाल की कहानी, दो तोपों से हुई थी शुरुआत
विशाखापट्टनम की समुद्री ढाल की कहानी, दो तोपों से हुई थी शुरुआत

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